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Tuesday, April 29, 2014

गज़ल...




नजदीक घर के आपके थाना तो है नहीं
बुड्ढा दरोगा आपका  नाना तो है नहीं

तुड़वा के हाथ पैर करे प्यार आपसे
दिल इतना बेवकूफ दीवाना तो है नहीं

सूरत पे मर मिटे अरे वो लोग और थे
झाँसे में आपके हमें आना तो है नहीं

तालाब छोड़ गाँव का,  गमछा धरे चले
काशी में जाके तुमको नहाना तो है नहीं

सबकी क्षुधा मिटाने का दावा तो कर दिया
चाँवल का घर में एक भी दाना तो है नहीं  

सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है
बन्दर के हाथ इसको थमाना तो है नहीं

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

9 comments:

  1. -सुंदर रचना...
    आपने लिखा....
    मैंने भी पढ़ा...
    हमारा प्रयास हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 01/05/ 2014 की
    नयी पुरानी हलचल [हिंदी ब्लौग का एकमंच] पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...
    आप भी आना...औरों को बतलाना...हलचल में और भी बहुत कुछ है...
    हलचल में सभी का स्वागत है...

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  2. बहुत सुंदर गज़ल

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  3. अपनी इज्जत अपने हाथ जोंग सँभाले रख..,
    मर्दानी जनानियों वाला वो जमाना तो है नहीं.....

    सत्ता की बागडोर गोले-गोली भी तो नहीं है..,
    ऐसे-वैसे को थमा सर पे फुड़वाना तो है नहीँ.....

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  4. सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है
    बन्दर के हाथ इसको थमाना तो है नहीं ...
    लाजवाब ... अरुण जी ... इतना कमाल का व्यंगात्मक शेर आपके ही बस में है ... पूरी गज़ल आफरीन ...

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (30-04-2014) को ""सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है " (चर्चा मंच-1598) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  7. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/04/blog-post_30.html

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  8. सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है
    बन्दर के हाथ इसको थमाना तो है नहीं
    आज के हालात पर अच्छा व्यंग किया अरुणजी आपने

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