ज्योंहि आये तबीयत हरी कर गये
साँवरी साँझ को मदभरी कर गये |
रंग बिखरे प्रतीची सँवरती रही
मेरी रातों को यूँ बावरी कर गये |
क्यारियाँ मस्त होकर महकने लगीं
वृक्ष की शाख को फुलझरी कर गये |
दिल में बातें बहुत अनकही कैद थी
एक पल में उन्हें वो बरी कर गये |
उनकी मुस्कान में था बला का असर
मेरे गीतों को अंत्याक्षरी कर गये ||
खो गया दिल मेरा,नींद भी खो गई
भोली सूरत मगर तस्करी कर गये |
आँखों ही आँखों में बातें दो चार की
मन नहीं मानता मसखरी कर गये |
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (मध्यप्रदेश)