गये तुरंग
कहाँ अस्तबल के देखते हैं
कहाँ से आये गधे हैं निकल के देखते हैं
सभी ने ओढ़ रखी खाल शेर की शायद
डरे - डरे से सभी
दल बदल के देखते हैं
वही तरसते यहाँ
चार काँधों की खातिर
सभी के सीने पे जो मूँग दल के देखते हैं
वो आज
थाल सजाये हुये चले
आये
जिन्हें हमेशा
बिना नारियल के देखते हैं
बड़ों-बड़ों में भला
क्या बिसात है अपनी
अभी कुछ और करिश्में गज़ल के
देखते हैं
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्य
प्रदेश)
(ओपन बुक्स ऑन लाइन तरही मुशायरा,अंक-36
में सम्मिलित दूसरी गज़ल)

