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Sunday, April 8, 2012

खिलने को तरसती हैं.............



बजती नहीं है बाँसुरी,  रूठी हैं उंगलियाँ
मयपान कर रही हैं  ,  रंगीन तितलियाँ.

क्या बात है ,   बाजार  बड़े  सूनसान  हैं
सजने लगी हैं आजकल श्मशान की गलियाँ.

बरसात अपने साथ लिये,   बाढ़ आ गई
जो बच गया,उस पे गिरीं आज बिजलियाँ.

बागों में बड़ी शान से,   हैं खार हँस रहे
खिलने को तरसती हैं मासूम-सी कलियाँ.

मेले की उस भीड़ में,   मालूम क्या देखा ?
कुछ जिस्म बिक रहे थे,मानों हों मछलियाँ.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)