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Friday, November 2, 2018

अल्पना दिखती नहीं

हिन्दी गजल -

आपसी दुर्भावना है, एकता दिखती नहीं
रूप तो सुन्दर सजे हैं, आत्मा दिखती नहीं।।

घोषणाओं का पुलिंदा, फिर हमें दिखला रहे
हम गरीबों की उन्हें तो, याचना दिखती नहीं।।

हर तरफ भ्रमजाल फैला, है भ्रमित हर आदमी
सिद्ध पुरुषों ने बताई, वह दिशा दिखती नहीं।।

संस्कारों की जमीं पर, उग गई निर्लज्जता
त्याग वाली भावना,करुणा, क्षमा दिखती नहीं।।

कोख में मारी गई हैं, बेटियाँ जब से "अरुण"
द्वार पर पहले सरीखी, अल्पना दिखती नहीं।।

रचनाकार - अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (03-11-2018) को "भारत की सच्ची विदेशी बहू" (चर्चा अंक-3144) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. veeruji05.blogspot.com
    vaahgurujio.blogspot.com
    blogpaksh.blogspot.com
    नहीं
    हिन्दी गजल -

    आपसी दुर्भावना है, एकता दिखती नहीं
    रूप तो सुन्दर सजे हैं, आत्मा दिखती नहीं।।

    घोषणाओं का पुलिंदा, फिर हमें दिखला रहे
    हम गरीबों की उन्हें तो, याचना दिखती नहीं।।

    हर तरफ भ्रमजाल फैला, है भ्रमित हर आदमी
    सिद्ध पुरुषों ने बताई, वह दिशा दिखती नहीं।।

    संस्कारों की जमीं पर, उग गई निर्लज्जता
    त्याग वाली भावना,करुणा, क्षमा दिखती नहीं।।

    भ्रूण में मारी गई हैं, बेटियाँ जब से "अरुण"
    द्वार पर पहले सरीखी, अल्पना दिखती नहीं।।

    रचनाकार - अरुण कुमार निगम
    आदित्य नगर, दुर्ग
    छत्तीसगढ़
    आज की वेदना से भरपूर शुद्ध साहित्यिक रूपकों से संसिक्त रचना 'निगम 'अरुण जी की सचमुच आप कविता निगम ही हैं।

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