Followers

Saturday, September 10, 2011

अनबुझी – सी प्यास है तू.....


उम्र भर की तलाश है तू
तू जमीं , आकाश है तू.

मौत तुझसे पूछता हूँ
किसलिये उदास है तू.

बुझ सकी ना ज़िंदगी से
अनबुझी-सी प्यास है तू.

आ तुझे बाँहों में भर लूँ
आज कितने पास है तू.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छत्तीसगढ़.

(रचना वर्ष – 1980)

18 comments:

  1. भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति ....

    ReplyDelete
  2. बहुत मर्मस्पर्शी ... बहुत सुंदर ।

    ReplyDelete
  3. VAAH MAUT KO BHI GALE LAGANE KA JAZBA BAHUT KHOOB HAI

    ReplyDelete
  4. आ तुझे बाँहों में भर लूँ
    आज कितने पास है तू ..
    वाह अरुण जी ... कमाल की गज़ल और बेहद खूबसूरत शेर .. मज़ा आ गया पढ़ के ...

    ReplyDelete
  5. बुझ सकी ना ज़िंदगी से
    अनबुझी-सी प्यास है तू.

    आपको बहुत बहुत बधाई --
    इस जबरदस्त प्रस्तुति पर ||

    ReplyDelete
  6. बुझ सकी ना ज़िंदगी से
    अनबुझी-सी प्यास है तू....

    Lovely expression !

    .

    ReplyDelete
  7. उम्र भर की तलाश है तू
    तू जमीं , आकाश है तू.

    मन को छू लेने वाली रचना...

    ReplyDelete
  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    ReplyDelete
  9. कही दूर तक मन को छु गयी रचना बधाई

    ReplyDelete
  10. मौत तुझसे पूछता हूँ
    किसलिये उदास है तू....

    क्या बात है अरुण भाई....
    सादर साधुवाद...

    ReplyDelete
  11. सुन्दर रचना |

    मेरे भी ब्लॉग में पधारें |
    मेरी कविता

    ReplyDelete
  12. कोमल भावनाएं ..सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  13. बेहतरीन रचना....

    ReplyDelete