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Wednesday, August 24, 2011

बहुत देर कर दी ....

बहुत देर कर दी है तुमने आने में
पलक बंद कर मैं अब सोने वाला हूँ
मत कोशिश करना तुम मुझे जगाने की
मदिरालय का मैं इक टूटा प्याला हूँ...............................


चाहो तो अपनी पलकों को नम कर लेना
किसी बहाने अपने गम को कम कर लेना
और बुला लेना सूरज अपने आंगन में
मेरा क्या ? मैं बुझता हुआ उजाला हूँ..............................


तुम देवी हो कोई भी पूजा कर लेगा
मूरत हो , मंदिर में कोई धर लेगा
जीर्ण-शीर्ण , नख-शिख से दरका जाता हूँ
कैसे कह दूँ कि मैं एक शिवाला हूँ................................

बहुत देर कर दी है तुमने आने में
पलक बंद कर मैं अब सोने वाला हूँ.


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर ,दुर्ग (छत्तीसगढ़)

{रचना वर्ष – 1978}

16 comments:

  1. तुम देवी हो कोई भी पूजा कर लेगा
    मूरत हो , मंदिर में कोई धर लेगा
    जीर्ण-शीर्ण , नख-शिख से दरका जाता हूँ
    कैसे कह दूँ कि मैं एक शिवाला हूँ

    वाह सर।

    सादर

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  2. बहुत ही सुन्दर अभिवयक्ति....

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  3. बेहतरीन अभिव्यक्ति ....

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  4. और बुला लेना सूरज अपने आंगन में
    मेरा क्या ? मैं बुझता हुआ उजाला हूँ.........
    वाह अरुण भाई... बहुत खुबसूरत रचना प्रस्तुत की है आपने...
    सादर बधाई...

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  5. बहुत ही सुन्दर दिल को छूती प्रस्तुति।

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  6. कल 25/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. तुम देवी हो कोई भी पूजा कर लेगा
    मूरत हो , मंदिर में कोई धर लेगा
    जीर्ण-शीर्ण , नख-शिख से दरका जाता हूँ
    कैसे कह दूँ कि मैं एक शिवाला हूँ..........bahut sunder dil se likhi gai shaandaar prastuti.dil ko choo gai.badhaai aapko.mere blog main aane ke liye dhanyawaad.

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  8. कोमल एहसास से भरी ...सुंदर रचना....
    badhai.

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  9. भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति ..

    हैं दोनों भेद रहित
    फिर भी देखो
    कितना अन्तर है
    एक मन मंदिर में
    वास रहा
    दूजा सडकों का
    पत्थर है ..

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  10. बहुत सुंदर भावों से लिखी शानदार अभिब्यक्ति /बधाई आपको /




    please visit my blog.thanks

    www.prernaargal.blogspot.com

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  11. प्रभावी,मन के भाव सहज उतार दिए .

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  12. तुम देवी हो कोई भी पूजा कर लेगा
    मूरत हो , मंदिर में कोई धर लेगा
    जीर्ण-शीर्ण , नख-शिख से दरका जाता हूँ
    कैसे कह दूँ कि मैं एक शिवाला हूँ ।

    नख-शिख से दरका शिवाला, वाह, ....
    यह प्रतीक मन में उतरता चला गया।

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  13. बेहद उत्कृष्ट रचना है यह.
    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

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