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Thursday, February 6, 2014

शुभ-वसंत


मुझको हे वीणावादिनी वर दे
कल्पनाओं को तू नए पर दे |

अपनी गज़लों में आरती गाऊँ
कंठ को मेरे तू मधुर स्वर दे |

झीनी झीनी चदरिया ओढ़ सकूँ
मेरी झोली में ढाई आखर दे |

विष का प्याला पीऊँ तो नाच उठूँ
मेरे पाँवों को ऐसी झाँझर दे |

सुनके अंतस् को मेरे ठेस लगे 
मेरी रत्ना को ऐसे तेवर दे |

साँस सौरभ समाए शामोसहर
मुक्त विचरण करूँ वो अम्बर दे |

सूर बन कर चढ़ाऊँ नैन तुझे
इन चिरागों में रोशनी भर दे ||

(तरही ग़ज़ल)

अरूण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

14 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (07.02.2014) को " सर्दी गयी वसंत आया (चर्चा -1515)" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  2. मुझको हे वीणावादिनी वर दे
    कल्पनाओं को तू नए पर दे |
    बहुत खूब,सुंदर गजल ...! बधाई

    RECENT POST-: बसंत ने अभी रूप संवारा नहीं है

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  3. बहुत सुंदर सरस्वती बन्दना .... बसंत पंचमी की शुभकामनायें ..

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  4. आपकी इस प्रस्तुति को आज की जन्म दिवस कवि प्रदीप और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. कृपालु रहें वीणावादिनी !

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  6. माँ शारदा कृपा करें ! शुभकामनायें !

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  7. नमन करूं चरणन में माँ सरस्वती।

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  8. कल्पनाओं को तू नए पर दे |
    बहुत खूब,सुंदर गजल .....!!

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  9. अपनी गज़लों में आरती गाऊँ
    कंठ को मेरे तू मधुर स्वर दे |
    बहुत खूब,सुंदर गजल





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  10. मीठी, मन भावन गजाल अरुण जी ...

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