Followers

Sunday, January 27, 2013

धीरज मन का टूट न जाये





(चित्र ओपन बुक्स ऑन लाइन से साभार) 
ओपन बुक्स ऑन लाइन द्वारा आयोजित चित्र से काव्य तक छंदोत्सव अंक-22
में मेरी छंद चौपाई http://www.openbooksonline.com/

छंद - चौपाई (16 मात्राएँ)

बिटिया हाथ लिये है फाँसी
याद आ गई हमको झाँसी |
आँखों में है भड़की ज्वाला
कौन यहाँ पर है रखवाला |
घूम  रहे  सैय्याद  दरिन्दे
विचरण कैसे करें परिन्दे |
कोई  कन्या - भ्रूण सँहारे
कोई   बिछा   रहा  अंगारे |
कहीं नव-वधू गई जलाई
जाने  कब से  गई सताई |
नैतिक पतन हुआ है भारी
अपमानित  होती  है नारी |
नैतिक शिक्षा बहुत जरूरी
बिन इसके ज़िंदगी अधूरी |
धीरज मन का टूट न जाये
जल्दी कोई न्याय दिलाये |

इसी आयोजन में अन्य रचनाकारों की रचनाओं पर मेरी छंदात्मक प्रतिक्रियाएँ

छंद – दोहा
(विधान – प्रथम व तृतीय चरणों (विषम) में 13 मात्राएँ, द्वितीय व चतुर्थ चरणों  (सम) में 11 मात्राएँ | अंत में दीर्घ लघु |)
(1)
त्रेता द्वापर काल के,खींच दिये हैं चित्र
दोहे मन को छू रहे बहुत बधाई मित्र |
(2)
रक्षक ही भक्षक बने , खूब कही है बात
न्याय व्यवस्था पर हुई,छंदों की बरसात |
(3)
अक्षर में चिंगारियाँ  शब्दों में अंगार
भींच गई हैं मुट्ठियाँ,होठों पर ललकार |
(4)
नैतिक शिक्षा लुप्त हैगुम होते संस्कार
कोई तो इस बात पर थोड़ा करे विचार |
(5)
दोहा और घनाक्षरी ,  एक रंग दो फूल
भाव उकेरे चित्र के,हमने किया कबूल ||

छंद – कुण्डलिया
(विधान – छ: चरण. प्रथम दो चरण दोहा अर्थात 13-11 मात्राएँ, शेष चार चरण रोला अर्थात 11-13 मात्राएँ, प्रारम्भ में प्रयुक्त शब्द ही कुण्डलिया का अंतिम शब्द होता है.दोहे के दूसरे सम चरण से रोले का प्रारम्भ)
(1)
फाँसी से कमतर सजा , किसे भला मंजूर
नर - पिशाच  ये  भेड़िये  हैं अपराधी क्रूर
हैं  अपराधी  क्रूर  , इन्हें नहिं बख्शा जाये
न्याय मांगते 'धीर' ,  हृदय में  आग छुपाये
कड़ा बने कानून चुभे फिर से ना नश्तर
किसे भला मंजूर सजा फाँसी से कमतर ||
(2)
काँपें दुष्कर्मी  सजा ऐसी दियो सुझाय
अंग-भंग करके उन्हें ,सूली पर लटकाय
सूली पर लटकाय चढ़ा दें फौरन फाँसी
लेवे दुनियाँ सीखबात ये नहीं जरा-सी
सिद्ध हुआ अपराध, गला फौरन ही नापें
सजा सुझाई खूब ,जिसे सुन पापी काँपें ||
(3)
भोली  जनता  सह  रही  ,  कैसे  कैसे तीर
कुण्डलिया ने खींच दी,उन सबकी तस्वीर
उन सबकी तस्वीर,विविध हैं दृश्य दिखाये
हम  अपने  ही  देश  , लग  रहे  आज पराये
फाँसी  फंदा  हाथ  ,  दहकती दिल में होली
कैसे - कैसे  तीर सह  रही  जनता  भोली ||
(4)
फाँसी मिलनी चाहिए सबके  मन की साध
दिल्ली का दुष्कर्म तो ,  है  जघन्य  अपराध
है  जघन्य  अपराध ,  सजा  फाँसी का  फंदा
सूली   पर  दो  टांग   मिले   दुष्कर्मी   बंदा
धधक  रहा  है  हृदय आँख में  बसी उदासी
सबके मन की साधचाहिये मिलनी  फाँसी ||
(5)
कोई भी समझे   नहीं ,  नारी को  भूगोल
माँ भगिनी बेटी  यही , ममता दे अनमोल
ममता दे अनमोल ,कटी हैं क्योंकर पाँखें
नर पिशाच की आजफोड़िये दोनों आँखें 
अम्बरीश  के   छंद ,  आतमा  पढ़ के  रोई
नारी  को  भूगोल नहीं समझे अब कोई ||
(6)
कहीं सुलगते प्रश्न हैं,कहीं जेठ की धूप
दिव्य दृष्टि से  देखते संजय चंडी रूप
संजय चंडी रूप  , कहीं  फाँसी का फंदा
ग्रहण ग्रसे किस ठौर,बड़ा सहमा है चंदा
देखा है  हर बार यहाँ अपनों को ठगते
कहीं जेठ की धूपप्रश्न हैं कहीं सुलगते ||
(7)
संजय मिश्र हबीब जी, कहते आप सटीक
सीधे - सादे शब्द में ,  बात   बड़ी  बारीक
बात  बड़ी  बारीक ,  दिशाएँ  नई दिखाते
प्रश्न उठाते  आप ,  साथ ही  हल बतलाते
मछली की जो आँख , भेद दे वही धनंजय
दिव्य दृष्टि से देखसके कहलाता संजय ||
(8)
कुंडलियाँ दोनों  करे  ,  हैं परिभाषित  चित्र
नित बढ़ते अपराध से , सब ही चिंतित मित्र
सब ही चिंतित मित्र,  कुकर्मी को  हो फाँसी
नहीं नारि के नैन   कभी भी  आय उदासी
सदा हँसें आजाद  बाग की  सारी कलियाँ
परिभाषित कर चित्र,लिखें बागी कुंडलियाँ ||

छंद - घनाक्षरी 
(विधान - यह मनहरण कवित्त कहलाता है.प्रत्येक चरण में 16, 15 अर्थात् कुल 31 वर्ण. अंत में  गुरु.  8, 8, 8, 7 वर्णों पर यति) 
(1)
अलबेला खत्री   भाई ,खूब रची  कविताई,
 राह  नई   दिखलाई ,  जोरदार   तालियाँ
दानवों के कर्म देखे ,मानवों के मर्म देखे,
तेवर   हैं  गर्म   देखे  ,  बार -बार तालियाँ
शहीदों  का  मान  रहे  , भारत  महान  रहे
आन   बान   शान   रहे  हैं हजार तालियाँ
बदनाम हो ना जाये ,फाँसी वाला फंदा हाये,
तरीका   भला   सुझाये  ,बेशुमार   तालियाँ ||
(2)
अलग – अलग  छंद  आया   पढ़के  आनंद
शब्द – शब्द   मकरंद   ,   रस   बरसाया  है
वाह   रकताले   भाई   छंदों में  ही कविताई
छंद   घनाक्षरी    पढ़     मन   भर   आया है |
नारियों   की   लाज  रहे , उन्नत समाज रहे
सब   ही   स्वतंत्र   रहें  ,  खूब   बतलाया   है
पापियों का नाश होवेदुष्टों का विनाश होवे
दामिनी  की  मौत  ने तोदेश को जगाया है |

(विधान के अनुसार अंत में लघु-गुरु ही आना चाहिये) 

छंद - कामरूप 
(विधान – चार चरण, प्रत्येक में 9, 7, 10 मात्राओं पर यति ,चरणांत में गुरु व लघु)
इससे  बेहतर चित्र  सुंदर देख  पाया  कौन
कविता बहे क्या,अब कहे क्यालेखनी है मौन
आलोक बिखरेसृष्टि निखरे,नष्ट हों सब पाप
हो हृदय गंगाबदन चंगाहम करें यह जाप ||

छंद – रूपमाला ( या मदन छंद)
(चार चरण , प्रत्येक में 14, 10 मात्राओं पर यति देकर कुल 24 मात्राएँ, अंत में दीर्घ व लघु)
सामयिक हैं प्रश्न सारे,क्यों बढ़ा है पाप
दिन ब दिन हालत बुरी है,बढ़ रहा संताप
भावनाओं  को  समेटे ,  रूपमाला  छंद
सच कहूँ संजय इसे पढ़,आ गया आनंद ||

छंद – मदन
(चार चरण , प्रत्येक में 14, 10 मात्राओं पर यति देकर कुल 24 मात्राएँ, अंत में दीर्घ व लघु)
वाह  कितना   खूबसूरत ,  रच दिया  है छंद
चित्र  परिभाषित  है  करता ,  हृदय  अंतर्द्वंद
अशोक  रक्ताले  प्रभु  जी  ,  सार्थक  हैं  भाव
निकलनी ही चाहिये दुख,भँवर से अब नाव ||

छंद – राधेश्यामी 
(विधान - मात्रायें 16,16)
भ्राता नीरज का छंद पढ़ा ,  है  शब्द चित्र क्या खूब गढ़ा
आक्रोश  दिखा  है जोश दिखा, आवेग हृदय में खूब बढ़ा
कानून व्यवस्था की  चिंता , परिवर्तन  निश्चित  लायेगी
इस आशा में है कवि का मनवह सुबह कभी तो आयेगी ||

छंद - मत्तगयंद (मालती) सवैया
(विधान – हर चरण में 7 भगण (SII) अंत में दो गुरु,कुल 23 वर्ण)
(1)
दीप जले अँधियार मिटे , सब दोषिन को अब होवय फाँसी
छंद लिखे  मन भाय गये  ,  सनदीप पटेल  न होय उदासी
मोहन  देख  दशा   हमरी  अवतार धरो फिर भारत आवौ
कंस न दम्भ करे फिर से,इस देश की आकर लाज बचावौ  ||
(2)
दुर्मिल छंद  कहें अति सुंदर ,  भ्रात अशोक हमें मन भायें
नैतिकता पर जोर दिया, अनिवार्य इसे अब नित्य पढ़ायें
रात जहाँ परभात नहीं , उस ठौर दिया सब लोग जलायें
फौरन दुष्टन को पकड़ेंततकाल उसे गल-फाँस चढ़ायें ||
छंद – दुर्मिल सवैया
[विधान – प्रत्येक चरण में 8 सगण (IIS) कुल 24 वर्ण]
(1)
जब दुर्मिल छंद पढ़ा हमने  , उफ आग हिया झुलसाय गई
मन भाव 'विशालबताय रहे   ,  हर बात हमें तड़फाय गई
अब दंड मिले हर दोषिन को , यह मांग जुबां पर आय गई
अपराधहिं के सम मौन सखा,यह बात हमें अति  भाय गई ||
(2)
ढिबरी  बुझती  पर रात सखा  ,  परभात बिना कभु आवत है
मत आस बुझे  नहिं प्यास बुझे , विधुना सबको समझावत है
उसके  घर  में  अति  देर  सही ,  अनधेर नहीं  अब मान जरा
उत न्याय मिले कुछ देर सही,यह सत्य सखा अब जान जरा ||
  
छंद - त्रिभंगी 
(विधान – चार चरण, प्रत्येक में 10, 8, 8, 6 मात्राओं पर यति ,कुल 32 मात्राएँ) 
(1)
रसधार  बही  है  खूब  कही है अम्बर सौरभछाया है
हम हैं आनंदितबहुत अचम्भित , यह छंदों कीमाया है
हम सीख रहे हैंसंग बहे हैं ,पुलकित यह मनकाया है
ज्यों मुरलीधर ने मन को हरनेगीत प्रेम कागाया है ||
(2)
सुंदर  बहुरंगी छंद  त्रिभंगी हमने  पढ़ कर यह जाना
है  खूब  रसीला ,  छैल छबीला  हमने  भी लो पहचाना
है  यह  मधुशाला  की मधुबालामदिरालय कापैमाना
दस आठ गिना यह , आठ बाद छ: ,  है छंदों मेंमस्ताना ||
(3)
है   चित्र   हूबहू ,  शब्द  में   लहू  लावा   बन कर  बहता है
चिन्तित जग साराकौन सहारा,चीख-चीख करकहता है
अबला  बेचारी   है  दुखियारी   हृदय  आग - सा  दहता है
क्या खूब लिखा हैसौरभ जी सत ,साहित शाश्वत ,रहता है ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़) /
विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

19 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    वन्देमातरम् !
    गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ!

    ReplyDelete
  2. रविकर has left a new comment on your post "धीरज मन का टूट न जाये.......":

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति |

    ReplyDelete
  3. Kalipad "Prasad" has left a new comment on your post "धीरज मन का टूट न जाये.......":

    चौपाई ,छंद कुण्डलियाँ सभी बढ़िया है .-सुन्दर प्रस्तुति
    New post कृष्ण तुम मोडर्न बन जाओ !

    ReplyDelete
  4. Virendra Kumar Sharma has left a new comment on your post "धीरज मन का टूट न जाये.......":


    अरुण भाई निगम बहुत बड़ा फलक है इस पोस्ट का .आक्रोश क्रन्दन और काव्य कर्म का चन्दन लगा दिया आपने मस्तक पर हर ब्लोगर के .

    ReplyDelete
  5. कविता रावत has left a new comment on your post "धीरज मन का टूट न जाये.......":

    बढ़िया प्रस्तुति ...

    ReplyDelete
  6. UMA SHANKER MISHRA has left a new comment on your post "धीरज मन का टूट न जाये.......":

    आदरणीय अरुण भाई साहब बहुत ही लाजवाब चौपाईयाँ, प्रतिक्रियाओं पर दोहों से दिया गया सम्मान साथ ही साथ कुंडली सवैय्या .....कमाल कर दिया
    आपके इस ब्लॉग ने तो हमारे लिए पाठशाला ही खोल दिया है यहाँ सिखने के लिये बहुत कुछ है ..बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
  7. बढ़िया है -

    शुभकामनायें ।।

    ReplyDelete
  8. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

    ReplyDelete
  9. चौपाई छंद में सभी कुछ समेट लिया ... बाकी टिप्पणियों में लक्षित हो रहा है .... बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  10. वाह ....
    बहुत बहुत बढ़िया...
    सुन्दर!!!

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  11. ओ० बी० ओ० में सभी रचनाकारों की रचनाओं पर सटीक छंदात्मक प्रतिक्रियाएँ पढ़ी है,सभी छंद बहुत सुन्दर
    लाजबाब है,काव्यमय टिप्पणियों के लिए,बधाई अरुण जी,,,,

    recent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

    ReplyDelete
  12. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि आज दिनांक 28-01-2013 को चर्चामंच-1138 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    ReplyDelete
  13. बहुत खूब भाई साहब .बेहतरीन प्रासंगिक प्रतिक्रियाएं आपकी .बेहतरीन रचना आपकी .

    ReplyDelete
  14. रचना सुन्दर आपकी, नार दसा दरसाय।

    साथहि कविता व्याकरण, दियो सुघर समुझाय।।

    ReplyDelete
  15. आज 15/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  16. बहुत सुन्दर रंगारंग प्रस्तुति |

    ReplyDelete