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Thursday, September 1, 2011

मन का दीप जला कर देख........

मुझको तू अपना कर देख
प्रेम-पनीरी खा कर देख
हर दुआ होगी कबूल
बस ! दोनों हाथ उठा कर देख.

मन में क्या है खटक रहा
यहाँ-वहाँ क्यों भटक रहा
‘ना’ में सिर क्यों झटक रहा
‘हाँ’ में शीश हिला कर देख............

बात-बात पर तुनक रहा
खुद अपने से चमक रहा
धन के संग-संग खनक रहा
थोड़ा-बहुत लुटा कर देख.................

लोभ नयन-द्वय झलक रहा
भौतिक सुख को ललक रहा
तन-पिंजरा कब तलक रहा
खुद से नैन मिला कर देख..............

अंत-काल क्यों सिसक रहा
मुझसे मिलने झिझक रहा
तन का दीपक भभक रहा
मन का दीप जला कर देख..................

( गणेश-चतुर्थी की शुभ-कामनायें )

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर ,दुर्ग (छत्तीसगढ़)

25 comments:

  1. गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें ...

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  2. सुन्दर सन्देश देती हुई प्यारी रचना ......गणेश चतुर्थ की शुभकामनाएँ

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  3. गणेश चतुर्थी की शुभकामनाये…………बहुत सुन्दर रचना।

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  4. मन में क्या है खटक रहा
    यहाँ-वहाँ क्यों भटक रहा
    ‘ना’ में सिर क्यों झटक रहा
    ‘हाँ’ में शीश हिला कर देख.........bilkul

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  5. इतने प्यारे शब्द है कि कुछ और कहने को बचा ही नहीं है।

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  6. अंत-काल क्यों सिसक रहा
    मुझसे मिलने झिझक रहा
    तन का दीपक भभक रहा
    मन का दीप जला कर देख..................

    ...बहुत खूब...लाज़वाब भावनाएं और उनकी बेहद ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति..

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  7. गणेश चतुर्थी की बहुत बहुत शुभकामनायें।
    बहुत अच्छा लिखा है सर।

    सादर

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  8. बहुत सुन्दर गीत अरुण भाई...
    सादर बधाई...

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  9. कल 2/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  10. मन में क्या है खटक रहा
    यहाँ-वहाँ क्यों भटक रहा
    ‘ना’ में सिर क्यों झटक रहा
    ‘हाँ’ में शीश हिला कर देख.....
    sunder kaha hai aapne ganeshchaturthi ki shubhkamnayen
    rachana

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  11. बहुत सुन्दर।
    गणशोत्सव की शुभकामनाएँ।

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  12. ईद की सिवैन्याँ, तीज का प्रसाद |
    गजानन चतुर्थी, हमारी फ़रियाद ||
    आइये, घूम जाइए ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  13. अंत-काल क्यों सिसक रहा
    मुझसे मिलने झिझक रहा
    तन का दीपक भभक रहा
    मन का दीप जला कर देख..................

    आपको भी गणेश-चतुर्थी की शुभ-कामनायें ....

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  14. मन में क्या है खटक रहा
    यहाँ-वहाँ क्यों भटक रहा
    ‘ना’ में सिर क्यों झटक रहा
    ‘हाँ’ में शीश हिला कर देख............

    बहु खूब .....!!

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  15. बहुत सुंदर ....गणेश उत्सव की शुभकामनायें

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  16. बात-बात पर तुनक रहा
    खुद अपने से चमक रहा
    धन के संग-संग खनक रहा
    थोड़ा-बहुत लुटा कर देख....

    बहुत सुन्दर दर्शन छुपा है इस रचना में।

    .

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  17. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

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  19. गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभ कामनाएं ..दार्शनिक चिंतन से परिपूर्ण सुन्दर रचना के लिए बधाईयां !!!

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  20. aapkee Mahendrajee ke blog par chand tippanee bahut acchee lagee .
    Aabhar

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  21. लोभ नयन-द्वय झलक रहा
    भौतिक सुख को ललक रहा
    तन-पिंजरा कब तलक रहा
    खुद से नैन मिला कर देख

    वाह, क्या बात है...
    सरल शब्दों में गहन आध्यात्मिक विचार।
    प्रभावशाली प्रस्तुति।

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  22. अपने अंदर झाँकने पर ही प्रकाश मिलता है ... लाजवाब रचना है ...

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