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Saturday, April 22, 2017

बेला के फूल

दोहा छन्द - बेला के फूल 

स्पर्धा थी सौंदर्य की, मौसम था प्रतिकूल
सूखे फूल गुलाब के, जीते बेला फूल |


चली चिलकती धूप में, जब मजदूरन नार 
अलबेली को देख कर, बेला मानें हार | 

हरदम हँसता देख कर, चिढ़-चिढ़ जाये धूप
बेला की मुस्कान ने, और निखारा रूप | 
पहले गजरे की महक, कैसे जाऊँ भूल 
सुधियों में अब तक खिले, अलबेला के फूल |

मंगल-बेला में हुआ, मन से मन का ब्याह
मन्त्र पढ़े थे नैन ने, बेला बना गवाह |
 

बेलापुर से रामगढ़, चले बसंती रोज 
बेला का गजरा लिये, वीरू करे प्रपोज |



- अरुण कुमार निगम
 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-04-2017) को
    "सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पृथ्वी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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