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Sunday, May 6, 2012

प्रज्ञा ,शील , करुणा



 (चित्र गूगल से साभार)
रचना- श्रीमती सपना निगम

शुद्धोदन     और    गौतमी    ने
नाजों   से    उसको   पाला   था
यशोधरा   की   मांग  सजी  थी
वह कपिलवस्तु का उजाला था.

राज     वैभव     त्यागे   उसने
छोड़े          सारे         मोहपाश
भिक्षाटन  की   राह   निकला
पहने     थे    भगवा    लिबास

अन्न - जल  त्यागा था  उसने
ज्ञान    की     थी     अभिलाषा
देह    को     भी    कष्ट   देकर
लगी          हाथ         निराशा.

भूखे  रह कर  कुछ न मिलता
यह    बात    उसने   जान  ली
प्राणियों    का    दु:ख    हरेगा
यह    बात   उसने   ठान   ली.
बैसाख     की     पूर्णिमा    थी
चाँद    ने    आस   जगाई   थी
बोधि – वृक्ष  के नीचे सुजाता
खीर      लेकर      आई     थी.

अन्न      से      तृप्ति      मिली
यह     बात    उसने   जानी  है
देह     को    जो    कष्ट   देता
वह       बड़ा       अज्ञानी     है.

उसके    दोनों     चक्षुओं    में
प्रज्ञा       की      गहराई     है
मन      की     अंतर्वेदना    में
करुणा    असीम    समाई  है.

आँख     मूँदे     बैठा    है   वो
ज्ञान     चक्षु      खोल    कर
धम्म      के    उपदेश     देता
वाणी   में   अमृत   घोल कर.

श्रीमती  सपना  निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

17 comments:

  1. बहुत सुंदर.....................

    हमारी बधाई सपना जी को.

    सादर.

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  2. बहुत सुंदर ....

    फिर भी न जाने क्यों लोग उपवास रख शरीर को कष्ट देते हैं :):)

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  3. बुद्ध को समर्पित अच्छी रचना !

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  4. बहुत अच्छी रचना...सपना जी को बधाई

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  5. उसके दोनों चक्षुओं में
    प्रज्ञा की गहराई है
    मन की अंतर्वेदना में
    करुणा असीम समाई है.... waah

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  6. बढ़िया सारगर्वित रचना प्रस्तुति ... बधाई

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  7. भगवान् को सादर प्रणाम ।

    बधाई ।

    सुन्दर प्रस्तुति ।।

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  8. बहुत अच्छी सारगर्भित प्रस्तुति,....

    RECENT POST....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...... बधाई

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  10. बहुत अच्छी रचना..

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  11. प्रभावित करती रचना .

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  12. बुद्धपूर्णिमा के उपलक्ष पर बहतरीन भवाव्यक्ति समय मिले आपको तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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  13. बहुत हि सुन्दर रचना प्रभु को समर्पित

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  14. बधाई एक सुंदर रचना के लिए ...

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  15. आँख मूँदे बैठा है वो
    ज्ञान चक्षु खोल कर
    धम्म के उपदेश देता
    वाणी में अमृत घोल कर.


    bahut hi sundar Nigam sahab ....badhai ke sath sadar abhar bhi .

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  16. .



    आभार सुंदर सृजन के लिए !
    अच्छी रचना है…

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