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Monday, January 12, 2015

अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये......



अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये......

कैसे    कैसे   मंजर    आये   प्राणप्रिये
अपने    सारे    हुये   पराये   प्राणप्रिये |

सच्चे  की  किस्मत  में  तम  ही  आया है
अब  तो  झूठा  तमगे   पाये   प्राणप्रिये |

ज्ञान  भरे  घट  जाने  कितने  दफ्न हुये
अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये |


भूखे - प्यासे  हंसों  ने  दम  तोड़  दिया
अब  कौआ  ही  मोती  खाये  प्राणप्रिये |

यहाँ  राग - दीपक  की  बातें करता था
वहाँ   राग – दरबारी   गाये  प्राणप्रिये |
 
सोने    चाँदी   की   मुद्रायें   लुप्त  हुईं
खोटे  सिक्के  चलन  में  आये  प्राणप्रिये |

सच्चाई   के    पाँव   पड़ी   हैं   जंजीरें
अब तो बस भगवान बचाये  प्राणप्रिये |

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)

11 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-01-2015) को अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये..; चर्चा मंच 1857 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    उल्लास और उमंग के पर्व
    लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सच्चाई के पाँव पड़ी हैं जंजीरें
    अब तो बस भगवान बचाये प्राणप्रिये |
    ....बहुत सुन्दर सटीक चिंतन ...

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  3. तापन तापे बरखा नहाए हिम को हिम सुहाए..,
    अधजल घघरी छलकत जाए.....

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. उत्तम प्रस्तुति।

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  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुति सुन्दर भाव

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