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Wednesday, February 15, 2012

तुम पास नहीं होती.....


तुम पास नहीं होती मेरे, प्रकृति सताने आती है
आस लिये नयनों में अपने, प्यार जताने आती है.................

ऊषा कहती लाली देखो, सुमन कहे रसपान करो
मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ,मुझको न परेशान करो
दूर देश से भाग पवन, मुझको लिपटाने आती है..................

मुस्काती कलियों ने मुझको, अश्रु बहाते देखा है
तुमसे रह कर दूर मुझे, किसने मुस्काते देखा है
दूर्बादल पर पतित अश्रु , रश्मि उठाने आती है.......................

बिरहा में राख न हो जाऊँ,प्रियतम अब तो तुम आ जाओ
कहीं धूल न बन जाऊँ तुम बिन, आकर अब नयन मिला जाओ
नित मृत्यु-सुंदरी मीठी सी, नींद सुलाने आती है...............

(रचना वर्ष-1976)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

26 comments:

  1. दूर्बादल पर पतित अश्रु , रश्मि उठाने आती है.......................


    बहुत सुंदर .... विरह का जीवंत वर्णन

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  2. बेहद कोमल भावों की शानदार कृति।

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  3. कोमल, विरह के प्रेम भरे एहसास

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  4. हमारे ज़माने में ...'
    http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/02/blog-post_15.html

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  5. वाह अरुण भईया... खूबसूरत एहसास संयोजित हैं गीत में...
    सादर बधाई...

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  6. कोमल खूबसूरत अहसास..

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  7. मन के भावो को शब्द दे दिए आपने......

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  8. बहुत खूब भैय्या...
    ये बसंत अब आपके विरह को जान लेगा
    और आंसूओ की धार को पहचान लेगा

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  9. अरुण जी,वाह!!!!!बहुत अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन सुंदर अहसास ,...
    आपका फालोवर बन रहा हूँ,आप भी बने मुझे हार्दिक खुशी होगी,....

    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  10. बहुत सुन्दर अरुण जी...
    सादर.

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  11. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 16-02-2012 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज...हम भी गुजरे जमाने हुये .

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  12. सुंदर कोमल विरह के अहसासों से से सजी भावपूर्ण प्रस्तुति यह इंतज़ार बहुत ही पीढ़ा दायक होता है इस पर ही मैंने भी कुछ लिखा है समय मिले कभी तो आयेगा मेरे आपकी पसंद वाले ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  13. तुम पास नहीं होती मेरे, प्रकृति सताने आती है
    आस लिये नयनों में अपने, प्यार जताने आती है.................

    ऊषा कहती लाली देखो, सुमन कहे रसपान करो
    मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ,मुझको न परेशान करो
    दूर देश से भाग पवन, मुझको लिपटाने आती है...........tarif ke shbad hi nahi mil rhe,waah! kya baat hai,aisi rachna main ne kabhi nahi padhi,bdhaai aap ko

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  14. नित मृत्यु-सुंदरी मीठी सी, नींद सुलाने आती है..............

    आपकी १९७६ की यह रचना पढ़ आनंद आ गया अरुण जी.
    उस समय तो आप कुँवारे रहे होंगें.
    बहुत उत्कृष्ट और हसीं भाव हैं.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईएगा जी.

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    कल शाम से नेट की समस्या से जूझ रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। अब नेट चला है तो आपके ब्लॉग पर पहुँचा हूँ!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  16. वाह!!!!!बहुत अच्छी सुंदर रचना...

    MY NEW POST ...सम्बोधन...

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  17. मुस्काती कलियों ने मुझको, अश्रु बहाते देखा है
    तुमसे रह कर दूर मुझे, किसने मुस्काते देखा है

    प्रकृति के प्रतीकों का मानव भावनाओं के साथ अनोखा सामंजस्य स्थापित है इस सुंदर गीत में।

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  18. मुस्काती कलियों ने मुझको, अश्रु बहाते देखा है
    तुमसे रह कर दूर मुझे, किसने मुस्काते देखा है

    प्रकृति के प्रतीकों का मानव भावनाओं के साथ अनोखा सामंजस्य स्थापित है इस सुंदर गीत में।

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  19. ऊषा कहती लाली देखो, सुमन कहे रसपान करो
    मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ,मुझको न परेशान करो
    दूर देश से भाग पवन, मुझको लिपटाने आती है...

    बहुत ही मधुर गीत अरुण जी ...प्राकृति और काव्य का गज़ब संयिजन है रचना में ...

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  20. आपकी किसी पुरानी बेहतरीन प्रविष्टि की चर्चा मंगलवार २८/८/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी मंगल वार को चर्चा मंच पर जरूर आइयेगा |धन्यवाद

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