बजती नहीं है बाँसुरी, रूठी हैं उंगलियाँ
मयपान कर रही हैं , रंगीन तितलियाँ.
क्या बात है , बाजार बड़े सूनसान हैं
सजने लगी हैं आजकल श्मशान की गलियाँ.
बरसात अपने साथ लिये, बाढ़ आ गई
जो बच गया,उस पे गिरीं आज बिजलियाँ.
बागों में बड़ी शान से, हैं खार हँस रहे
खिलने को तरसती हैं मासूम-सी कलियाँ.
मेले की उस भीड़ में, मालूम क्या देखा ?
कुछ जिस्म बिक रहे थे,मानों हों मछलियाँ.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)