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Saturday, April 21, 2012

मुझको नींद नहीं आती है.............


जीवन के खामोश सफर में, मुझको नींद नहीं आती है
मखमल रेशम के बिस्तर में, मुझको नींद नहीं आती है.

जीना सीख लिया तब जाना
कितना है बेदर्द जमाना
कोई न जाने साथ निभाना
व्यर्थ किसी को हृदय बसाना.

रातों को अब किसी प्रहर में, मुझको नींद नहीं आती है
जीवन के खामोश सफर में,मुझको नींद नहीं आती है.

सोचा था , है सफर सुहाना
झूम रहा था मन मस्ताना
ज्योंहि लेकिन हुआ रवाना
बाँह  पसारे  था  वीराना.

प्रेम नगर के इस खंडहर में,मुझको नींद नहीं आती है
जीवन के खामोश सफर में,मुझको नींद नहीं आती है.

एक नजर इधर भी सियानी गोठ   http://mitanigoth2.blogspot.com

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

Wednesday, April 18, 2012

“ सपन संजोते देखा ”



इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

बासंती  यौवन  क्यों   ‘ पतझर-राग ’ सुनाता
सावन  का  मौसम  –  अंतस में  आग जलाता
दीप   ढूँढता  है    -     कोई   अंधियारा   कोना
भ्रमर , कलि के आँचल पर क्यों  दाग लगाता

ऊषा  के  आंगन  -  सूरज को सोते देखा
इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

बुनकर सपने, “ हृदय – जुलाहा”  पीड़ा सहता
मरुथल - सी  सूखी  आँखों  से  झरना  बहता
समझाता  संतोष  –  न  देखो सपन गगन के
“ मेरी अभिलाषा अनंत “ –  यह मन है कहता

कुछ पाने की आस में सबकुछ खोते देखा
इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

(ओबीओ महोत्सव में शामिल रचना)

Saturday, April 14, 2012

अश्क भी रहन होगा..................


रक्षकों के हाथों में , किसी का वसन होगा
अब तो पैदा होते ही  ,   सर पे कफन होगा.

यूँ  न  गजरे के लिये , तोड़िये  कच्ची कली
कल तुम्हारे जूड़े में, फूल क्या –चमन होगा.

काष्ठ-बाला के युग में, महाजनी व्यवस्था है
हँसने वालों सहमों जरा, अश्क भी रहन होगा.

वृक्ष से  प्रशासन पे  ,  आँधी   राजनीति  की
शूर्पणखा की खातिर, कौन अब लखन होगा.

मुनादी  सुनी  तुमने  , आज  यज्ञ - शाला में
भावना की हवि देकर ,स्वार्थ का हवन होगा.

सपनों की नदिया में  , मत की मछलियाँ हैं
योजना की  आरती से , मत्स्य-पूजन होगा.


एक नजर इधर भी सियानी गोठ   http://mitanigoth2.blogspot.com

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)
(रचना वर्ष -  1979)

Wednesday, April 11, 2012

कर्तव्य लौह के अरे ! अधिकार काँच के


रेत के महल यहाँ हैं   ,   द्वार काँच के
किस तरह जीयें यहाँ हैं , यार काँच के.

पत्थरों की मूर्तियों की  भीड़ है यहाँ
आग में  झुलसते हुये    नीड़ हैं यहाँ
व्यापार पत्थरों के, अभिसार काँच के........

विषधरों की छाँव में है, न्याय सो रहा
पाप की काली घटा में,  सूर्य खो रहा
कर्तव्य लौह के अरे ! अधिकार काँच के...........

श्यामली सुबह यहाँ की, काली दोपहर
है  निगल रही समूचे ,   गाँव और शहर
कब तलक सहेजेंगे ,  भिनसार काँच के................

सड़ी-गली व्यवस्था , कब तक सहेंगे हम
बन के कठपुतलियाँ,  कब तक रहेंगे हम
आओ  तोड़ डालें  , हम  हर  द्वार काँच के...............................

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

Sunday, April 8, 2012

खिलने को तरसती हैं.............



बजती नहीं है बाँसुरी,  रूठी हैं उंगलियाँ
मयपान कर रही हैं  ,  रंगीन तितलियाँ.

क्या बात है ,   बाजार  बड़े  सूनसान  हैं
सजने लगी हैं आजकल श्मशान की गलियाँ.

बरसात अपने साथ लिये,   बाढ़ आ गई
जो बच गया,उस पे गिरीं आज बिजलियाँ.

बागों में बड़ी शान से,   हैं खार हँस रहे
खिलने को तरसती हैं मासूम-सी कलियाँ.

मेले की उस भीड़ में,   मालूम क्या देखा ?
कुछ जिस्म बिक रहे थे,मानों हों मछलियाँ.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

Monday, March 26, 2012

पहले - सी अब नजर न आती गौरैया.


चूँ - चूँ करती , धूल  नहाती     गौरैया.
बच्चे , बूढ़े  , सबको  भाती     गौरैया .
 
कभी द्वार से
,कभी झरोखे,खिड़की से
फुर - फुर करती , आती जाती गौरैया .
 
बीन
-बीन कर तिनके ले- लेकर आती
उस   कोने   में  नीड़   बनाती   गौरैया.
 
शीशे
  से  जब  कभी  सामना होता तो,
खुद  अपने   से  चोंच  लड़ाती   गौरैया.
 
बिही
   की शाखा से  झूलती लुटिया से
पानी  पीकर  प्यास   बुझाती   गौरैया.

साथ समय के बिही का भी पेड़ कटा  
सुख वाले दिन बीते
,     गाती गौरैया.
 
दृश्य
  सभी ये ,बचपन की स्मृतियाँ हैं
पहले - सी अब  नजर न आती गौरैया.
 
(पुनर्प्रस्तुति)

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)