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Tuesday, December 11, 2012

हेमन्त ऋतु के दोहे



कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमन्त
मन की चाहत सोचती, बनूँ निराला पन्त |

शाल गुलाबी ओढ़ कर, शरद बने हेमंत |
शकुन्तला को  ढूँढता , है मन का दुष्यन्त |

कोहरा  रोके  रास्ता , ओस  चूमती देह
लिपट-चिपट शीतल पवन,जतलाती है नेह |

ऊन बेचता हर गली , जलता हुआ अलाव
पवन अगहनी मांगती , औने - पौने भाव |

मौसम का ले लो मजा, शहरी चोला फेंक
चूल्हे के  अंगार में , मूँगफल्लियाँ  सेंक |

मक्के की रोटी गरम , खाओ गुड़ के संग
फिर देखो कैसी जगे, तन मन मस्त तरंग |

गर्म पराठे  कुरकुरे , मेथी के जब खायँ
चटनी लहसुन मिर्च की,भूले बिना बनायँ |
 
गाजर का हलुवा कहे, ले लो सेहत स्वाद
हँसते रहना साल भर, मुझको करके याद |

सीताफल हँसने लगा , खिले बेर के फूल
सरसों की अँगड़ाइयाँ, जलता देख बबूल |

भाँति भाँति के कंद ने, दिखलाया है रूप
इस मौसम भाती नहीं, किसे सुनहरी धूप |

मौसम  उर्जा  बाँटता , है  जीवन पर्यंत
संचित तन मन में करो,सदा रहो बलवंत |

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

10 comments:

  1. हेमंत के दोहों ने , खूब दिलाई याद
    हलवा,साग औ गुड़ का , आ गया है स्वाद ।

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  2. बहुत ही बेहतरीन रचना है

    - vivj2000.blogspot.com

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  3. हेमन्त ऋतु का अति सुन्दर वर्णन....
    बहुत ही बेहतरीन दोहे...
    सुन्दर....
    :-)

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  4. वाह ,,, बहुत उम्दा,
    लाजबाब प्रस्तुति दोहों के संग,
    हेमन्त ऋतु का अनोखा रंग,,,,

    recent post: रूप संवारा नहीं,,,

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  5. आपके उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (12-12-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  6. निगम जी ,माफ़ी चाहते हैं ,काफी दिनों बाद मुलाकात के लिए .....वास्तव में आपको पढ़ना भाषा व भावों को समवेत दृष्टि से देखना है ....बधाईयाँ जी ....कारवां गाफिल न हो ...

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  7. बेहतरीन रचना,
    गर्म पराठे कुरकुरे , मेथी के जब खायँ
    चटनी लहसुन मिर्च की,भूले बिना बनायँ |

    गाजर का हलुवा कहे, ले लो सेहत स्वाद
    हँसते रहना साल भर, मुझको करके याद |

    सीताफल हँसने लगा , खिले बेर के फूल
    सरसों की अँगड़ाइयाँ, जलता देख बबूल |

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  8. अरुण जी नेट वर्क बंद होने के कारण महोत्सव में नहीं पढ़ पाई थी पर ओ बी ओ पर पढने के बाद दुबारा लुत्फ़ उठा रही हूँ इन दोहों का बहुत अच्छे दोहे लिखे बहुत बहुत बधाई आपको

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  9. काव्य सौन्दर्य ,भाव विचार ,राग ,मल्हार और हेमंत में खान पान की सहज अभिव्यक्ति जन भाषा में .मोहक रूप दोहावली का .आप भी पढ़ें -

    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    TUESDAY, DECEMBER 11, 2012

    हेमन्त ऋतु के दोहे


    कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमन्त
    मन की चाहत सोचती, बनूँ निराला पन्त |

    शाल गुलाबी ओढ़ कर, शरद बने हेमंत |
    शकुन्तला को ढूँढता , है मन का दुष्यन्त |

    कोहरा रोके रास्ता , ओस चूमती देह
    लिपट-चिपट शीतल पवन,जतलाती है नेह |

    ऊन बेचता हर गली , जलता हुआ अलाव
    पवन अगहनी मांगती , औने - पौने भाव |

    मौसम का ले लो मजा, शहरी चोला फेंक
    चूल्हे के अंगार में , मूँगफल्लियाँ सेंक |

    मक्के की रोटी गरम , खाओ गुड़ के संग
    फिर देखो कैसी जगे, तन मन मस्त तरंग |

    गर्म पराठे कुरकुरे , मेथी के जब खायँ
    चटनी लहसुन मिर्च की,भूले बिना बनायँ |

    गाजर का हलुवा कहे, ले लो सेहत स्वाद
    हँसते रहना साल भर, मुझको करके याद |

    सीताफल हँसने लगा , खिले बेर के फूल
    सरसों की अँगड़ाइयाँ, जलता देख बबूल |

    भाँति भाँति के कंद ने, दिखलाया है रूप
    इस मौसम भाती नहीं, किसे सुनहरी धूप |

    मौसम उर्जा बाँटता , है जीवन पर्यंत
    संचित तन मन में करो,सदा रहो बलवंत |

    अरुण कुमार निगम
    आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
    विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

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