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Thursday, March 21, 2013

आज विश्व कविता दिवस (वर्ड पोयट्री डे) : 21 मार्च पर


कविता 

नहीं बनाई जा सके कविता खुद बन जाय
कागज पर उतरे नहीं , मन से मन तक जाय
मन से मन तक जाय , वही कविता कहलाये
अनायास  उत्पन्न  ह्र्दय  का   हाल बताये 
युग - परिवर्तन करे  सत्य शाश्वत सच्चाई
कविता खुद बन जाय , जा सके नहीं बनाई  ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

18 comments:


  1. बहुत बढ़िया -
    आभार आदरणीय-

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. भावों की सरिता

    बह कर जब

    मन के सागर में

    मिलती है

    शब्दों के मोती

    से मिल कर

    फिर कविता बनती है .


    व्यथित से

    मन में जब

    एक अकुलाहट

    उठती है

    मन की

    कोई लहर जब

    थोड़ी सी

    लरजती है

    मन मंथन

    करके फिर

    एक कविता बनती है..


    अंतस की

    गहराई में

    जब भाव

    आलोडित होते हैं

    शब्दों के फिर

    जैसे हम

    खेल रचा करते हैं

    खेल - खेल में ही

    शब्दों की

    रंगोली सजती है

    इन रंगों से ही फिर

    एक कविता बनती है ...

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  4. कविता खुद बन जाय , जा सके नहीं बनाई ||अरुण जी आपने सही कहा

    RecentPOST: रंगों के दोहे ,

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  5. बहुत ही बढ़िया और सार्थक प्रस्तुति,आभार.

    "स्वस्थ जीवन पर-त्वचा की देखभाल"

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  6. कविता बनती है तभी जब हो शब्दों का संगम |
    सूर्य किरण के पास पहुचें जब अरुण निगम ||

    कविता दिवस की बधाई

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  7. sarthak kavita sunder kavita

    आग्रह है मेरे ब्लॉग मैं भी सम्मलित हो
    jyoti-khare.blogspot.in
    आभार आपका

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  8. बहुत सुंदर भाव..... शब्दों का उकेरना सरल कहाँ ?

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  9. बहुत सुन्दर रचना!

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  10. सही कहा आपने- कविता अंतर में अनायास उदित होती है.

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  11. बहुत सुन्दर ...
    पधारें "चाँद से करती हूँ बातें "

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  12. आहा गुरुदेव श्री बहुत ही सुन्दर कुण्डलिया विश्व कविता पर इससे सुन्दर रचना और क्या हो सकती है, हार्दिक बधाई.

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  13. कविता की शंकि को पहचाना है बाखूबी अरुण जी आपने ...
    बधाई ...

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  14. सखी फागुन फिरे, दहरि दुआरी, फागत फूर फुहार ।
    रे सखि फूर भरे, फुर फुरबारी, सुरभित गंधन धार ॥
    भूरि भेस भूषित, भूषन अभरित, बरसाने के धाम ।
    रे सखि जोग रहें, कब आवेंगे, घन भँवर बर स्याम ॥

    कटि किंकनि कासे, बँसरी धाँसे, मुकुट मौर के पंख ।
    हरि चाप प्रभासे , रंग प्रकासे, पिचकारी करि अंक ॥
    सखि निकसे साँवर, गिरधर नागर, बृंदाबन कर पार ।
    सखी धरे घघरी,सत रंग भरी, खड़ी अगुवन दुआर ॥

    उर चुनरी कोरी, ओढ़े गोरी, भरि पिचकारी रंग ।
    कर जोरा जोरी, खेलत होरी, साँवरिया के संग ॥
    मुख चाँद चकासे, कनक प्रभा से, रागे राग कपोल ।
    धरि किसन मुरारे, मल मलिहारे, हे! हे होरी! बोल ॥

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  15. sundar aur sarthak prastuti, behatareen lekhan

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  16. बहुत सुंदर प्रस्तुति जी

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  17. बहुत सुन्दर और मनमोहक ढ़ंग से कविता की सच्चाई को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।बधाई ....

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