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Tuesday, November 1, 2011

अकविता...

उम्र भर की
दहकती
हुई आग में
हीरे सभी
जल गये.

हीरे !
जो रिश्ते थे
बंधन थे
आत्मीयता की किरणें
बिखरती थी
जब वो मेरे
पास आकर मुस्कुराते
और मैं हीरों को
पाकर
हो गया था
अमीर.

मगर एक दिन
स्वार्थ की ज्वाल में
हीरे
अचानक दहकने लगे

मैं बुझाता रहा
आँसुओं से उन्हें
उस गहन धूम्र में
इक धुँधलका उठा
मेरी आँखों को मुझसे
चुरा ले गया

इसी कशमकश में
मैं अंधा हुआ
मेरी दुनियाँ लुटी
रोशनी खो गई.
अपने हाथों से मैंने
टटोला मगर
उंगलियाँ सभी
आग में जल गई.

एक उमर भर दहकता
रहा तब कहीं
आग ठण्डी हुई
मैं अपाहिज हुआ.

मुझको हीरे सभी
राख बनकर मिले
अंधी आँखों में बस कर
रुलाते रहे.

हाँ ! मगर अब नहीं
इतना कमजोर कि
अपनी मजबूरी को लेकर
रोता फिरूँ.

ऐ मेरे दोस्त सुन
मैं परेशां नहीं
मैं हँसूंगा सदा
पागलों की तरह

और किसी दिन इसी
राख की गोद में
उतर आऊंगा
बादलों की तरह.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छतीसगढ़)
विजय नगर,जबलपुर (मध्य प्रदेश)

17 comments:

  1. एक उमर भर दहकता
    रहा तब कहीं
    आग ठण्डी हुई
    मैं अपाहिज हुआ.
    मुझको हीरे सभी
    राख बनकर मिले
    अंधी आँखों में बस कर
    रुलाते रहे...
    सुन्दर पंक्तियाँ! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  2. maarmik, dil ko chhoo lene vali rachna...badhai! maine abhi apne kartavya sthali naagpur me aapki rachna padhi.... us din bloggers meeting me mam se mulaakat hui thee..

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  3. आज सच ही हर रिश्ता राख हुआ जा रहा है .. सच को कहती मार्मिक प्रस्तुति

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  4. हाँ ! मगर अब नहीं
    इतना कमजोर कि
    अपनी मजबूरी को लेकर
    रोता फिरूँ.

    यहां तक बढिया .. आगे भी सकारात्‍मक ही लिखें !!

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  5. मुझको हीरे सभी
    राख बनकर मिले
    अंधी आँखों में बस कर
    रुलाते रहे.
    अपने हिस्से की राख लिए आंसुओं का तर्पण हर कोई कर रहा

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  6. ऐ मेरे दोस्त सुन
    मैं परेशां नहीं
    मैं हँसूंगा सदा
    पागलों की तरह

    और किसी दिन इसी
    राख की गोद में
    उतर आऊंगा
    बादलों की तरह.

    बहुत सुन्दर सृजन अरुण भाई....
    सादर बधाई...

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  7. सच कहती मार्मिक प्रस्तुति....

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    छठपूजा की शुभकामनाएँ!

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  9. लालच और स्वार्थ सब कुछ भष्म कर देते हैं।

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  10. उफ़ …………दर्द और बेबसी की पराकाष्ठा को कैसे उकेरा होगा।

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  11. ऐ मेरे दोस्त सुन
    मैं परेशां नहीं
    मैं हँसूंगा सदा
    पागलों की तरह

    और किसी दिन इसी
    राख की गोद में
    उतर आऊंगा
    बादलों की तरह.
    bhavpoorn, maarmik prastuti..

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  12. बहुत खूब अरुण जी ... सच कहा है रिश्ते इंसान को ऊंचे से ऊंचा मुकाम भी दिलाते अहिं और यही रिश्ते स्वार्थी हो कर दुश्मनी भी निकालते हैं ... गहरी रचना है ...

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  13. वाह बहुत खूब ...शब्द शब्द बोलता है आपकी रचना का


    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    पर आपका स्वागत है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  14. aapki is rachna ka shabd-shabd apni hee ek dastaan sunaa raha hai sacchai ko byaan karti marmik rachna.समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  15. acche shabdo aur bhaavo ka samayojan......

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