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Thursday, September 15, 2011

गीत : मनचाहा कर जाने दो.......

देवी होकर चरण चूमती हो क्यों मेरे
अपने चरणों में मुझको मर जाने दो
व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
मेरे नयनों में सागर भर जाने दो.

तुमने जिस यौवन देहरी पर कदम धरा है
उस मधुबन की कलियाँ अब खिलने वाली हैं
बासंती - सपनीले पथ पर कदम धरो तुम
हर पग पर खुशियाँ तुमको मिलने वाली हैं.

यह ऋतुराज समर्पित तुमको – रहो महकते
मैं हूँ सूखा फूल – मुझे झर जाने दो.
व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
मेरे नयनों में सागर भर जाने दो.

मैं कारण हूँ यदि तुम्हारी नम पलकों का
तो मेरा मिट जाना ही प्रायश्चित होगा
अपने हाथों से मेरा अस्तित्व मिटा दो
कुछ भी समझो, मुझे भुलाना निश्चित होगा.

मुस्काकर तुम मुझे विदा दो , मेरी देवी  !
अंतिम बेला – मनचाहा कर जाने दो.
व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
मेरे नयनों में सागर भर जाने दो.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छतीसगढ़.

(रचना वर्ष – 1978)

27 comments:

  1. mahendra verma has left a new comment on your post "गीत : मनचाहा कर जाने दो.......":

    तुमने जिस यौवन देहरी पर कदम धरा है
    उस मधुबन की कलियाँ अब खिलने वाली हैं
    बासंती सपनीले पथ पर कदम धरो तुम
    हर पग पर खुशियाँ तुमको मिलने वाली हैं

    रचना का शिल्पगत सौंदर्य सराहनीय है।
    बहुत अच्छी लगी ये पंक्तियां।



    Posted by mahendra verma to अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ) at September 15, 2011 9:10 AM

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  2. डॉ॰ मोनिका शर्मा has left a new comment on your post "गीत : मनचाहा कर जाने दो.......":

    सुंदर शाब्दिक अलंकरण लिए रचना



    Posted by डॉ॰ मोनिका शर्मा to अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ) at September 15, 2011 9:22 AM

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  3. बहुत ही बढ़िया सर।

    ---------
    कल 16/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. देखी रचना ताज़ी ताज़ी --
    भूल गया मैं कविताबाजी |

    चर्चा मंच बढाए हिम्मत-- -
    और जिता दे हारी बाजी |

    लेखक-कवि पाठक आलोचक
    आ जाओ अब राजी-राजी |

    क्षमा करें टिपियायें आकर
    छोड़-छाड़ अपनी नाराजी ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. निगम साहब
    अच्छा गीत है..... भाव भी बेहद नाज़ुक और प्रस्तुति भी असरदार है....

    मुस्काकर तुम मुझे विदा दो , मेरी देवी !
    अंतिम बेला – मनचाहा कर जाने दो.
    व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो.
    वह वाह !!!!

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  6. यह ऋतुराज समर्पित तुमको – रहो महकते
    मैं हूँ सूखा फूल – मुझे झर जाने दो.
    व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो.

    बहुत खूबसूरत गीत

    ऐसे ही भाव मैंने भी कभी अपनी एक कविता में लिखे थे ..
    है तेरी ज़िंदगी बसंत ऋतु
    हर खुशी का फ़ूल खिल जायेगा
    मेरी ज़िंदगी है पतझर
    जिसमें हर पत्ता गिर जायेगा ...

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  7. .

    देवी होकर चरण चूमती हो क्यों मेरे
    अपने चरणों में मुझको मर जाने दो
    व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो....

    इन पंक्तियों में छुपे उत्कृष्ट विचारों को नमन।

    .

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  8. खुबसूरत और बेहतरीन अभिव्यक्ति ...

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  9. मैं कारण हूँ यदि तुम्हारी नम पलकों का
    तो मेरा मिट जाना ही प्रायश्चित होगा
    अपने हाथों से मेरा अस्तित्व मिटा दो
    कुछ भी समझो, मुझे भुलाना निश्चित होगा.
    bahut badhiyaa

    ReplyDelete
  10. ARUN JI
    sundar rachna ke liye badhai sweekaren.
    मेरी १०० वीं पोस्ट , पर आप सादर आमंत्रित हैं

    **************

    ब्लॉग पर यह मेरी १००वीं प्रविष्टि है / अच्छा या बुरा , पहला शतक ! आपकी टिप्पणियों ने मेरा लगातार मार्गदर्शन तथा उत्साहवर्धन किया है /अपनी अब तक की " काव्य यात्रा " पर आपसे बेबाक प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हूँ / यदि मेरे प्रयास में कोई त्रुटियाँ हैं,तो उनसे भी अवश्य अवगत कराएं , आपका हर फैसला शिरोधार्य होगा . साभार - एस . एन . शुक्ल

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  11. निगम जी पिटारे से बेहतरीन काव्यांजलि लाये है , काव्य रस से सराबोर भी किया बधाई

    ReplyDelete
  12. बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी रचना.... व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो

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  13. शुक्रवार-http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  14. bahut sundar bhaav bahut pyaari kavita.badhaai.

    ReplyDelete
  15. ऐसे चाहत वाले भी बहुत कम मिलते है ! दिल में प्यार और इज्जत होनी ही चाहिए १ बहुत सुन्दर भाव !

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  16. देवी होकर चरण चूमती हो क्यों मेरे
    अपने चरणों में मुझको मर जाने दो
    व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो....
    बहुत ही बढि़या अभिव्‍यक्ति ।

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  17. बहुत सुंदर मर्मस्पर्शी रचना|

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  18. वाह!वाह !वाह !
    प्रेमरस से परिपूर्ण , मधुर गीत ने आनंदित कर दिया ...
    असली प्रेम त्याग और समर्पण ही तो है !

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  20. व्यर्थ भिगोती हो अपनी कजरारी पलकें
    मेरे नयनों में सागर भर जाने दो....
    inhin panktiyon men saar chhupa hai , badhai

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  21. भाई वाह अरुण भाई....
    क्या कहें....
    सादर बधाई इस गीत के लिए...

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  22. गीत के भाव मन को भिगो गए।

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  23. बहुत प्यारी रचना है.वाह.

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  24. बेहतरीन अभिव्यक्ति .

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