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Thursday, August 1, 2013

गज़ल : बचत-खाता रहा हूँ...........



कमाई का फकत जरिया रहा हूँ
तेरी खातिर बचत खाता रहा हूँ ||

पिलाता ही रहा मैं जाम बन कर                           
कसम तोड़ी नहीं  प्यासा रहा हूँ ||

बनाये जब मकां  तो काट डाला
यहाँ तुलसी का मैं बिरवा रहा हूँ ||

न बाहर घर के  कोई बात आई
कभी गूंगा  कभी परदा  रहा हूँ ||

चला भी आ कभी गुजरे जमाने
तेरी यादों से दिल बहला रहा हूँ ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट,विजय नगर,जबलपुर (मध्यप्रदेश)

(ओबीओ लाइव तरही मुशायरा में शामिल मेरी दूसरी गज़ल)

12 comments:

  1. यहाँ तुलसी का मैं बिरवा रहा हूँ ||

    वाह!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बृहस्पतिवार (01-08-2013) को २९ वां राज्य ( चर्चा -1324 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. शुभकामनायें आदरणीय-

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  4. प्रभावी भावाभ्यक्ति!
    सादर बधाई आदरणीय

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  5. न बाहर घर के कोई बात आई
    कभी गूंगा कभी परदा रहा हूँ ||

    बहुत खूबसूरत गज़ल

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  6. बहुत खुबसूरत ग़ज़ल प्रस्तुति !!

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  7. bahut hi behtarin gajal hai...
    :-)

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  8. वाह! बहुत बढ़िया...बधाई

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  9. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 02.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  10. ye sari chije vehoshi men hai to param dukh ki abhivyakti hai, yadi hosh me ho to param mukti hai, filahal jo bhi ho gazal bahut achhi hai. aabhar

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