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Saturday, February 23, 2013

कुण्डलिया छंद




(चित्र ओबीओ से साभार)

अनगढ़ मिट्टी पा रही , शनै: - शनै: आकार
दायीं  -  बायीं  तर्जनी  ,  देती  उसे  निखार
देती  उसे  निखार , मध्यमा संग कनिष्का
अनामिका  अंगुष्ठ , नाम छोड़ूँ मैं किसका

मिलकर  रहे सँवार , रहे ना कोई घट - बढ़
शनै: - शनै: आकार , पा रही मिट्टी अनगढ़ ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)
 [ओबीओ के चित्र से काव्य तक ,छंदोत्सव अंक-23 में मेरी प्रस्तुति]

14 comments:

  1. भगदड़ दुनिया में दिखे, समय चाक चल तेज |
    कुम्भकार की हड़बड़ी, कृति अनगढ़ दे भेज |

    कृति अनगढ़ दे भेज, बराबर नहीं अंगुलियाँ |
    दिल दिमाग में भेद, मसलते नाजुक कलियाँ |

    ठीक करा ले चाक, हटा मिटटी की गड़बड़ |
    जल नभ पावक वायु, मचा ना पावें भगदड़ ||

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  3. लगातार बैठना नहीं हो पा रहा है

    अंतरजाल की दुनिया की जानने हलचल

    निकट है मार्च महीना, राजस्व वसूली

    लक्ष्य प्राप्ति हेत बस होता आदेश तू

    खाली चल चल चल चल

    लेकिन आज पढ़ा आपकी 'कुण्डलियाँ'

    का सुन्दर छंद ....

    कैसे तारीफ़ करूँ

    मिल नहीं रहे मुझे अल्फास, दिमाग की

    की बत्ती हो गई बंद .....बहुत ही सुन्दर ...

    और आदरणीय 'रविकर' जी के जवाब का

    भी कोई सानी नहीं ..... आभार!

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  4. गढ़ने के बाद पकाना भी पड़ेगा - ताप दे-दे कर !

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  5. आपने भी चित्र के आधार पर बहुत सुन्दर रचना गढ़ दी है..
    बहुत ही बढ़ियाँ....
    :-)

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  6. बहुत सुंदर .... सभी उँगलियों के नाम भी याद करा दिये :):)

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  7. चित्र को पूरी तरह से साकार करती लाजबाब कुण्डली रचने के लिए ,,,अरुण जी बधाई

    Recent post: गरीबी रेखा की खोज

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  8. blog par bahut see kundaliyan padhi kintu jo bhavpoorn aur sahajta aapki kundli me dekhne ko mili vah kahin nahi .सराहनीय अभिव्यक्ति आभार सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे . आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

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  9. निगम जी बहुत खूब | आपकी लेखनी से कुण्डलियाँ सीख रहा हूँ | आभार

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  10. उत्कृष्ट प्रस्तुति, निगम जी

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  11. दै धान लै मूल थोर रेवरी बाँट रमन ।
    तहँ मति दै मद्य महँ बोर बटोर श्रमिक के धन ॥

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