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Sunday, January 15, 2012

दोहे.....................


बड़ा सरल संसार है  , यहाँ नहीं कुछ गूढ़
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़.  I 1 I


कहाँ  ढूँढता है  मुझे , मैं  हूँ  तेरे  पास
मैं तुझ सा साकार ना, मैं केवल अहसास.  I 2 I


पागल होकर खोजता ,  सुविधाओं में चैन
भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन.  I 3 I


मैं तुझे मिल जाऊंगा, तू बस मैं को भूल
मेरी खातिर हैं बहुत ,  श्रद्धा के दो फूल.  I 4 I


जीवन सारा बीत गया, करता रहा तलाश
अहंकार के भाव ने ,सबकुछ किया विनाश.  I 5 I


त्याग दिया माँ-बाप को, कितना किया हताश
अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश. I 6 I


जिस दिन जल कर दीप सा ,देगा ज्ञान प्रकाश
मुझमें तू मिल जायेगा, होगी खतम तलाश.  I 7 I


पाप भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
लेकर गठरी स्वर्ण की  ,  मेरी करे तलाश.  I 8 I


जीवित होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
मूरत गढ़ने को यहाँ , लाना संग तराश.   I 9 I


जेठ दुपहरी क्यों खिलें ,सेमल और पलाश
कारण इसका भी कभी, अपने हृदय तलाश.  I 10 I

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (मध्य-प्रदेश)

15 comments:

  1. पागल होकर खोजता , सुविधाओं में चैन
    भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन

    बेहतरीन...... जीवन की चासनी में डूबे दोहे जीवन का नया रास्ता दिखाते हैं

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  2. एक एक दोहों में जीवन का सत्य सार

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  3. aaj aapke blog par aakar mujhe bahut accha mahsus ho raha hai .....har doha kuch vishesh sandesh liye hai ...bahut bahut dhnyawad ...

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  4. त्याग दिया माँ-बाप को, कितना किया हताश
    अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश. .

    जिंदगी की सच्चाई को बयां करते हुए दोहे ..

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  5. vaah ek se badhkar ek behtreen dohe.bhaavmai prastuti.

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  6. अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
    चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. ज़िन्दगी के कटु सत्य को समा कर अपने दोहों का संसार रचा है।

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  8. पागल होकर खोजता , सुविधाओं में चैन
    भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन.

    जीवित होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
    मूरत गढ़ने को यहाँ , लाना संग तराश.
    जेठ दुपहरी क्यों खिलें ,सेमल और पलाश
    कारण इसका भी कभी, अपने हृदय तलाश.
    बेहतरीन सीख देते आँखें खोलते दोहे .'संग' का यमक प्रयोग बेहद सुन्दर रहा .सेमल और पलाश का जेठिया खिलखिलाना जैसे जंगल में लगी हो आग .बड़े ही सार्थक दोहे प्रतिमान गढ़ते नए नए .

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  9. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण प्रस्तुती! बढ़िया लगा!

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  10. मैं केवल अहसास.....तू बस मैं को भूल..... निर्मल सत्य का वर्णन है....
    ----सुन्दर दोहे...

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  11. tyag diya maa baap ko...........sabse achha lga.

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  12. वाह बहुत बढ़िया....
    पाप भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
    लेकर गठरी स्वर्ण की , मेरी करे तलाश.

    सभी एक से बढ़ कर एक....
    शुक्रिया...

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  13. हर दोहा सार्थक है


    त्याग दिया माँ-बाप को, कितना किया हताश
    अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश. I 6 I

    यह मन को छू गया .

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