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Monday, May 20, 2013

कुण्डलिया छंद -

             


कुण्डलिया छंद -

चम-चम चमके गागरी,चिल-चिल चिलके धूप
नीर   भरन  की  चाह  में  ,   झुलसा  जाये  रूप
झुलसा   जाये   रूप   ,   कहाँ   से   लाये   पानी
सूखे   जल   के   स्त्रोत , नजर   आती   वीरानी
दोहन – अपव्यय  देख , रूठता   जाता  मौसम
धरती  ना  बन  जाय , गागरी  रीती  चम-चम ||

अरुण कुमार निगम
अदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट,विजय नगर,जबलपुर(मध्यप्रदेश)

16 comments:

  1. बहुत सुंदर .... चित्र के भाव पूरी तरह से समाहित हैं ।

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  2. बहुत ही सुन्दर भाव,आभार.

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  3. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २ १ / ५ /१ ३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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  5. वाह आदरणीय गुरुदेव श्री वाह अति सुन्दर लाजवाब. आपकी यह रचना कल मंगलवार (21 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण अंक - २ पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  6. सार्थक चिंतनशील; प्रस्तुति

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  7. ped lagana jaruri hai ....satik shabd chitran ....

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  8. सार्थक प्रस्तुति...बहुत सुन्दर

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  9. शुभम अरुण sir
    लाजवाब कुण्डलियाँ

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  10. सुन्दर रचना !!
    बहुत कुछ का अनुसरण करें और बहुत कुछ देखें और पढें



    उम्मीद है आप मार्गदर्शन करते रहेंगे

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  11. झुलसा जाये रूप , कहाँ से लाये पानी
    सूखे जल के स्त्रोत , नजर आती वीरानी ..

    चित्र को सार्थक करती हैं ये कुण्डलियाँ ... सुन्दर छंद ...

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  12. बढ़िया कुण्डली |
    आशा

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  13. आदरणीय आपकी यह कलापूर्ण रचना निर्झर टाइम्स पर 'विधाओं की बहार...' में संकलित की गई है।
    कृपया http://nirjhar.times.blogspot.com पर अवलोकन करें।आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  14. चित्र, भाव... अभी के मौसम का पूरा चित्रण करते हुए...
    बहुत सुंदर प्रस्तुति!
    ~सादर!!!

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