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Tuesday, May 1, 2012

मजदूर दिवस पर विशेष


धूप में   वह  झुलसता ,  माथे पसीना बह रहा
विषमतायें , विवशतायें , है  युगों से  सह रहा.

सृजन करता  आ रहा है , वह  सभी के वास्ते
चीर  कर  चट्टान  को , उसने   बनाये   रास्ते.

खेत,खलिहानों में उसकी मुस्कुराहट झूमती
उसके दम ऊँची इमारत , है गगन को चूमती.

सेतु , नहरें , बाँध उसके श्रम से ही साकार हैं
देश  की  सम्पन्नता का ,बस वही आधार है.

चिर युगों से देखता  आया जमाने का चलन
कागजों के आँकड़े  ,  आँकड़ों का आकलन.

अल्प में  संतुष्ट रहता , बस्तियों  में  मस्त है
मत दिखा झूठे सपन वह हो चुका अभ्यस्त है.

तू उसे देने चला, दु:ख सहके जो सुख बाँटता
वह तेरी  राहों के   काँटे ,  है  जतन से छाँटता.

लग  जा गले   तू आज ,झूठी वर्जनायें तोड़ कर
वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर.

वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर
वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर.

एक नजर इधर भी : सियानी गोठ   http://mitanigoth2.blogspot.com


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

24 comments:

  1. अल्प में संतुष्ट रहता , बस्तियों में मस्त है
    मत दिखा झूठे सपन वह हो चुका अभ्यस्त है.

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना ,..

    MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

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  2. लग जा गले तू आज,झूठी वर्जनायें तोड़ कर
    वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर

    बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी प्रस्तुति.
    सर्जनकर्ता को नमन.

    अरुण जी,मेरा ब्लॉग विस्मृत मत कीजियेगा,प्लीज.

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  3. बहुत सशक्त लाजबाब उन्नत भावाभिव्यक्ति

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  4. shbdon dwara majdoor diwas par unhen sahi samman diya hai..
    badhai swikaar karen

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बुधवारीय चर्चा-मंच पर |

    charchamanch.blogspot.com

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  6. आज के दिन सार्थक प्रस्तुति

    लग जा गले तू आज ,झूठी वर्जनायें तोड़ कर
    वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर.

    सच ही इन सृजन कर्ता को नमन करना चाहिए

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  7. अल्प में संतुष्ट रहता , बस्तियों में मस्त है
    मत दिखा झूठे सपन वह हो चुका अभ्यस्त है...निर्विकार वह अपने कार्य में तल्लीन है

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  8. सत्य कहा-

    वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर

    वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर.

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  9. वाह बहुत सुंदर अरुण जी...............
    मजदूर दिवस पर अब तक निराला की "वो तोडती पत्थर" ही ख़याल आती थी....

    बहुत सार्थक रचना..
    आभार.

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  10. खेत,खलिहानों में उसकी मुस्कुराहट झूमती
    उसके दम ऊँची इमारत , है गगन को चूमती.


    मजदूर दिवस पर बढ़िया सामयिक रचना अभिव्यक्ति ...

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  11. श्रमिक दिवस पर अच्छी और सार्थक रचना......

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  12. बहुत हि बढिया चित्रण मजदुर के प्रति आपकी भावना को सलाम
    सृजन कर्ता को सलाम

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  13. मजदूर दिवस पर एक सार्थक कविता!!...

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  14. हर शब्द प्रभावशाली और हर पंक्ति अर्थपूर्ण है ...!

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  15. तू उसे देने चला, दु:ख सहके जो सुख बाँटता
    वह तेरी राहों के काँटे , है जतन से छाँटता.

    Bahut Sunder...Prabhavit Karati rachna

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  16. बेहतरीन भाव संयोजन ... सशक्‍त लेखन ।

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  17. वह सृजनकर्ता,नमन कर हाथ दोनों जोड़ कर

    दोनों हाथ जोड़कर उन्हे नमन...
    बहुत सुंदर प्रस्तुति!!

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  18. श्रम की महत्ता पर सार्थक हृदयोद्गार।

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  19. सेतु , नहरें , बाँध उसके श्रम से ही साकार हैं
    देश की सम्पन्नता का ,बस वही आधार है.
    बहुत बहुत शुक्रिया स्तरीय ग़ज़ल पढवाने का ,चर्चा में छाने का ,आपके आने का .
    ये फलसफा है ज़िन्दगी .
    ये श्रम ही है आराधना ,है भास्ना ,उद्भास्ना है ज़िन्दगी की .ढोलक पे छाप ज़िन्दगी की
    बुधवार, 2 मई 2012
    " ईश्वर खो गया है " - टिप्पणियों पर प्रतिवेदन..!
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    लम्बी तान के ,सोना चर्बी खोना
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/05/blog-post_02.html

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  20. कल 04/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  21. प्रभावशाली , प्रवाहमयी..अति सुन्दर रचना...

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  22. sach main vandneey hai yah srijankarta ..

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  23. सेतु , नहरें , बाँध उसके श्रम से ही साकार हैं
    देश की सम्पन्नता का ,बस वही आधार है...

    सदच कहा है मजदूर इन सब का आधार है पर उसका नाम कहीं नहीं है ...

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