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Monday, July 8, 2019

गजल

ले के सहारा झूठ का सुल्तान बन गए
ज्यों ताज सिर पे आ गया हैवान बन गए।

आवाम के जज़्बात की तो कद्र ही नहीं
लाठी उठाई हाथ में भगवान बन गए।

सब को बड़ी उम्मीद थी फस्लेबहार की
सपनों के सब्जेबाग़ अब वीरान बन गए।

घर में हमारे आग के शोले भड़क उठे
उनको किया जो इत्तिला नादान बन गए।

किस्मत में तेरी गम लिखा है भोग ले "अरुण"
गदहे भी अब के दौर में विद्वान बन गए।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

Saturday, June 22, 2019

"चंदैनी गोंदा के प्रमुख स्तंभ"

"चंदैनी गोंदा के प्रमुख स्तंभ"

*दाऊ रामचन्द्र देशमुख, खुमानलाल साव, लक्ष्मण मस्तुरिया और कविता वासनिक*

दाऊ रामचंद्र देशमुख की कला यात्रा "देहाती कला विकास मंच", "नरक और सरग", "जन्म और मरण", "काली माटी" आदि के अनुभवों से परिपक्व होती हुई 1971 में चंदैनी गोंदा के जन्म का कारण बनी। "चंदैनी गोंदा" के विचार को जनमानस तक पहुँचाने के लिए सिद्ध-हस्त प्रतिभाओं की खोज जरूरी थी। कला पारखी दाऊ रामचंद्र देशमुख को ऐसी प्रतिभाएँ दुर्लभ संयोग से मिलीं। राजनाँदगाँव में ठाकुर हीरा सिंह गौतम ने लोक संगीत में मर्मज्ञ खुमानलाल साव की सौगात दी। राजनाँदगाँव ने ही कोकिल कंठी कविता हिरकने (अब कविता वासनिक) जैसी प्रतिभा से परिचय कराया तो आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित कविसम्मेलन को सुनकर  दाऊ जी की नजर में गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया, आए।

यदि दाऊ रामचन्द्र देशमुख को जौहरी कहा जाए तो खुमान लाल साव, लक्ष्मण मस्तुरिया और कविता वासनिक को नैसर्गिक रत्न कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं होगा। कितना भी कुशल जौहरी हो, पत्थर को तराश कर रत्न नहीं बना सकता। तराशने के लिए अनगढ़ रत्न की ही जरूरत होती है। रत्न का मूल्य तभी बढ़ता है जब उसे कोई जौहरी तराशे। जौहरी का भी मान तभी बढ़ता है जब वह रत्न को तराश कर उसे कीमती बना दे। इस प्रकार दाऊ रामचन्द्र देशमुख, खुमानलाल साव, लक्ष्मण मस्तुरिया और कविता वासनिक एक दूसरे का सानिध्य पा कर चंदैनी गोंदा के चार प्रमुख स्तंभ बने। ये चारों ही एक दूसरे का पर्याय बन चुके हैं। इन चारों स्तंभों पर ही टिकी है चंदैनी गोंदा की गगनचुम्बी इमारत।

दाऊ जी के स्तंभ को उनकी वर्षों की कला यात्रा ने मजबूती दी। खुमान लाल साव के स्तंभ को मजबूती देने वाले गिरिजाशंकर सिन्हा, संतोष टाँक, महेश ठाकुर, पंचराम देवदास रहे। लक्ष्मण मस्तुरिया के गीत तो उनकी स्वयं की बनाई लय के अनुरूप माधुर्य का भंडार समेटे थे किंतु ताल के अनुरूप लाने का श्रेय दाऊ जी और खुमान लाल साव को जाता है। इन्हीं दोनों की छत्रछाया में कविता वासनिक के सुर जनमानस को बाँधने में कामयाब हुए।

चंदैनी गोंदा की चर्चा हो और कवि रविशंकर शुक्ल, वरिष्ठ गायक व अभिनेता भैयालाल हेड़ाऊ, वरिष्ठ गायिका संगीता चौबे और अनुराग ठाकुर के जिक्र के बिना अधूरी ही रह जायेगी। शिव कुमार दीपक, संतोष झांझी, लीना महापात्र, केदार यादव, साधना यादव को भला कैसे बिसराया जा सकता है। चंदैनी गोंदा में छत्तीसगढ़ के तिरसठ कलाकार हुआ करते थे। रविशंकर शुक्ल और लक्ष्मण मस्तुरिया के साथ ही छत्तीसगढ़ के अनेक गीतकारों, कवियों की रचनाएँ चंदैनी गोंदा के लिए संगीतबद्ध की गई थीं। कोदूराम "दलित", द्वारिकप्रसाद तिवारी "विप्र", हनुमन्त नायडू, हरि ठाकुर, पवन दीवान, हेमनाथ यदु, रामरतन सारथी, रामेश्वर वैष्णव, मुकुंद कौशल आदि कवियों के गीत चंदैनी गोंदा में शामिल थे।

चंदैनी गोंदा का प्रथम प्रदर्शन 07 नवम्बर 1971 को बघेरा में हुआ था। 1981 तक इसके 99 प्रदर्शन होने में बाद कहा जाता है कि दाऊ जी ने "कारी" के मंचन पर स्वयं को केंद्रित करते हुए अपनी सर्जना "चंदैनी गोंदा" का विसर्जन कर दिया। इसके पश्चात खुमानलाल साव ने स्वतंत्र रूप से चंदैनी गोंदा (छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रम) का संचालन जीवन पर्यन्त किया।

चंदैनी गोंदा के विसर्जन के संबंध में एक साक्षात्कार के दौरान वीरेंद्र बहादुर सिंह ने प्रश्न किया था - "कुछ वर्ष पूर्व चंदैनी गोंदा के विसर्जन की खबर भी उड़ी थी, इस पर आपको क्या कहना है ? प्रत्युत्तर में खुमानलाल साव ने कहा था - "यह खबर कुछ विघ्न संतोषियों द्वारा उड़ाई गई थी। चंदैनी गोंदा कोई देव प्रतिमा नहीं है जिसका पूजन के बाद विसर्जन का दिया जाए। जब तक छत्तीसगढ़ के लोगों का स्नेह मिलता रहेगा, चंदैनी गोंदा की अविराम यात्रा जारी रहेगी"। इस उत्तर के अनुरूप चंदैनी गोंदा की अविराम यात्रा आज भी अविराम चल रही है।

जैसा कि ऊपर कहा गया है, खुमानलाल साव ने स्वतंत्र रूप से चंदैनी गोंदा (छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच) का संचालन 1981 से जीवन पर्यन्त करते रहे। दाऊ रामचंद्र देशमुख के जीवन काल में भी इसका मंचन होता रहा है जिससे यह प्रतीत होता है कि दाऊ जी की भी सहमति रही होगी अन्यथा वे आपत्ति जरूर प्रकट करते।

मैं उस पीढ़ी से हूँ जिसे ग्राम बघेरा स्थित दाऊ जी की हवेली में चंदैनी गोंदा में कलाकारों को रिहर्सल करते हुए देखने का सौभाग्य प्राप्त है। मैंने दाऊजी द्वारा सृजित चंदैनी गोंदा के कई मंच रात भर जाग कर देखे हैं। मैंने खुमानलाल साव के संचालन में चंदैनी गोंदा (छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक मंच) की प्रस्तुति देखी है। मुझे कविता वासनिक की कविता यामिनी और अनुराग-धारा
भी देखने का सौभाग्य प्राप्त है। चंदैनी गोंदा की टीम के साथ जबलपुर में जाकर दो आडियो कैसेट्स "मया-मंजरी" और "छत्तीसगढ़ के माटी अंव" की रिकार्डिंग भी करवाई है।

विगत पाँच दशकों से चंदैनी गोंदा को जान-सुन रहा हूँ। मैं सोचता हूँ कि यदि खुमानलाल साव ने चंदैनी-गोंदा का संचालन नहीं किया होता तो मेरे बाद की पीढ़ी "चंदैनी गोंदा" में नाम से अपरिचित ही रह जाती । धन्य हैं खुमानलाल साव जिन्होंने चंदैनी गोंदा को स्मृतियों में खोने नहीं दिया, किन्तु उनके जाने के बाद अब क्या होगा ? क्या चंदैनी गोंदा के कलाकार उसी गरिमा के साथ इसके अस्तित्व को बनाये रख पाएंगे ? या कविता विवेक वासनिक को ही एक नई जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। देखें आने वाला वक्त इन प्रश्नों का क्या उत्तर देता है।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Tuesday, June 4, 2019

अरुण के दुमदार दोहे

अरुण के दुमदार दोहे -

हमें लगे तो रीत है, उन्हें लगे तो चोट।
हम सस्ते-से नारियल, वे महँगे अखरोट।।
मगर हम मान दिलाते।
चोट हम नहीं दिखाते।।

हम दुर्बल से बाँस हैं, वे सशक्त सागौन।
जग के काष्ठागार में, हमें पूछता कौन ?
शोर हम नहीं मचाते।
बाँसुरी मधुर सुनाते।।

उनके सीने पर पदक, नयनों में है भेद।
हम रखते हैं प्रेम-दृग, सीने में हैं छेद।।
भले वे भाग्य विधाता।
किन्तु हम हैं निर्माता।।

हम अनुभव से जानते, किसकी क्या औकात।
लेकिन हम कहते नहीं, अपने मन की बात।।
मौन को समझो भाई।
मौन में शक्ति समाई।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Monday, June 3, 2019

"मैं की बीमारी" - अरुण कुमार निगम

"मैं की बीमारी" - अरुण कुमार निगम

मैं मैं मैं की बीमारी है
खुद का विपणन लाचारी है।

मीठी झील बताता जिसको
देखा चख कर वह खारी है।

पैर कब्र में लटके लेकिन
आत्म-प्रशंसा ही जारी है।

कई बार यह भ्रम भी होता
मनुज नहीं वह अवतारी है।

सभागार में लोग बहुत पर
माइक से उसकी यारी है।

है जुगाड़ मंत्री से उसका
इसीलिए तो दमदारी है।

"अरुण" निकट मत उसके जाना
उसको मैं की बीमारी है।।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

Tuesday, May 28, 2019

कोचिंग सेंटर

कोचिंग सेंटर पर शायद एक दकियानूसी विचार.......

हमने साठ के दशक में प्राथमिक शाला के पाठ्यक्रम में बालभारती के अलावा सुलभ बाल कहानियाँ भी पढ़ीं। इनमें नैतिक शिक्षा देती हुई कहानियाँ हुआ करती थीं। इस युग में नैतिकता को पाठ्यक्रम में स्थान शायद नहीं है।

पहले हम बाजार की दुकान जाकर समान लाते थे, अब दुकानें घर पहुँच सेवाएँ दे रही हैं। विदेशी कंपनियों के आगमन ने उपभोक्तावाद को जन्म दिया। वस्तु और सेवा के साथ-साथ शिक्षा का भी बाजारीकरण हो गया। बाजार में दुकानें बढ़ीं तो प्रतिस्पर्धाएँ बढ़ीं। इसी कारण घर पहुँच सेवा ने जन्म लिया। अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुले, विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी। प्रतिस्पर्धा बढ़ी। कोचिंग की दुकानें खुलीं। स्कूल और कोचिंग सेंटर ने बाजार का रूप ले लिया। और फिर...

सपने झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए श्रृंगार सभी, बाग के बबूल से
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।

बच्चों का कैरियर बनाने में माँ बाप कैरियर विहीन हो गए। चेहरे पर मुखौटा लगा कर गर्व से बता रहे हैं कि बेटा कनाडा में है, बेटी ऑस्ट्रेलिया में है, वगैरह वगैरह। लेकिन उनका दिल जानता है कि कैरियर बखान के मखमली पर्दे के पीछे दीमक लगा हुआ एक जर्जर दरवाजा है।

हरक्यूलिस, एटलस, हीरो सायकिल के जमाने में एक बच्चे को हैंडिल में पिंजरा फँसा कर और दूसरे बच्चे को कैरियर में बिठा कर शहर और बाग की सैर कराने वाला पिता अब केयर के लिए तरस रहा है। फिर भी स्कूल और कोचिंग सेंटर फल फूल रहे हैं क्योंकि प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में प्रगतिशील विचार ही तो काम आते हैं। दकियानूसी विचारों को भला कौन अपनाता है।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर दुर्ग
छत्तीसगढ़

Wednesday, May 22, 2019

"मैं" का मोह

"मैं" का मोह

जिस तरह किसी ब्याहता के हृदय में "मैका-मोह" समाया होता है, उसी तरह इस नश्वर संसार के हर क्षेत्र में "मैं-का" मोह चिरन्तन काल से व्याप्त है। जिसने इस मोह पर विजय प्राप्त कर ली, समझो कि उसने मोक्ष को प्राप्त कर लिया। एक अति बुजुर्ग साहित्यकार की रुग्णता का समाचार मिला तो उनकी खैरियत पूछने उनके घर चला गया। अस्वस्थ होने की हल्की सी छौंक देने के बाद वे दो घण्टे तक अविराम अपनी उपलब्धियाँ ही गिनाते रहे। शायद स्वस्थ व्यक्ति भी इस्टेमिना के मामले में इनसे हार जाए। मैंने ऐसा किया, मैंने वैसा किया। मैंने इसको बनाया, मैंने उसको बनाया। सुनकर ऐसा लगने लगा कि इनसे पहले साहित्य का संसार मरुस्थल रहा होगा। श्रीमान जी के प्रयासों से ही वह मरुस्थल, कानन कुंज में परिवर्तित हो पाया और इनके निपट जाने के बाद फिर से यह संसार, मरुभूमि में तब्दील हो जाएगा।

कैसी विडंबना है कि जिस उम्र में इनकी उपलब्धियों को संसार को गिनाना चाहिए उस उम्र में वे स्वयं की उपलब्धियाँ गिना रहे हैं। कहने को तो ऐसे शख्स यह भी कहते नहीं थकते कि नवोदित रचनाकारों के लिए मेरे घर के दरवाज़े चौबीसों घंटे खुले हैं किंतु भूले से भी कोई नवोदित उनके दरवाजे से अंदर चला गया तो सिखाना तो दूर, केवल अपनी उपलब्धियाँ ही गिनाते रहेंगे। वैसे अपनी उपलब्धियाँ गिनाना कोई बुरी बात नहीं है। जरूर गिनाना चाहिए तभी तो नई पीढ़ी उनके अभूतपूर्व योगदान से परिचित हो पाएगी वरना उनके समकालीन सभी तो खुद "मैं" के मोह में उलझे हुए हैं, भला वे किसी दूसरे की उपलब्धियाँ कैसे गिना पाएंगे ?

"मैं" के मोह की ही तरह कुछ लोगों का "माइक-मोह" भी नहीं छूट पाता। ऐसे लोग समारोह में तभी हाजिरी देते हैं जब उन्हें माइक में बोलने का मौका मिले। चाहे अतिथि के रूप में बुलाये जाएँ, चाहे वक्ता के रूप में, चाहे संचालक के रूप में बुलाये जाएँ। माइक मिलने के चांस हैं तो हाजिरी जरूर देते हैं चाहे जबरदस्ती ठसना क्यों न पड़े और ज्योंहि माइक हाथ में आता है, "मैं" का राग चालू हो जाता है। अगर विमोचन समारोह है तो लेखक गौण हो जाता है और ऐसा लगता है कि मैं-वादी ने ही लेखक को कलम पकड़ना सिखाया था। किसी का सम्मान हो रहा हो तो ऐसा लगता है कि इन्हीं मैं-वादी के सानिध्य में बेचारा गरीब सम्मानित होने योग्य बन पाया है। कभी-कभी शोक सभा तक में मैं का भूत ऐसा हावी रहता है कि दिवंगत ही गौण हो जाता है।

नीरज की पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

जिंदगी-भर तो हुई गुफ्तगू गैरों से मगर,
आज तक हमसे न हमारी मुलाकात हुई।

काश ! हम "मैं" से मिलने की कभी कोशिश तो करें फिर मैं-मैं मैं-मैं करने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी और हाँ, "मैं" से संवाद करने के लिए किसी "माइक" की भी जरूरत नहीं पड़ती। "मैं" से साक्षात्कार अगर हो गया तब मैके की याद आएगी -

वो दुनिया मेरे बाबुल का घर (मैका), ये दुनिया ससुराल
जा के बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Monday, May 20, 2019

सुमित्रानंदन पंत की जयंती पर कुछ अरुण-दोहे


प्रकृति-सौंदर्य के कुशल चितेरे, छायावाद के प्रमुख स्तंभ कवि सुमित्रानंदन पंत की जयंती पर

कुछ अरुण-दोहे :

पतझर जैसा हो गया, जब ऋतुराज वसंत।
अरुण! भला कैसे बने, अब कवि कोई पंत।।

वृक्ष कटे छाया मरी, पसरा है अवसाद।
पनपेगा कंक्रीट में, कैसे छायावाद।।

बहुमंजिला इमारतें, खातीं नित्य प्रभात।
प्रथम रश्मि अब हो गई, एक पुरानी बात।।

विधवा-सी प्राची दिखे, हुई प्रतीची बाँझ।
अम्लों से झुलसा हुआ, रूप छुपाती साँझ।।

खग का कलरव खो गया, चहुँदिश फैला शोर
सावन जर्जर हो गया, व्याकुल दादुर मोर।।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़