Followers

Saturday, July 23, 2011

पीड़ा होगी....


रजकण हूँ आंगन में बिखरा रहने दो
नयनों में तुम नहीं बसाना – पीड़ा होगी.
क्रंदन हूँ कोयल की पंचम तानो का
अधरों पर तुम मुझे न लाना – पीड़ा होगी.

कीचड़ से बच कर चलना ही श्रेयस्कर है
वरना आँचल पर कलंक लग जायेगा
देहरी के बाहर पग धरना उचित नहीं है
निर्लज कंटक हाय ! अंक लग जायेगा.

शुभ-चिंतक हूँ दर्पण में तुम उम्र बाँच लो
मत अब कोई कदम बढ़ाना – पीड़ा होगी..............

शहनाई की मधुर रागिनी , रचो महावर
और हथेली पर मेंहंदी की रांगोली दो
दीवाली कर लो तुम अपने वर्तमान को
और अतीत की स्मृतियों को अब होली दो.

अंतिम आशीर्वाद लिये जब मैं आऊंगा
मत घूँघट से पलक उठाना – पीड़ा होगी..................

चूड़ी खनका कर अपने पैंजन झनका कर
कहना – कवि मैं गीत तुम्हारे लौटाती हूँ
इस चकोर के आगे मत तुम नीर बहाना
बरना हर इक बूँद कहेगी –मैं स्वाती हूँ.

और सुनो तुम मुक्त-भाव से हँसती रहना
होंठ काट कर मत मुस्काना – पीड़ा होगी..................

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर
दुर्ग (छत्तीसगढ़)

26 comments:

  1. चूड़ी खनका कर अपने पैंजन झनका कर
    कहना – ‘ कवि मैं गीत तुम्हारे लौटाती हूँ ’
    इस चकोर के आगे मत तुम नीर बहाना
    बरना हर इक बूँद कहेगी –मैं स्वाती हूँ.
    bahut bahut komal ehsaas

    ReplyDelete
  2. इस कविता की बिम्ब योजना प्रभावित करती है। मन के आहसासों को अभिव्यक्त करने में सफल हुई है।

    ReplyDelete
  3. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति |
    बधाई
    आशा

    ReplyDelete
  4. और सुनो तुम मुक्त-भाव से हँसती रहना
    होंठ काट कर मत मुस्काना – पीड़ा होगी.

    .बेहद सुन्दर प्रस्तुति, सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  5. दीवाली कर लो तुम अपने वर्तमान को
    और अतीत की स्मृतियों को अब होली दो.

    क्या खूब कही है अरुण भाई...
    सादर...

    ReplyDelete
  6. होंठ काट कर मत मुस्काना – पीड़ा होगी..................

    अच्छी प्रस्तुति ||
    बधाई ||

    ReplyDelete
  7. देहरी के बाहर पग धरना उचित नहीं है
    निर्लज कंटक हाय ! अंक लग जायेगा.
    बहुत सुण्दर भाव।

    ReplyDelete
  8. शहनाई की मधुर रागिनी , रचो महावर
    और हथेली पर मेंहंदी की रांगोली दो
    दीवाली कर लो तुम अपने वर्तमान को
    सुन्दर रचना.

    ReplyDelete
  9. रजकण हूँ आंगन में बिखरा रहने दो
    नयनों में तुम नहीं बसाना-पीड़ा होगी
    क्रंदन हूँ कोयल की पंचम तानो का
    अधरों पर तुम मुझे न लाना-पीड़ा होगी।

    प्रेमाभिव्यक्ति का अनोखा रूप गीत में साकार हो उठा है।

    ReplyDelete
  10. खुबसूरत और प्रभावपूर्ण अभिवयक्ति...

    ReplyDelete
  11. और सुनो तुम मुक्त भाव से हंसते रहना,
    व्होंठ काट कर मत मुस्काना पीड़ा होगी।
    बेहतरीन छंदबद्ध कविता जिसमें आध्यात्म का पुट भी समाहित है के लिये अरूण भाई को मुबारकबाद।

    ReplyDelete
  12. आपकी पोस्ट की चर्चा कृपया यहाँ पढे नई पुरानी हलचल मेरा प्रथम प्रयास

    ReplyDelete
  13. khubsurat ehsaaso se rachi rachna....

    ReplyDelete
  14. चूड़ी खनका कर अपने पैंजन झनका कर
    कहना – ‘ कवि मैं गीत तुम्हारे लौटाती हूँ ’
    इस चकोर के आगे मत तुम नीर बहाना
    बरना हर इक बूँद कहेगी –मैं स्वाती हूँ.

    और सुनो तुम मुक्त-भाव से हँसती रहना
    होंठ काट कर मत मुस्काना – पीड़ा होगी....

    बहुत सुन्दर ..मनभावन रचना ..

    ReplyDelete
  15. चूड़ी खनका कर अपने पैंजन झनका कर
    कहना – ‘ कवि मैं गीत तुम्हारे लौटाती हूँ ’..

    वाह ... बुत ही मधुर गीत की तरह ... सीधे दिल में उतर्जाती है ये ये रचना ... सुन्दर मनोभाव ...

    ReplyDelete
  16. Bahut hi pyari kavita hai Nigam Jee , komal , manbhavan , mahkti hui..shubhkamna

    ReplyDelete
  17. अंतिम आशीर्वाद लिये जब मैं आऊंगा
    मत घूँघट से पलक उठाना – पीड़ा होगी....


    उफ.....
    शब्द-शब्द संवेदना भरा है...

    ReplyDelete
  18. बहुत बढ़िया रचना .

    ReplyDelete
  19. सुंदर प्रस्तुति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  20. मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,आपकी कलम निरंतर सार्थक सृजन में लगी रहे .
    एस .एन. शुक्ल

    ReplyDelete
  21. मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,आपकी कलम निरंतर सार्थक सृजन में लगी रहे .
    एस .एन. शुक्ल

    ReplyDelete
  22. और सुनो तुम मुक्त-भाव से हँसती रहना
    होंठ काट कर मत मुस्काना – पीड़ा होगी..................

    निश्छल प्रेम की लाज़वाब प्रस्तुति..एक एक शब्द प्रेम के गहन रंग में रंगा हुआ है..अद्भुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

    ReplyDelete