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Saturday, May 30, 2020

कोरोना - एक संकेत

सम्हलने, समझने, सीखने, सुधरने का संकेत समझा रहा है कि.........

समझ प्रकृति के तेवर -
Now   Or   Never
काम    नहीं    आएंगे
धन, संपत्ति और जेवर

- अरुण कुमार निगम

#कोरोना-कहर

Friday, May 22, 2020

"मैं" का मोह

"मैं" का मोह

जिस तरह किसी ब्याहता के हृदय में "मैका-मोह" समाया होता है, उसी तरह इस नश्वर संसार के हर क्षेत्र में "मैं-का" मोह चिरन्तन काल से व्याप्त है। जिसने इस मोह पर विजय प्राप्त कर ली, समझो कि उसने मोक्ष को प्राप्त कर लिया। एक अति बुजुर्ग साहित्यकार की रुग्णता का समाचार मिला तो उनकी खैरियत पूछने उनके घर चला गया। अस्वस्थ होने की हल्की सी छौंक देने के बाद वे दो घण्टे तक अविराम अपनी उपलब्धियाँ ही गिनाते रहे। शायद स्वस्थ व्यक्ति भी इस्टेमिना के मामले में इनसे हार जाए। मैंने ऐसा किया, मैंने वैसा किया। मैंने इसको बनाया, मैंने उसको बनाया। मैंने इतने हजार कविसम्मेलन किये, मुझ पर इतने लोगों ने पी एच डी की, मैं फलानी संस्था का फॉउंडर मेम्बर हूँ, ढेकानी संस्था का संस्थापक हूँ, अमका-ढमका विधा का प्रवर्त्तक हूँ आदि-आदि। सुनकर ऐसा लगने लगा कि इनसे पहले साहित्य का संसार मरुस्थल रहा होगा। श्रीमान जी के प्रयासों से ही वह मरुस्थल, कानन कुंज में परिवर्तित हो पाया और इनके निपट जाने के बाद फिर से यह संसार, मरुभूमि में तब्दील हो जाएगा।

कैसी विडंबना है कि जिस उम्र में इनकी उपलब्धियों को संसार को गिनाना चाहिए उस उम्र में वे स्वयं की उपलब्धियाँ गिना रहे हैं। कहने को तो ऐसे शख्स यह भी कहते नहीं थकते कि नवोदित रचनाकारों के लिए मेरे घर के दरवाज़े चौबीसों घंटे खुले हैं किंतु भूले से भी कोई नवोदित उनके दरवाजे से अंदर चला गया तो सिखाना तो दूर, केवल अपनी उपलब्धियाँ ही गिनाते रहेंगे। वैसे अपनी उपलब्धियाँ गिनाना कोई बुरी बात नहीं है। जरूर गिनाना चाहिए तभी तो नई पीढ़ी उनके सच्चे-झूठे अभूतपूर्व योगदान से परिचित हो पाएगी वरना उनके समकालीन सभी तो खुद "मैं" के मोह में उलझे हुए हैं, भला वे किसी दूसरे की उपलब्धियाँ कैसे गिना पाएंगे ?

"मैं" के मोह की ही तरह कुछ लोगों का "माइक-मोह" भी नहीं छूट पाता। ऐसे लोग समारोह में तभी हाजिरी देते हैं जब उन्हें माइक में बोलने का मौका मिले। चाहे अतिथि के रूप में बुलाये जाएँ, चाहे वक्ता के रूप में, चाहे संचालक के रूप में बुलाये जाएँ। माइक मिलने के चांस हैं तो हाजिरी जरूर देते हैं चाहे जबरदस्ती ठसना क्यों न पड़े और ज्योंहि माइक हाथ में आता है, "मैं" का राग चालू हो जाता है। अगर विमोचन समारोह है तो लेखक गौण हो जाता है और ऐसा लगता है कि मैं-वादी ने ही लेखक को कलम पकड़ना सिखाया था। किसी का सम्मान हो रहा हो तो ऐसा लगता है कि इन्हीं मैं-वादी के सानिध्य में बेचारा गरीब सम्मानित होने योग्य बन पाया है। कभी-कभी शोक सभा तक में मैं का भूत ऐसा हावी रहता है कि दिवंगत ही गौण हो जाता है।

नीरज की पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

जिंदगी-भर तो हुई गुफ्तगू गैरों से मगर,
आज तक हमसे न हमारी मुलाकात हुई।

काश ! हम "मैं" से मिलने की कभी कोशिश तो करें फिर मैं-मैं मैं-मैं करने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी और हाँ, "मैं" से संवाद करने के लिए किसी "माइक" की भी जरूरत नहीं पड़ती। "मैं" से साक्षात्कार अगर हो गया तब मैके की याद आएगी -

वो दुनिया मेरे बाबुल का घर (मैका), ये दुनिया ससुराल
जा के बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे
लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे

लेखक - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Wednesday, May 20, 2020

सुमित्रानंदन पंत जयंती पर दोहे

प्रकृति-सौंदर्य के कुशल चितेरे, छायावाद के प्रमुख स्तंभ कवि सुमित्रानंदन पंत की जयंती पर 



कुछ अरुण-दोहे :

पतझर जैसा हो गया, जब ऋतुराज वसंत।
अरुण! भला कैसे बने, अब कवि कोई पंत।।

वृक्ष कटे छाया मरी, पसरा है अवसाद।
पनपेगा कंक्रीट में, कैसे छायावाद।।

बहुमंजिला इमारतें, खातीं नित्य प्रभात।
प्रथम रश्मि अब हो गई, एक पुरानी बात।।

विधवा-सी प्राची दिखे, हुई प्रतीची बाँझ।
अम्लों से झुलसा हुआ, रूप छुपाती साँझ।।

खग का कलरव खो गया, चहुँदिश फैला शोर
सावन जर्जर है "अरुण", व्याकुल दादुर मोर।।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Sunday, May 17, 2020

"छत्तीसगढ़ी कविताओं में किसान और खेतिहर मजदूर की पीड़ा"


"छत्तीसगढ़ी कविताओं में किसान और खेतिहर मजदूर की पीड़ा"

प्रशंसा "मुक्त-कण्ठ" से होती है तो पीड़ा को "हृदय" से महसूस किया जाता है। जिनके लिए न तालियाँ बजीं, न थालियाँ बजीं, न शंख फूँके गए, न दीप जलाए गए, न बिना किसी आग्रह के पटाखे फोड़े गए और न ही आतिशबाजियाँ की गईं। आज कुछ  कविताओं के अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ जिनमें छत्तीसगढ़ी भाषा के कवियों ने किसान और खेतिहर मजदूर की पीड़ा को हृदय से महसूस किया है। ये पंक्तियाँ ही किसान और खेतिहर मजदूरों के सम्मान में काव्यांजलि स्वरूप समर्पित हैं।

लॉकडाउन के दौरान अमीर हो या गरीब, एक मात्र "भोजन" ही सबके जीवन सहारा रह गया है। भोजन में अनाज और सब्जियाँ ही प्रमुख हैं। ये बात और है कि पाक-कला में निपुण लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार डिशेज़ तैयार करके क्षुधा को शांत कर रहे हैं किन्तु खरीफ और रबी की फसलें और सब्जियाँ ही इन डिशेज़ के मूल में हैं। यदि कोई दुग्ध का उदाहरण सोच रहा है तो बता दूँ कि दुग्ध-उत्पादन भी कृषि उद्योग का ही अंग है। बकरी-पालन, मुर्गी-पालन और मछली पालन भी कृषि उत्पादन के अंतर्गत ही आते हैं। इस प्रकार मानव-जीवन का अस्तित्व आज केवल और केवल किसानों के कारण ही बचा हुआ है। सारी मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पाद गोदामों में कैद होकर रह गए।

अब तो किसान को धरती का भगवान मानने में किसी को भी हिचक नहीं होनी चाहिए। जो भगवान बन कर आज मानव जीवन की रक्षा कर रहा है, उसके दुःखों से कौन द्रवित होता है ? उसके सुख के लिए कौन सोचता है ? सियासत इन किसानों पर तब मेहरबान होती है, जब चुनाव सामने होते हैं। संकट के समय भी इन किसानों के लिए न ताली बजती है, न थाली बजती है, न शंख फूँके जाते हैं और न ही दीप जलाए जाते हैं। किसान की पीड़ा को केवल संवेदनशील जनता, कवि, साहित्यकार और पत्रकार ही महसूस कर सकते हैं। पत्रकार किसानों के मुद्दों को सामने लाते हैं तो कवि और साहित्यकार  किसानों की पीड़ा को स्वर देते हैं। कवि ही हैं जो कविता करते समय किसान को अपने अंतर्मन में जीते हैं।

आइए आज छत्तीसगढ़ी भाषा के कुछ बहुत पुराने और कुछ बिल्कुल नए कवियों की उन कविताओं पर दृष्टिपात करें जिनमें किसान या कहिए कि भुइयाँ के भगवान की पीड़ा को अपनी कविताओं में शब्दांकित करने का प्रयास हुआ है -

जनकवि कोदूराम "दलित" के सार छन्द के अंश -

जाड़-घाम,बरखा के दु:ख -सुख ,सहय  किसान बिचारा।
दाई-ददा असन वो डारय, सबके  मुंह-मा  चारा।।

पहिनय,ओढ़य कमरा-खुमरी, चिरहा असन लिंगोटी।
पीयय पसिया-पेज,खाय कनकी-कोंढ़ा के रोटी।।

जेकर लहू-पसीना लक्खों रंग-महल सिरजावय।
सब-ला सुखी देख,जे छितका कुरिया-मा सुख पावय।।

कवि गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया की फ़िल्म मया-मंजरी में उनके लिखे, उन्हीं के गाए और उन्हीं पर फिल्माए गए इस गीत देखें (यह फ़िल्म अभी तक रिलीज़ नहीं हो पाई है)

तँय भुइयाँ के भगवान रे भइया, भुइयाँ के भगवान
अन उपजैया परसय जीतय जोगी जति किसान रे भइया

झाँझ घाम बरखा जाड़ा सह बजुर बने तोर काया
खेतखार गाँव दुनिया तोरे तँय सरधा के छाया
तोरे मेहनत के फल फूल मा फूले सकल जहान...

भिखमंगा ये जग के आगू एक सिर्फ तँय दाता
करम धरम ईमान संग तोर साथी एक विधाता
तोर तपस्या दुख पीरा मा जागे देस महान…..

लक्ष्मण मस्तुरिया जी के एक अन्य गीत में किसान की पीड़ा कुछ इस तरह से व्यक्त की गई है -

सोन उगाथंव माटी खाथंव, मान ला दे के हाँसी पाथंव

बेरा आँटत उमर पहागे, सुनत गारी कान पिरागे
अतिया देखत आँसू आगे, भूँसा के भुर्री गुंगवागे

मस्तुरिया जी के इस गीत में किसान अपने पुत्र को भी किसान बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा है -

मोर राजा दुलरुवा बेटा तँय नाँगरिहा बन जाबे
सुख दुख के बंजर मा भइया बिखहर मोखरा काँटा हे
भाग मा तोरे करतब करे बर परती भुइयाँ भाँठा हे
पानी पियाए बर धरती ला बदरिया बन जाबे

कवि गीतकार हरि ठाकुर जी ने खेतों को खलिहान में बदलने ली पीड़ा देखी, खेतों के मालिक को मजदूरी करते देखा। किसानों की कर्ज में डूबते हुए देखा तो उनके अंतस का दर्द शब्दों में इस तरह प्रतिबिंबित हुआ -

सबे खेत ला बना दिन खदान
किसान अब का करही
कहाँ बोही काहां लूही धान
किसान अब का करही

काली तक मालिक वो रहिस मसहूर
बनके वो बैठे हे दिखे मजदूर।
लागा बोड़ी में बुड़गे किसान

संतकवि पवन दीवान को ठहाके मार कर हँसते हुए सबने सुना और देखा लेकिन उनके भावुक हृदय में सिसकती हुई कृषक की पीड़ा को कितनों ने देखा ? महंगाई से जूझते किसान, उनकी कृषिभूमि पर गैर कृषकों का कब्जा …..सदैव के लिए अनुत्तरित प्रश्न - कइसे करै किसान ?

सब चीज महंगी होगे, छुटे चहत परान।
करलई हे भगवान बतावव कइसे करै किसान।।

जोत जोत के मरै किसनहा, दूसर बनगे राजा।
हमर पेट हर ऊंखर होगे, बर बिहाव के बाजा।।
खेत सुखाके पानी गिरही, कइसे फुलबो फरबो ना।

कवि मुरली चंद्रकार ने सबका पेट भरने वाले किसान के भूखे पेट से साक्षात्कार किया तब देखा कि उसकी छाती पर सवार क्रूर समय, यमराज की भाँति आसीन है -

तोरेच कमई मा सबो भुकरत हे
बनियां बेपारी येहूँ डकरत हे
बीता भर पेट के खातिर तोला
विधि ह गढ़ दिस किसान ||

जियत भरके खटिया गोरसी
चोंगी माखुर मा निपटे रे बरसी
छाती में तोर जम-राजा अस
चढ़े हावे संझा बिहान ||

कवि रघुवीर अग्रवाल "पथिक" के कृषक और खेतिहर मजदूर को कठोर परिश्रम करने के बावजूद भूख से मरते हुए देखा -

बस उही किसम, जेला जग कथै अन्नदाता
जे मन चारा दे पेट जगत के भरत हवैं
ये धरती के बेटा किसान, बनिहार आज
बड़ मिहनत करके घलो, भूख मा मरत हवैं।

कवि बलदाऊ राम साहू ने शोषित कृषक के श्रम को पानी के मोल बिकते देखा, उनके श्रम को रौंदकर फलते-फूलते कोचिया और व्यापारी को देखा, साथ ही भूमिस्वामी को भूमिहीन होते देखा तब कवि की पीड़ा शब्दों में कुछ इस तरह से ढली -

किसान के पसीना के नइये मोल
कोचिया मन के गाल हर लाल होगे।
जेला कहन दाऊ किसान अउ मालिक हम मन
उही मन अब इहाँ नौकर अउ बनिहार होगे।

कवि बुधराम यादव, कर्ज में डूबे किसान की पीड़ा को महसूस करते हुए कहते हैं -

खेती-पाती पाला परगे, मुड़ चढ़गे करजा-बोड़ी
बारी बखरी खेत हे गिरवी, बेचा गंय बैला-जोड़ी।
चिंता म चतुराई घट गय, फांदा धरे किसान।।

अब आइए, छन्द के छ परिवार के कुछ चिरपरिचित और कुछ अपरिचित कवियों के मन की पीड़ा को बिना किसी भूमिका के महसूस करें। इनकी सशक्त लेखनी ही इनकी प्रतिभा का परिचय दे रही है -

 छन्दकार चोवाराम "बादल " (मनहरण घनाक्षरी)

काँटा खूँटी बीन-बान, काँदी-दूबी छोल चान, डिपरा ला खंती खन, खेत सिरजाय जी ।
घुरुवा के खातू पाल, सरे गोबर माटी चाल, राखड़ ल बोरी बोरी, छींच बगराय जी ।
बिजहा जुगाड़ करे, बोरी बोरा नाप धरे, नाँगर सुधार करे, जोखा ल मढ़ाय जी ।
सबो के तैयारी करे, राहेर ओन्हारी धरे ,बरखा असाड़ के ला , किसान बलाय जी ।

छन्दकार - आशा देशमुख (गीतिका छंद)

हाँथ जोड़व मुड़ नवावँव ,भूमि के भगवान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव ,कर्म पूत किसान हो।

आज तुँहरे दुख सुनैया ,नइ मिलय संसार मा।
सब अपन मा ही लगे हे ,एक होय हज़ार मा।
ये जगत के आसरा हव ,दीन जीव मितान हो।
गुन तुँहर कतका गिनावँव,भूमि पूत किसान हो।3।

छन्दकार - दिलीप कुमार वर्मा (रोला छंद)

कहाँ किसानी खेल, परे जाँगर ला पेरे।
कतको हपट कमाय, तभो दुख भारी घेरे।।
दिन-दिन हो बदहाल, सोर कोनो नइ लेवय।
कइसे करय किसान, करज काला ओ देवय।।

छन्दकार कन्हैया साहू 'अमित' (सुजान छंद)

जग के उठाय भार खाँध, धन्य तोर काम।
लाँघन मरै किसान, भरय, सेठ के गुदाम।।
करजा करै कमाय गजब, आस घात जोर।
लहुटें सबो दलाल, फसल, लेगजँय बटोर।।

छन्दकार सुखदेव सिंह अहिलेश्वर - (उल्लाला छन्द)

हालात नइ सुधरे आज ले, काबर हमर किसान के।
सुध लेही आखिर कोन हा, भुइयाँ के भगवान के।।

छन्दकार मोहनलाल वर्मा (विष्णुपद छन्द)

लागा बोड़ी के संसो मा, देख किसान मरे।
होवत नइये फसल थोरको, जी के काय करे।।
छन्दकार अजय अमृतांशु (सरसी छ्न्द)
पेट ह खाली जीही कइसे, रोवत हवय किसान।
नरक सहीं जिनगी हा होगे, होही कभू बिहान।।

छन्दकार - हेमलाल साहू (कुकुभ छन्द)

धरती दर्रा फाटत हावय, कइसे करबो हम बोनी।
नई सुहावै दाना पानी, कइसे धोवत अनहोनी।।

छन्दकार -  ज्ञानुदास मानिकपुरी (घनाक्षरी)

नाँगर बइला साथ, चूहय पसीना माथ
सुआ ददरिया गात, उठत बिहान हे।
खाके चटनी बासी ला, मिटाके औ थकासी ला
भजके अविनासी ला, बुता मा परान हे।
गरमी या होवय जाड़ा, तीपे तन चाहे हाड़ा
मूड़ मा बोह के भारा, चलत किसान हे।
करजा लदे हे भारी, जिनगी मा अँधियारी
भूल के दुनियादारी, होठ मुसकान हे।

छन्दकार - दुर्गाशंकर इजारदार (घनाक्षरी छन्द)

घाम जाड़ बरसात, सबो दिन मुसकात,
करम करत हावै, देख ले किसान जी,
करम ल भगवान, करम धरम मान,
पसीना ला अपन तो, माने हे मितान जी,
सहि के जी भूख प्यास, रहिथे जी उपवास,
अन्न उपजाय बर , देथे वो धियान जी,
सनिच्चर इतवार, नइ चिन्हे दिनवार,
भुइंया के सेवा बर, उठथे बिहान जी   !

छन्दकार - जगदीश "हीरा" साहू (हरिगीतिका छन्द)

कर मेहनत दिनरात जे, उपजाय खेती धान के।
सेवा करे परिवार मिल, धरती अपन सब मान के।।
समझे जतन पइसा रखे, हँव बैंक मा वो सोंचथे।
मिलके सबो रखवार मन, गिधवा बने सब नोंचथे।।1।।

छन्दकार - डॉ. मीता अग्रवाल (सरसी छन्द)

माटी के कोरा मा उपजे, किसम किसम के धान।
अन्न-धन्न भंडार भरे बर, मिहनत करय किसान।।

काम बुता कर बासी खावय,तनिक अकन सुसताय।
खेत ख़ार ला बने जतन के,संझा बेरा आय।।

छन्दकार - राम कुमार साहू (सरसी छंद)

करजा बोड़ी मूँड़ लदाये, रोवय देख किसान।
चिंता मन मा एके रहिथे, कइसे होही धान।।

सिधवा मनखे सुन नइ पावय,ताना पीरा ताय।
कोनों फाँसी डोरी झूलय,मँहुरा जहर ल खाय।।

छन्दकार - पोखन लाल जायसवाल (दोहा छन्द)

लाँघन कोनो मत रहय , चिंता करय किसान ।
लहू पछीना छीत के , उपजावय सब धान ।।

करजा बोड़ी बाढ़गे ,बाढ़े बेटी हाय ।
कतका होही धान हा , चिंता हवय समाय ।।

गहना ला गहना धरे , ताकत साहूकार ।
करजा देख खवाय का ,भूखन हे परिवार।।

अरुण कुमार निगम (लवंगलता सवैया)

किसान हवे  भगवान बरोबर  चाँउर  दार  गहूँ सिरजावय ।
सबो मनखे  मन पेट भरें  गरुवा बइला मन प्रान बचावय।
चुगे चिड़िया धनहा-दुनका मुसुवा खलिहान म रार मचावय ।
सदा दुख पाय तभो बपुरा सब ला खुस देख सदा हरसावय।

आलेख - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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चित्र - श्री असकरन दास जोगी की फेसबुक से साभार
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Thursday, May 14, 2020

"लोकल"

"लोकल"

लोकल में है दम बहुत, लोकल के कम दाम
दे हाथों को काम यह, आता भी है काम।
आता भी है काम, सम्हालता अर्थ-व्यवस्था
है लोकल की आज, बड़ी दयनीय अवस्था।
चलो विदेशी जिन्न, भरें फिर से बोतल में
मानें मेरी बात, बहुत दम है लोकल में।।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


Wednesday, May 13, 2020

दोहे में यमक

दोहे में यमक -

"लो कल" के अनुरोध पर, "लोकल" ही उत्पाद।
अपनाकर दिल से करें, गाँधी जी की याद।।

"वोकल" से तारीफ कर, सुन "वो कल" की बात।
गृह-कुटीर उद्योग ही, बदलेंगे हालात।।

"खादी" "खा दी" थी कभी, सभी विदेशी वस्त्र।
जीती अर्थ-लड़ाइयाँ, बिना उठाए शस्त्र।।

- अरुण कुमार निगम

Sunday, May 10, 2020

"छत्तीसगढ़ी कविता में मद्य-निषेध"

"छत्तीसगढ़ी कविता में मद्य-निषेध"

शराब, मय, मयकदा, रिन्द, जाम, पैमाना, सुराही, साकी आदि विषय-वस्तु पर हजारों गजलें बनी, फिल्मों के गीत बने, कव्वालियाँ बनी। बच्चन ने अपनी मधुशाला में इस विषय-वस्तु में जीवन-दर्शन दिखाया। सभी संत, महात्माओं, ज्ञानियों और विचारकों ने शराब को सामाजिक बुराई ही बताया है। छत्तीसगढ़ी कविताओं में मदिरा का गुणगान देखने में नहीं आया है। छत्तीसगढ़ी के कवियों ने मद्यपान का विरोध ही किया गया है।

आइए आज मद्यपान विषय पर छत्तीसगढ़ के कुछ पुराने और नए कवियों की कविताओं से कुछ पंक्तियों का अवलोकन करें -

सर्वप्रथम कवि कोदूराम "दलित" जी के कविता के कुछ अंश -

गुजरिस जब तोर ददा तब तँय, पाए भुइयाँ दू सौ अक्कड़
रुपिया पइसा सोना चाँदी, मँद पी पी के खोए फक्कड़।
तोर ददा बबा मन जीयत भर, कोन्होंच निसा ला छिइन नहीं
मँद मउँहा तो हे गजब दूर, चोंगी माखुर तक पिइन नहीं।।

तइसन के कुल मा राम राम, अइसन निकले तैं हर कपूत
अब घलो नहीं कुछु बिगड़े हे, मँद पीना तज बन जा सपूत।
ये मँद नोहय बिख-जहर आय, घर भर के सत्यानास करे
गँज दिन ले अरे मितान हवस, एखरे चक्कर मा तहूँ परे।

दलित जी की यह एक लम्बी कविता है, जिसका शीर्षक है - "पियइया मन खातिर"। इस कविता में सोलह-सोलह मात्राओं पर यति वाली कुल एक सौ बीस पंक्तियाँ हैं। मेरी जानकारी में दलित जी की यह कविता, मद्यनिषेध पर छत्तीसगढ़ी भाषा की सबसे लम्बी कविता है। उन्होंने मद्यनिषेध पर छत्तीसगढ़ी भाषा में कवित्त भी लिखे हैं। दलित जी ने हिन्दी भाषा में भी मद्यनिषेध पर कविताएँ लिखी हैं। विशेष उल्लेखनीय है कि सन् 1957 में मध्यप्रदेश में मद्यनिषेध सप्ताह के अंतर्गत राज्य-स्तरीय "मद्यनिषेध साहित्य प्रतियोगिता" आयोजित की गई थी जिसमें दुर्ग के कवि कोदूराम "दलित"को प्रथम पुरस्कार मिला था।। द्वितीय पुरस्कार दुर्ग के ही कवि श्री पतिराम साव को मिला था। गाडरवारा की कुमारी सुषमा खाटे को तृतीय पुरस्कार मिला था।

दुर्ग के कवि श्री रघुवीर अग्रवाल "पथिक" ने मद्यनिषेध पर अपने चरगोड़िया में एक शराबी की दुर्गति का सटीक चित्रण किया है -

पियत हवय दारू, रात दिन समारू
गिरे हवै नाली म, सुन गंगाबारू
वोकर पियास ला कुकुर मन बुझावैं
दुरगत सराबी के, देख ले बुधारू।।

छत्तीसगढ़ी भाषा में खैरागढ़ के कवि श्री विनयशरण सिंह की किताब "चल ढक्कन खोल", संभवतः प्रथम किताब होगी जो पूर्णतः "मद्यपान" पर ही लिखी गई है। मुक्तक शैली में लिखी गई इस किताब का मूल स्वर व्यंग्य है।

जइसे जइसे दिन ढरकत हे भट्ठी मा
पीने वाला मन लरकत हें भट्ठी मा
चारों कोती नसा के जादू छाए हे
चोला के नस-नस फरकत हे भट्ठी मा।

भट्ठी हा सरग के दुवार सही लगथे
दारू हा अमृत के धार सही लगथे
दारू  बेचइया हा ता फेर दरूहा परानी ला
सउँहत बरम्हा के अवतार सही लगथे।

अब कुछ नए कलमकारों की प्रतिभा से भी परिचय हो जाए जिन्होंने भारतीय छन्दों में मद्यनिषेध पर अपने उद्गार व्यक्त किये हैं -

ग्राम गिधवा (बेमेतरा) के छंद-साधक हेमलाल साहू अपने "छन्नपकैया छंद" द्वारा मदिरा पीकर वाहन न चलने की सलाह दे रहे हैं -

छन्न पकैया छन्न पकैया, सुरता राख समारू।
कभू चलाबे झन गाड़ी ला, पीके तँय हर दारू।6।

वे जयकारी छन्द में भी सचेत करते हैं -

झन पी दारू मोर मितान
जग मा मिले सदा अपमान।
छोड़ जुआ अउ चित्ती तास
होवय खेत खार धन नास।।

ग्राम हथबन्द के छन्द साधक चोवा राम " बादल" के सरसी छन्द में एक शराबी के चरित्र को दो पंक्तियों में बताया गया है -

पी खा के जी उधम मँचाथें, उन दारू अउ मास ।
जइसे अबड़ खराये कलजुग, गुंडा करथें नास।।

"बादल" जी अपने उल्लाला छन्द के माध्यम से सचेत भी कर रहे हैं -
दारू पीके नाचबे, जम्मो इज्जत सानबे।
माखुर गुटका फाँकबे, खोख खोख तैं खाँसबे ।।

एन टी पी सी कोरबा की छंद-साधिका आशा देशमुख का यह दोहा छन्द, छत्तीसगढ़ी भाषा की भाव-सम्प्रेषण क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है -

जे घर मुखिया दारू बेचय, वो घर कोन बचाये।
पैरावट मा आगी धरके, बीड़ी ला सुलगाये।

अपने सार छंद में भी उन्होंने इन्हीं भावों को कुछ इस तरह से प्रकट किया है -

मुखिया बेंचय दारू ला ता,घर ला कोन बचाही ।
बीड़ी सुलगाबे बारी मा,पैरावट जल जाही।8

बलौदाबाजार के छंद-साधक दिलीप कुमार वर्मा अपने दुमदार दोहे में दमदार बात कही है -

दरुहा सोंचत हे सगा, खाँव कसम मँय आज।
छोड़वँ दारू काल ले, तब बनही सब काज।
आज थोरिक पी लेथौं।
कसम काली बर देथौं।।

वे अपने रोला छंद में मदिरा के दुष्परिणाम भी बता रहे हैं -

राजा होथे रंक, नसा के ये चक्कर मा।
पूँजी सबो सिराय, लगे आगी घर-घर मा।
करथे तन ला ख़ाक, सचरथे सबो बिमारी।
जल्दी आवय काल, बिखरथे लइका नारी।।

बिलासपुर के छन्द-साधक इंजी.गजानंद पात्रे "सत्यबोध" आजकल गजल भी लिख रहे हैं। मद्यनिषेध पर उनका एक शेर देखिए -

हे नाश नशा दारू,  घर-द्वार सबो उजड़े।
सुख शांति खुदे तन ला, शमशान करे मनखे।।

गोरखपुर, कवर्धा के छन्द-साधक सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, "भुजंग प्रयात छंद" में नशे को विनाशकारी बताते हुए उससे बच कर रहने की नसीहत दे रहे हैं -

करौ रोज योगा निरोगी बनौ जी।
रखे सोंच सादा सही मा सनौ जी।
नशा नाशकारी पियावौ न पीयौ।
बिमारी रहे दूर सौ साल जीयौ।

वे अपने "दोहा छन्द" में भी मदिरा के दुष्परिणाम के प्रति सचेत कर रहे हैं -

टँठिया लोटा बेंच के, पीयय दारू मंद।
ते प्रानी के जानले, दिन बाँचे हे चंद।7।

भाटापारा के साधक अजय "अमृतांशु" अपने "त्रिभंगी छन्द" में मद्यनिषेध की बात कुछ इस तरह से करते हैं -

दारू ला पीबे, कम दिन जीबे, दुख के येमा, खान भरे।
पीथस तँय काबर, एक मन आगर, बरबादी हे, जान डरे।
लोटा बेचाये, गारी खाये, दारू पी के, नाश करे ।
कोनो नइ भावय, कुछु नइ पावय, अक्खड़ दरुहा, नाम परे।

ग्राम अल्दा (तिल्दा) के छन्द-साधक मोहन लाल वर्मा "आभार सवैया" में नशा त्यागने के लिए अनुरोध कर रहे हैं -

हीरा  सही तोर काया ल संगी,बिना फोकटे के तमाशा बनाये ग ।
झूमे गली खोर मा मंद पीके, जमाना घलो मा शराबी कहाये ग।
माने नही बात  ला रार ठाने  ,खुदे मान पैसा सबो ला गँवाये ग ।
छोड़े नशा के करे तोर वादा, बता फेर कैसे कहाँ तैं भुलाये ग।।

ग्राम चंदैनी, कवर्धा के छंद-साधकज्ञानुदास मानिकपुरी के "चौपई छंद" मद्यपान के कारण उत्पन्न हालात का वर्णन करते हुए कहते हैं -
दारू के बोहाथे धार,
पीके रोज मतावय रार।
का लइका डोकरा जवान।
झुमरत रहिथे बड़े बिहान।।

सारंगढ़ के छंद-साधक दुर्गा शंकर इजारदार "बरवै छन्द" के माध्यम से सचेत करते हुए कहते हैं -

नशा नाश के जड़ ए ,  तँय हर जान ।
माटी मा मिल जाथे , सब सनमान ।1।
बीड़ी दारू गाँजा , सबला छोड़ ।
आगू बढ़ना हे ता ,पइसा जोड़ ।3।

वे "विष्णु पद छंद" में कुछ इस तरह से उलाहना दे रहे हैं -

कुकरी दारू मा माते हस, छूटे राम लला।
घर के खेती परिया परगे ,कइसे तोर कला।।

नवोदित छन्द साधक अशोक धीवर "जलक्षत्री" अपने "रोला छन्द" के माध्यम स मद्यनिषेध का समर्थन करते हुए कहते हैं -

दारू झन पी यार, फेर पाछू पछताबे।
जिनगी के दिन चार, कहाँ तँय येला पाबे।।
माँसाहार तियाग, तहाँ ले जिनगी बड़ही।
सुख पाबे भरमार, इही हा मंगल करही।।

राजिम की नवोदित छन्द साधिका सुधा शर्मा "छन्नपकैया छन्द" में अपनी बात कहती हैं -

छन्न पकैया छन्न पकैया,होगे हावे गड़बड़।
सुते हवे इतवारी भैया,पीए दारू अड़बड़।।

ग्राम समोदा के नवोदित छन्द साधक गुमान प्रसाद साहू का "छप्पय छन्द" इसी संदर्भ में कुछ इस तरह से है -
"
दारू गुटखा पान, हानिकारक बड़ हावय,
करय अपन नुकसान, जेन हा येला खावय।
आनी-बानी रोग, खाय ले येकर होथे,
परे नशा के जाल, जान कतको हे खोथे।।
किरिया खाके तुम सबो, नशा पान ला छोड़ दव।
आज नशा के जाल ला, जग ले सबझन तोड़ दव।।

अन्त में मेरा माने दुर्ग के अरुण कुमार निगम का "रोला छन्द भी यही निवेदन कर रहा है कि मदिरा का त्याग करो -

पछतावै मतवार, पुनस्तर होवै ढिल्ला
भुगतै घर परिवार, सँगेसँग माई-पिल्ला
पइसा खइता होय, मिलै दुख झउहा-झउहाँ
किरिया खा के आज, छोड़ दे  दारू-मउहाँ

आलेख - अरुण कुमार निगम
             आदित्य नगर, दुर्ग
              छत्तीसगढ़