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Thursday, November 9, 2017

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

निर्धन को खुशियाँ तब मिलतीं, जब होते दुर्लभ संयोग
हमको अपनी बासी प्यारी, उन्हें मुबारक छप्पन भोग।।

चन्द्र खिलौना लैहौं वाली, जिद कर बैठे थे कल रात
अपने छोटे हाथ देखकर, पता चली अपनी औकात।।

जो चलता है वह बिकता है, प्यारे ! यह दुनिया बाजार
यहाँ हमारा सिक्का खोटा, जिसको हम कहते हैं प्यार।।

लेन देन में घाटा सहते, गणित हमारा है कमजोर
ढाई आखर ही पढ़ पाए, ले दे के हम दाँत निपोर।।

हम कबीर के साथ चले हैं, लिए लुआठी अपने हाथ
जो अपना घर कुरिया फूँके, आये वही हमारे साथ।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, October 27, 2017

यमक और रूपक अलंकार

*यमक अलंकार - जब एक शब्द, दो या दो से अधिक बार अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हो*।

*दोहा छन्द* -
(1)
मत को मत बेचो कभी, मत सुख का आधार
लोकतंत्र का मूल यह, निज का है अधिकार ।।
(2)
भाँवर युक्त कपोल लख, अंतस जागी चाह
भाँवर पूरे सात लूँ, करके उससे ब्याह ।।

*रूपक अलंकार - जब उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए अर्थात उपमेय और उपमान में कोई अंतर दिखाई न दे*।

*रोला छन्द* -
(1)
नयन-झील में डूब, प्रेम-मुक्ता पा जाऊँ
छूटे जग-जंजाल, आरती पिय की गाऊँ।
यही कामना आज, हृदय में मेरे जागी
पिय को दो संदेश, हुआ है मन अनुरागी।।
(2)
अधर-पाँखुरी देख, हृदय-भँवरा ललचाया
करने को रसपान, निकट चुपके से आया।
सखि-कंटक चहुँओर, करे कैसे मनचीता
उहापोह में हाय, समय सारा ही बीता ।।

*अरुण कुमार निगम*

Wednesday, August 23, 2017

एक श्रृंगार गीत

एक श्रृंगार गीत -

कजरे गजरे झाँझर झूमर चूनर ने उकसाया था
हार गले के टूट गए कुछ ऐसे अंक लगाया था ।

हरी चूड़ियाँ टूट गईं क्यों सुबह सुबह तुम रूठ गईं
कल शब तुमने ही तो मुझको अपने पास बुलाया था।

हाथों की मेंहदी न बिगड़ी और महावर ज्यों की त्यों
होठों की लाली को तुमने खुद ही कहाँ बचाया था।

जितनी करवट उतनी सलवट इस पर काहे का झगड़ा
रेशम की चादर को बोलो किसने यहाँ बिछाया था।

झूठ कहूँ तो कौआ काटे मैंने दिया जलाया था
खता तुम्हारी थी तुमने तो खुद ही दिया बुझाया था।

नई चूड़ियाँ ले लेना तुम हार नया बनवा लेना
अभी अभी तो पिछले हफ्ते ही इनको बनवाया था।

*अरुण कुमार निगम*
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Thursday, July 13, 2017

दोहा छन्द

दोहा छन्द

नैसर्गिक दिखते नहीं, श्यामल कुन्तल मीत
लुप्तप्राय हैं वेणियाँ, शुष्क हो गए गीत।।

पैंजन चूड़ी बालियाँ, बिन कैसा श्रृंगार
अलंकार बिन किस तरह, कवि लाये झंकार ।।

घट पनघट घूंघट नहीं, निर्वासित है लाज
बन्द बोतलों में तृषा, यही सत्य है आज ।।

प्रियतम की पाती गई, गए अबोले बैन
रहे न अब वे डाकिया, जिनको तरसें नैन ।।

अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, July 9, 2017

*रोला छन्द* - *गुरु पूर्णिमा की शुभकामनायें*

*गुरु पूर्णिमा की शुभकामनायें*

गुरु की महिमा जान, शरण में गुरु की जाओ
जीवन  बड़ा  अमोल, इसे  मत  व्यर्थ गँवाओ
दूर   करे   अज्ञान , वही   गुरुवर   कहलाये
हरि  से  पहले  नाम, हमेशा  गुरु  का  आये ।।

*अरुण कुमार निगम*
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Monday, July 3, 2017

गजल : खुशी बाँटने की कला चाहता हूँ

गजल : खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँ

न पूछें मुझे आप  क्या  चाहता हूँ
खुशी  बाँटने की  कला  चाहता हूँ |

गज़ल यूँ लिखूँ लोग गम भूल जायें
ये समझो सभी का भला चाहता हूँ |

बिना कुछ पिये झूमता ही रहे दिल  
पुन: गीत डम-डम डिगा चाहता हूँ |

न कोला न थम्सप न फैंटा न माज़ा
मृदा का बना  मैं  घड़ा  चाहता हूँ |

न पिज्जा न बर्गर न मैगी न नूडल
स्वदेशी  कलेवा  सदा  चाहता हूँ |

पुरस्कार के सच लगे दण्ड जैसे
इन्हें अब नहीं भोगना चाहता हूँ |

उठा आज डॉलर गिरा क्यों रुपैया
यही  प्रश्न  मैं  पूछना चाहता हूँ |

कहाँ खो गये प्रेम के ढाई आखर
मुझे साथ दो, ढूँढना चाहता हूँ |

हमें आ गया याद गाना पुराना
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ

अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, July 2, 2017

गजल

शायद असर होने को है...


माँगने हक़ चल पड़ा दिल दरबदर होने को है
खार ओ अंगार में इसकी बसर होने को है |

बात करता है गजब की ख़्वाब दिखलाता है वो
रोज कहता जिंदगी अब, कारगर होने को है |

आज ठहरा शह्र में वो, झुनझुने लेकर नए
नाच गाने का तमाशा रातभर होने को है |

छीन कर सारी मशालें पी गया वो रोशनी
फ़क्त देता है दिलासा, बस सहर होने को है |

अब हकीकत को समझने लग गए हैं सब यहाँ
मुफलिसों की आह का शायद असर होने को है |


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)