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Sunday, September 4, 2011

शिक्षक दिवस पर जनहित में जारी


सम्बोधन !!!!!

क्या यह यूरोप का शहर है दोस्तों  ?
हर शाला में “मैडम” और “सर” है दोस्तों
“गुरुजी” का सम्बोधन कब, क्यों खो गया
खो जाये ना संस्कृति – डर है दोस्तों.

“गुरु” में श्रद्धा थी , आदर- सम्मान था
गुरु थे आगे फिर पीछे भगवान था
“सर” का सम्बोधन बेअसर है दोस्तों.....

“मैडम” आई और “बहन जी” खो गई
पावन रिश्ते का सम्बोधन धो गई
पश्चिमी संस्कृति का असर है दोस्तों.......

इस भारत में बच्चा गुरुकुल जाता था
गुरु-शिष्य का पिता-पुत्र सा नाता था
अब यह नाता आता कहीं नजर है दोस्तों......

गुरु के आगे राजा शीश नवाते थे
राज-समस्या को गुरु ही सुलझाते थे
अब राजा के सम्मुख क्या कदर है दोस्तों.......

“सर” को नैतिक शिक्षा पर बल देना होगा
“मैडम”को ममता का आँचल देना होगा
आँख खुले तो समझो नई सहर है दोस्तों.........

गुरु की खोई महिमा को लौटाना होगा
हर शाला को गुरुकुल पुन: बनाना होगा
शिक्षक का गुरुकुल ही तो घर है दोस्तों.............

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छत्तीसगढ़.

14 comments:

  1. बेहतरीन सुन्दर शब्दों के द्धारा, बेहतर संदेश।

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  2. हमने , आपने , सबने
    तलाश लिए है नए घरोंदे
    संस्कार और संबोधन
    अब बस उन पौराणिक , दकियानूसी विचारों का
    तर्पण बाकी है
    बची है जो कुछ और " अनिल जी"
    अब तो बस उनका पलायन बाकी है
    - आप को याद रहीं बधाई

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  3. "अनिल जी" को "अरुण जी" भी पढ़े ,

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  4. “गुरु” में श्रद्धा थी , आदर- सम्मान था
    गुरु थे आगे फिर पीछे भगवान था
    “सर” का सम्बोधन बेअसर है दोस्तों.....

    “मैडम” आई और “बहन जी” खो गई


    गुरुजनों को सादर प्रणाम ||

    सुन्दर प्रस्तुति पर
    हार्दिक बधाई ||

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

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  6. बेहतरीन प्रस्तुति ...शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ

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  7. शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ सर।

    सादर

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  8. सटीक और शानदार प्रस्तुति , आभार

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें .

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  9. पहली कक्षा की शिक्षिका--
    माँ के श्रम सा श्रम वो करती |
    अवगुण मेट गुणों को भरती |
    टीचर का एहसान बहुत है --
    उनसे यह जिंदगी संवरती ||


    माँ का बच्चा हरदम अच्छा,
    झूठा बच्चा फिर भी सच्चा |
    ठोक-पीट कर या समझाकर-
    बना दे टीचर सच्चा-बच्चा ||


    लगा बाँधने अपना कच्छा
    कक्षा दो में पहुंचा बच्चा |
    शैतानी में पारन्गत हो
    टीचर को दे जाता गच्चा ||

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  10. सच कह रहे हैं...लगता तो यूरोप ही है...उम्दा रचना..

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  11. “गुरुजी” का सम्बोधन कब, क्यों खो गया
    खो जाये ना संस्कृति – डर है दोस्तों....

    हर मन में अब यही डर है अरुण जी ।

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  12. सहमत हूँ आपकी बात सेक... गुरु शब्द में निष्ठां का भाव था ... जो अब आज के शब्दों में नज़र नहीं आता ...

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  13. आद अरूण भाई
    बहुत सुकून देती है आपकी रचना...
    इश्वर से विनती है कि आपकी हर पंक्ति का सन्देश अपने गंतव्य तक पहुंचे...
    शिक्षक दिवस की विलंबित सादर बधाइयां...

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