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Tuesday, May 19, 2026

पतिराम साव जयंती पर विशेष




















 “आज पतिराम साव जयंती पर विशेष”

संक्षिप्त परिचय - 

दुर्ग के यशस्वी साहित्यकार, चिंतक,  अध्यापक और समाजसेवी श्रद्धेय पतिराम साव जी का जन्म आज से 122 वर्ष पूर्व आज ही के दिन याने 19 मई 1904 को बिलासपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। अपने शैक्षणिक जीवन के वे अत्यंत ही प्रतिभाशाली छात्र रहे। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने शिक्षक बनना पसंद किया ताकि अच्छी शिक्षा देकर देश के लिए अच्छे नागरिक तैयार कर सकें। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि मुकुंद कौशल, पतिराम साव जी के ही शिष्य थे। तिलक प्राथमिक शाला में उन्होंने मुकुंद कौशल को न केवल पढ़ाया था बल्कि उन्हें कविता करने की भी प्रेरणा दी थी। खादी की श्वेत धोती, श्वेत कुर्ता, सिर पर गाँधी टोपी और हाथ में एक छड़ी उनके व्यक्तित्व को विशेष बनाती थी। छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम “दलित” जी जब अपना गृह-ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) छोड़ कर दुर्ग में आये तब वे पचरी पारा में पतिराम साव जी के पड़ोस में रहने लगे थे इसीलिए दोनों में काफी घनिष्ठता रही। 

जुझारूपन - 

पतिराम साव जी बहुत जुझारू व्यक्ति थे | 1947 में स्वराज के बाद शिक्षक संघ के प्रांतीय आंदोलन में वे कूद पड़े तब उन्हें अन्य आंदोलनकारियों के साथ गिरफ्तार कर 15 दिनों के लिये नागपुर जेल में बंद रखा गया था। जेल से छूटने के बाद उन्हें प्रधानाध्यापक पद से ‘रिवर्ट’ कर दिया गया था। 

“साहू संदेश पत्रिका” 

पतिराम साव जी उस दौर में (1969 से 1968) जब शहर में प्रिंटिंग की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी, “साहू-संदेश” नामक पत्रिका निकाल कर समाज को जागरूक करते रहते थे। यह पत्रिका साहू समाज की गतिविधियों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि दुर्ग नगर के साहित्यकारों के लिए भी समर्पित थी। इस पत्रिका में न केवल कोदूराम “दलित”, दानेश्वर शर्मा, रघुवीर अग्रवाल “पथिक” जैसे श्रेष्ठ साहित्यकारों की रचनाएँ ही प्रकाशित होती थीं बल्कि कक्षा आठवीं के छात्र जैसे नवोदित कवियों की कविताओं को भी स्थान मिलता था। साहू संदेश में स्थानीय रचनाकारों को “समस्या पूर्ति” हेतु विषय दिया जाता था और प्राप्त रचनाओं को प्रकाशित भी किया जाता था। (साहू संदेश के कुछ महत्वपूर्ण पन्ने मेरे संकलन में हैं उनकी छाया प्रतियाँ भी संलग्न की गई हैं।)

साहित्यिक गतिविधियाँ -

पतिराम साव जी साहित्य विशारद थे। वे दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के एक प्रमुख आधार स्तंभ भी थे। उनके मार्गदर्शन में दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति ने अनेक ऊँचाइयाँ प्राप्त की थी। वे इस समिति में अध्यक्ष और मंत्री के पद पर भी लंबे समय तक रहे। दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति द्वारा 28 मई 1959 में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन के वे स्वागताध्यक्ष थे। द्वितीय अधिवेशन की अध्यक्षता उदय प्रसाद “उदय” जी ने की थी और उद्घाटनकर्ता डॉ. भवानी प्रसाद तिवारी थे। इसी परम्परा में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का चतुर्थ अधिवेशन पाटन में 23 अप्रैल 1961 को आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन के उद्घाटनकर्ता डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र थे और अध्यक्षता पतिराम साव जी ने की थी। (1959 और 1961 में आयोजित अधिवेशन से संबंधित दस्तावेजों तथा पतिराम साव जी की कविताओं की छाया प्रतियाँ, मेरे संकलन से संलग्न हैं)

“समाज रत्न पतिराम साव सम्मान”

पतिराम साव जी जीवन-पर्यन्त साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। वे  05 अक्टूबर 1995 को इस नश्वर संसार से विदा हुए। उनके गोलोक गमन के बाद उनके परिजनों ने उनकी स्मृति में साहित्य, पर्यावरण, सामाजिक जैसे विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को “समाज रत्न पतिराम साव सम्मान” से सम्मानित करने की परम्परा शुरू की थी। गेंदलाल देशमुख, मुकुंद कौशल, परदेशी राम वर्मा, पुनुराम साहू, अशोक सिंघई, विद्या देवी साहू जैसी हस्तियाँ “समाज रत्न पतिराम साव सम्मान” से समानित हो चुकी हैं। 

“पतिराम साव जी पर कुछ विद्वजन के विचार” - 

एक सम्मान सम्मान समारोह में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रविशंकर विश्वfद्यालय, रायपुर के तत्कालीन कुलपति डॉ.शिवकुमार पाण्डेय ने कहा था - ‘पतिराम साव की समाजसेवा कोई जातिगत समाज सेवा नहीं थी, उन्होंने अपने समय में समाज के विभिन्न घटकों को जोड़ने और हमेशा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का कार्य किया था। समाजसेवा, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्रों में वे जहाँ भी सक्रिय रहे समाज के सभी लोगों को एक साथ लेकर चले। उनका यह प्रयास हमारे आज के समय की भी एक बड़ी जरुरत है।’

एक अन्य समारोह में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, कल्याण महाविद्यालय, भिलाई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.सुधीर शर्मा ने कहा था - “वह लेखक हमेशा जीवित रहता है जो अपने युग और समय पर हस्तक्षेप करता चलता है. पतिराम साव आज भी हमारे बीच जीवित हैं क्योंकि वे अपने समय के प्रति सतर्क थे. वे ‘साहू सन्देश’ के संपादकीय में अपने युग में हो रहे परिवर्तनों पर निरंतर हस्तक्षेप कर रहे थे. वे केवल कविता के ही नहीं हिंदी गद्य के भी सशक्त कलमकार थे. इसलिए हम आज भी उनके विचारों का स्मरण करते हैं और उनसे सीख ग्रहण करते हैं”। 

“श्रद्धा-सुमन” - 

जब मेरे पिता कोदूराम “दलित” जी पचरी पारा में रहते थे तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। जब पिताजी स्वयं के शिक्षक नगर दुर्ग स्थित मकान में आये तब पतिराम साव जी का हमारे घर में आना-जाना रहा। मैंने उन्हें देखा भी है और उनका आशीर्वाद भी पाया है। मैं ऐसी महान विभूति की पावन जयंती के अवसर पर अपनी और दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति की ओर से श्रद्धेय पतिराम साव जी को श्रद्धा-सुमन समर्पित करता हूँ। 

आलेख - अरुणकुमार निगम, दुर्ग

(रंगीन चित्र गूगल से साभार, भवेत-श्याम चित्र मेरे संकलन से)

Thursday, March 19, 2026

"छत्तीसगढ़ी गजल"

 "छत्तीसगढ़ी गजल"


करथे अलकरहा बात कभू

दिन ला वो कहिथे रात कभू


जिनगी के पोनी उरकत हे

तँय सूत करम के कात कभू


जिनगी मा तुम पानी राखव

बिन पानी चुरथे भात कभू


का सूरज ऊपर थूकत हव

देखव खुद के औकात कभू


मनखे ला मनखे माने कर

झन पूछ धरम अउ जात कभू


भूतन मन सँग झन बात करव

वो सुधरे हे बिन लात कभू


गुरतुर कविता के संग “अरुण”

लिख दे कर ताते-तात कभू


अरुण कुमार निगम

छत्तीसगढ़

Sunday, September 28, 2025

छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित"

 58 वीं पुण्यतिथि पर सादर नमन.........

                                                                              छत्तीसगढ़ मा छन्द के अलख जगइया - जनकवि कोदूराम "दलित" 

छत्तीसगढ़ी कवि सम्मेलन के हर मंच ले दुनिया मा कविता के सब ले छोटे परिभाषा ला सुरता करे जाथे “जइसे मुसुवा निकलथे बिल ले, वइसे कविता निकलथे दिल ले” अउ एकरे संग सुरता करे जाथे ये परिभाषा देवइया जनकवि कोदूराम “दलित” जी ला. दलित जी के जनम ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) मा 05 मार्च 1910 के होइस. उनकर काव्य यात्रा सन् 1926 ले शुरू होईस. छत्तीसगढ़ी अउ


हिन्दी मा उनकर बराबर अधिकार रहिस. गाँव मा बचपना बीते के कारन उनकर कविता मा प्रकृति चित्रण देखे ले लाइक रथे. दलित जी अपन जिनगी मा भारत के गुलामी के बेरा ला देखिन अउ आजादी के बाद के भारत ला घलो देखिन. अंग्रेज मन के शासन काल मा सरकार के विरोध मा बोले के मनाही रहिस, आन्दोलन करइया मन ला पुलिसवाला मन जेल मा बंद कर देवत रहिन. अइसन बेरा मा दलित जी गाँव गाँव मा जा के अपन कविता के माध्यम ले देशवासी मन हे हिरदे मा देशभक्ति के भाव ला जगावत रहिन. दोहा मा देशभक्ति के सन्देश दे के राउत नाचा के माध्यम ले आजादी के आन्दोलन ला मजबूत करत रहिन. आजादी के पहिली के उनकर कविता मन आजादी के आव्हान रहिन. आजादी के बाद दलित जी अपन कविता के माध्यम ले सरकारी योजना मन के भरपूर प्रचार करिन. समाज मा फइले अन्धविश्वास, छुआछूत, अशिक्षा  जइसन कुरीति ला दूर करे बर उनकर कलम मशाल के काम करिस. 

जनकवि कोदूराम “दलित” जी के पहचान छत्तीसगढ़ी कवि के रूप मा होइस हे फेर उनकर हिन्दी भाषा ऊपर घलो समान अधिकार रहिस. लइका मन बर सरल भाषा मा बाल कविता, जनउला, बाल नाटक, क्रिया गीत रचिन. तइहा के ज़माना मा ( सन् पचास के दशक) जब छत्तीसगढ़ी भाषा गाँव देहात के भाषा रहिस कोदूराम दलित जी आकाशवाणी नागपुर, भोपाल, इंदौर मा जा के छत्तीसगढ़ी भाषा मा कविता  अउ कहानी सुनावत रहिन. छत्तीसगढ़ी भाषा ला कविसम्मेलन के मंच मा स्थापित करइया शुरुवाती दौर के कवि मन मा उनला सुरता करे जाही. दलित जी के भाषा सरल, सरस औ सुबोध रहिस. व्याकरण के शुद्धता ऊपर वोमन ज्यादा ध्यान देवत रहिन इही पाय के उनकर ज्यादातर कविता मन मा छन्द के दर्शन होथे. दलित जी के हिन्दी रचना मन घलो छन्दबद्ध हें.   पंडित सुंदरलाल शर्मा के बाद कोनो कवि हर छत्तीसगढ़ मा छन्द ला पुनर्स्थापित करिस हे त वो कवि कोदूराम "दलित" आय. 28 सितम्बर 1967 के दलित जी के निधन होइस। दलित जी के छन्दबद्ध रचना ला छन्द विधान सहित जानीं।

 

दोहा छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 13 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। कोदूराम दलित जी के नीतिपरक दोहा देखव -


संगत सज्जन के करौ, सज्जन सूपा आय।

दाना दाना ला रखै, भूँसा देय उड़ाय।।


दलित जी मूलतः हास्य व्यंग्य के कवि रहिन। उनकर दोहा मा समाज के आडम्बर ऊपर व्यंग्य देखव - 


ढोंगी मन माला जपैं, लम्भा तिलक लगाँय।

मनखे ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खाँय।।


बाहिर ले बेपारी मन आके सिधवा छत्तीसगढ़िया ऊपर राज करे लगिन। ये पीरा ला दलित जी व्यंग्य मा लिखिन हें – 


फुटहा लोटा ला धरव, जावव दूसर गाँव।

बेपारी बनके उहाँ, सिप्पा अपन जमाँव।।


टिकरी गाँव के माटी मा जनमे कवि दलित के बचपना गाँवे मा बीतिस। गाँव मा हर चीज के अपन महत्व होथे। गोबर के सदुपयोग कइसे करे जाय, एला बतावत उनकर दोहा देखव –


गरुवा के गोबर बिनौ, घुरवा मा ले जाव।

खूब सड़ो के खेत बर, सुग्घर खाद बनाव।।


छत्तीसगढ़ धान के कटोरा आय। इहाँ के मनखे के मुख्य भोजन बासी आय। दलित जी भला बासी के गुनगान कइसे नइ करतिन – 


बासी मा गुन हे गजब, येला सब मन खाव।

ठठिया भर पसिया पियव, तन ला पुष्ट बनाव।।


दलित जी किसान के बेटा रहिन। किसानी के अनुभव उनकर दोहा मा साफ दिखत हे – 


बरखा कम या जासती, होवय जउने साल।

धान-पान होवय नहीं, पर जाथै अंकाल।।


जनकवि कोदूराम "दलित" जी नवा अविष्कार ला अपनाये के पक्षधर रहिन। ये प्रगतिशीलता कहे जाथे। कवि ला बदलाव के संग चलना पड़थे। देखव उनकर दोहा मा विज्ञान ला अपनाए बर कतिक सुग्घर संदेश हे – 


आइस जुग विज्ञान के, सीख़ौ सब विज्ञान।

सुग्घर आविष्कार कर, करौ जगत कल्यान।।


सोरठा छन्द - ये दोहा के बिल्कुले उल्टा होथे। यहू दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों विषम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ विषम चरण के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 11 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


बंदँव बारम्बार, विद्या देवी सरस्वती।

पूरन करहु हमार, ज्ञान यज्ञ मातेस्वरी।।


उल्लाला छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। विषम अउ सम चरण  या सम अउ सम चरण आपस मा तुकांत होथें अउ हर चरण दोहा के विषम चरण असन होथे। ये छन्द मा 13 अउ 13 मात्रा मा यति होथे।


खेलव मत कोन्हों जुआ, करव न धन बरबाद जी।

आय जुआ के खेलना, बहुत बड़े अपराध जी।। 

 

सरसी छन्द - दू पद अउ चार चरण के छन्द आय। दुनों पद आपस मा तुकांत होथें अउ पद के अंत गुरु, लघु मात्रा ले होथे। 16 अउ 11 मात्रा मा यति होथे। दलित जी सन् 1931 मा दुरुग आइन अउ इहें बस गें। वोमन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। उनकर सरसी छन्द मा गुरुजी के पीरा घलो देखे बर मिलथे –


चिटिक प्राथमिक शिक्षक मन के, सुनलो भइया हाल।

महँगाई के मारे निच्चट , बने हवयँ कंगाल।।


गुरुजी मन के हाल बर सरकार ऊपर व्यंग्य देखव –

 

जउन देस मा गुरूजी मन ला, मिलथे कष्ट अपार।

कहै कबीरा तउन देस के , होथे बंठाढार।।


दलित जी अइसन गुरुजी मन ऊपर घलो व्यंग्य करिन जउन मन अपन दायित्व ला बने ढंग ले नइ निभावँय – 


जउन गुरूजी मन लइका ला, अच्छा नहीं पढ़ायँ।

तउन गुरूजी अपन देस के, पक्का दुस्मन आयँ।।


रोला छन्द - चार पद, दू - दू पद मा तुकांत, 11 अउ 13 मात्रा मे यति या हर पद मा कुल 24 मात्रा।

दलित जी के ये रोला छन्द मा बात के महत्ता बताये गेहे –


जग के लोग तमाम, बात मा बस मा आवैं।

बाते मां  अड़हा - सुजान  मन चीन्हें जावैं।।

करो सम्हल के बात, बात मा झगरा बाढ़य।

बने-बुनाये काम,सबो ला  बात  बिगाड़य।।


आज के जमाना मा बेटा-बहू मन अपन ददा दाई ला छोड़ के जावत हें। इही पीरा ला बतावत दलित जी के एक अउ रोला छन्द – 


डउकी के बन जायँ, ददा - दाई नइ भावैं।

छोड़-छाँड़ के उन्हला, अलग पकावैं-खावैं।।

धरम - करम सब भूल, जाँय भकला मन भाई।

बनँय ददा-दाई बर ये कपूत दुखदाई।।


छप्पय छन्द – एक रोला छन्द के बाद एक उल्लाला छन्द रखे ले छप्पय छन्द बनथे। ये छै पद के छन्द होथे। गुरु के महत्ता बतावत दलित जी के छप्पय छन्द देखव –


गुरु हर आय महान, दान विद्या के देथे।

माता-पिता समान, शिष्य ला अपना लेथे।।

मानो गुरु के बात, भलाई गुरु हर करथे।

खूब सिखो के ज्ञान, बुराई गुरु हर हरथे।।

गुरु हरथे अज्ञान ला, गुरु करथे कल्यान जी।

गुरु के आदर नित करो, गुरु हर आय महान जी।।


चौपई छन्द - 15, 15 मात्रा वाले चार पद के छन्द चौपई छन्द कहे जाथे। चारों पद या दू-दू पद आपस मे तुकांत होथें। 


धन धन रे न्यायी भगवान। कहाँ हवय जी आँखी कान।।

नइये ककरो सुरता-चेत। देव आस के भूत-परेत।।

एक्के भारत माँ के पूत। तब कइसे कुछ भइन अछूत।।

दिखगे समदरसीपन तोर। हवस निचट निरदई कठोर।।


चौपाई छन्द - ये 16, 16 मात्रा मे यति वाले चार पद के छन्द आय। एखर एक पद ला अर्द्धाली घलो कहे जाथे। चौपाई बहुत लोकप्रिय छन्द आय। तुलसीदास के राम चरित मानस मा चौपाई के सब ले ज्यादा प्रयोग होय हे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन कविता ला साकार घलो करत रहिन। उन प्राथमिक शाला के गुरुजी रहिन। अपन निजी प्रयास मा प्रौढ़ शिक्षा के अभियान चला के  आसपास के गाँव साँझ के जाके प्रौढ़ गाँव वाला मन ला पढ़ावत घलो रहिन। प्रौढ़ शिक्षा ऊपर उनकर एक चौपाई – 


सुनव सुनव सब बहिनी भाई। तुम्हरो बर अब खुलिस पढ़ाई।।

गपसप मा झन समय गँवावव। सुरता करके इसकुल आवव।।

दू दू अक्छर के सीखे मा। दू-दू अक्छर के लीखे मा।।

मूरख हर पंडित हो जाथे। नाम कमाथे आदर पाथे।।

अब तो आइस नवा जमाना।हो गै तुम्हरे राज खजाना।।

आज घलो अनपढ़ रहि जाहू।तो कइसे तुम राज चलाहू।।


पद्धरि छन्द - ये 16, 16 मात्रा मा यति वाले दू पद के छ्न्द आय। एखर शुरुवात मा द्विकल (दू मात्रा वाले शब्द) अउ अंत मा जगण (लघु, गुरु, लघु मात्रा वाले शब्द) आथे। हर दू पद आपस मा तुकांत होथे। दलित जी अपन जागरण गीत मा पद्धरि छन्द के बड़ सुग्घर प्रयोग करिन हें – 


झन सुत सँगवारी जाग जाग। अब तोर देश के खुलिस भाग।।

अड़बड़ दिन मा होइस बिहान। सुबरन बिखेर के उइस भान।।

घनघोर घुप्प अँधियार हटिस। ले दे के पापिन रात कटिस।।

वन उपवन माँ आइस बहार। चारों कोती छाइस बहार।। 


मनहरण घनाक्षरी - कई किसम के घनाक्षरी छन्द होथे जेमा मनहरण घनाक्षरी सब ले ज्यादा प्रसिद्ध छन्द आय। येहर वार्णिक छन्द आय। 16, 15 वर्ण मा यति देके चार डाँड़ आपस मा तुकांत रखे ले मनहरण घनाक्षरी लिखे जाथे। चारों डाँड़ आपस मा तुकांत रहिथे। घनाक्षरी छन्द ला कवित्त घलो कहे जाथे। जनकवि कोदूराम "दलित" जी के ये प्रिय छन्द रहिस। उनकर बहुत अकन रचना मन घनाक्षरी छन्द मा हें। कविता मा गाँव के नान नान चीज ला प्रयोग मा लाना उनकर विशेषता रहिस। ये मनहरण घनाक्षरी मा देखव अइसन अइसन चीज के बरतन हे जउन मन समे के संगेसंग नँदा गिन। चीज के नँदाए के दूसर प्रभाव भाजहा ऊपर पड़थे। चीज के संगेसंग ओकर नाम अउ शब्द मन चलन ले बाहिर होवत जाथें अउ शब्दकोश कम होवत जाथे। तेपाय के असली साहित्यकार मन अइसन चीज के नाम के प्रयोग अपन साहित्य मा करके ओला चलन मा जिन्दा राखथें। ये घनाक्षरी दलित जी अइसने प्रयास आय – 


सूपा ह पसीने-फुने, चलनी चालत जाय

बहाना मूसर ढेंकी, मन कूटें धान-ला।

हँसिया पउले साग, बेलना बेलय रोटी

बहारी बहारे जाँता पिसय पिसान-ला।

फुँकनी फुँकत जाय, चिमटा ह टारे आगी

बहू रोज राँधे-गढ़े, सबो पकवान-ला।

चूल्हा बटलोही डुवा तेलाई तावा-मनन

मिलके तयार करें, खाये के समान-ला।।


जब अपन देश ऊपर कोनो दुश्मन देश हमला कर देथे तब कवि के कलम दुश्मन ला ललकारथे। सन् 1962 मा चीन हर हर देश ऊपर हमला करे रहिस। दलित जी के कलम के ललकार देखव - 


चीनी आक्रमण के विरुद्ध (घनाक्षरी)


अरे बेसरम चीन, समझे रहेन तोला

परोसी के नता-मा, अपन बँद-भाई रे।

का जानी कि कपटी-कुटाली तैं ह एक दिन

डस देबे हम्मन ला, डोमी साँप साहीं रे ।

बघवा के संग जूझे, लगे कोल्हिया निपोर

दीखत हवे कि तोर आइगे हे आई रे।

लड़ाई लड़े के रोग, डाँटे हवै बहुँते तो

रहि ले-ले तोर हम, करबो दवाई रे ।। 


अइसने सन् 1965 मा पाकिस्तान संग जुद्ध होइस। दलित जी के आव्हान ला देखव ये घनाक्षरी मा –

 

चलो जी चलो जी मोर, भारत के वीर चलो

फन्दी पाकिस्तानी ला, हँकालो मार-मार के।

कच्छ के मेड़ों के सबो, चिखलही भुइयाँ ला

पाट डारो उन्हला, जीयत डार-डार के।

सम्हालो बन्दूक बम , तोप तलवार अब

आये है समय मातृ-भूमि के उद्धार के।

धन देके जन देके, लहू अउ सोन देके

करो खूब मदद अपन सरकार के।।


गाँव मे पले-बढ़े के कारण दलित जी अपन रचना मन मा गाँव के दृश्य ला सजीव कर देवत रहिन। उनकर चउमास नाम के कविता घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। उहाँ के दू दृश्य मा छत्तीसगढ़ के गाँव के सजीव बरनन देखव – 


बाढिन गजब माँछी बत्तर-कीरा "ओ" फांफा,

झिंगरुवा, किरवा, गेंगरुवा, अँसोढिया ।

पानी-मां मउज करें-मेचका भिंदोल घोंघी,

केंकरा केंछुवा जोंक मछरी अउ ढोंड़िया ।।

अँधियारी रतिहा मा अड़बड़ निकलयं,

बड़ बिखहर बिच्छी सांप-चरगोरिया ।

कनखजूरा-पताड़ा सतबूंदिया औ" गोहे,

मुंह लेड़ी धूर नाँग, कँरायत कौड़िया ।।


जनकवि कोदूराम "दलित" के एक प्रसिद्ध रचना "तुलसी के मया मोह राई छाईं उड़गे" मा गोस्वामी तुलसी दास के जनम ले लेके राम चरित मानस गढ़े तक के कहिनी घनाक्षरी छन्द मा रचे गेहे। वो रचना के एक दृश्य देखव कि छत्तीसगढ़ के परिवेश कइसे समाए हे – 


एक दिन आगे तुलसी के सग सारा टूरा,

ठेठरी अउ खुरमी ला गठरी मा धर के।

पहुँचिस बपुरा ह हँफरत-हँफरत,

मँझनी-मँझनिया रेंगत थक मर के।

खाइस पीइस लाल गोंदली के संग भाजी,

फेर ओह कहिस गजब पाँव पर के।

रतनू दीदी ला पठो देते मोर संग भाँटो,

थोरिक हे काम ये दे तीजा-पोरा भर के।।


कुण्डलिया छन्द – ये छै डांड़ के छन्द होथे. पहिली दू  डांड़ दोहा के होथे ओखर बाद एक रोला छन्द रखे जथे. दोहा के चौथा चरण रोला के पहिली चरण बनथे. शुरू के शब्द या शब्द-समूह वइसने के वइसने कुण्डलिया के आखिर मा आना अनिवार्य होते. कोदूराम "दलित" जी  आठ सौ ले ज्यादा कविता लिखिन हें फेर अपन जीवन काल मा एके किताब छपवा पाइन - "सियानी गोठ"। ये किताब कुण्डलिया छन्द के संग्रह हे। कवि गिरिधर कविराय, कुण्डलिया छन्द के जनक कहे जाथें। उनकर परम्परा ला दलित जी, छत्तीसगढ़ मा पुनर्स्थापित करिन हें। साहित्य जगत मा कोदूराम "दलित" जी ला छत्तीसगढ़ के गिरिधर कविराय घलो कहे जाथे। गिरिधर कविराय के जम्मो कुण्डलिया छन्द नीतिपरक हें फेर दलित जी के कुण्डलिया छन्द मा विविधता देखे बर मिलथे। आवव कोदूराम "दलित" जी के कुण्डलिया छन्द के अलग-अलग रंग देखव – 


नीतिपरक कुण्डलिया – राख


नष्ट करो झन राख –ला, राख काम के आय।

परय खेत-मां राख हर , गजब अन्न उपजाय।।

गजब  अन्न  उपजाय, राख मां  फूँको-झारो।

राखे-मां  कपड़ा – बरतन  उज्जर  कर  डारो।।

राख  चुपरथे  तन –मां, साधु,संत, जोगी मन।

राख  दवाई  आय, राख –ला नष्ट करो झन।।


सम सामयिक  - पेपर

पेपर मन –मां रोज तुम, समाचार छपवाव।

पत्रकार संसार ला, मारग सुघर दिखाव।।

मारग सुघर दिखाव, अउर जन-प्रिय हो जाओ।

स्वारथ - बर पेपर-ला, झन पिस्तौल बनाओ।।

पेपर मन से जागृति आ जावय जन-जन मा।

सुग्घर समाचार छपना चाही पेपर-मा।।


पँचसाला योजना  (सरकारी योजना) - 

 

पँचसाला हर योजना, होइन सफल हमार।

बाँध कारखाना सड़क, बनवाइस सरकार।।

बनवाइस सरकार, दिहिन सहयोग सजाबो झन।

अस्पताल बिजली घर इसकुल घलो गइन बन।।

देख हमार प्रगति अचरज, होइस दुनिया ला।

होइन सफल हमार, योजना मन पँचसाला।।


अल्प बचत योजना - (जन जागरण)

अल्प बचत के योजना, रुपया जमा कराव।

सौ के बारे साल मा, पौने दू सौ पाव।।

पौने दू सौ पाव, आयकर पड़ै न देना।

अपन बाल बच्चा के सेर बचा तुम लेना।।

दिही काम के बेरा मा, ठउँका  आफत के।

बनिस योजना तुम्हरे खातिर अल्प बचत के।।


विज्ञान – (आधुनिक विचार)

आइस जुग विज्ञान के , सीखो  सब  विज्ञान।

सुग्घर आविस्कार कर ,  करो जगत कल्यान।।

करो जगत कल्यान, असीस सबो झिन के लो।

तुम्हू जियो अउ दूसर मन ला घलो जियन दो।।

ऋषि मन के विज्ञान , सबो ला सुखी बनाइस।

सीखो सब  विज्ञान,   येकरे जुग अब आइस।।


टेटका – (व्यंग्य) 


मुड़ी हलावय टेटका, अपन टेटकी संग।

जइसन देखय समय ला, तइसन बदलिन रंग।।

तइसन बदलिन रंग, बचाय अपन वो चोला।

लिलय  गटागट जतका, किरवा पाय सबोला।।

भरय पेट तब पान-पतेरा-मां छिप जावय।

ककरो जावय जीव, टेटका मुड़ी हलावय।।


खटारा साइकिल – (हास्य)


अरे खटारा साइकिल, निच्चट गए बुढ़ाय।

बेचे बर ले जाव तो, कोन्हों नहीं बिसाय।।

कोन्हों नहीं बिसाय, खियागें सब पुरजा मन।

सुधरइया मन घलो हार खागें सब्बो झन।।

लगिस जंग अउ उड़िस रंग, सिकुड़िस तन सारा।

पुरगे मूँड़ा तोर, साइकिल अरे खटारा।।


अउ आखिर मा दलित जी के ये कुण्डलिया छन्द, हिन्दी भाषा मा -

नाम -

रह जाना है नाम ही, इस दुनिया में यार।

अतः सभी का कर भला, है इसमें ही सार।।

है इसमें ही सार, यार तू तज के स्वारथ।

अमर रहेगा नाम, किया कर नित परमारथ।।

काया रूपी महल, एक दिन ढह जाना है।

किन्तु सुनाम सदा दुनिया में रह जाना है।।

छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम "दलित" जी अपन पहिली कुण्डलिया छन्द संग्रह "सियानी गोठ" (प्रकाशन वर्ष - 1967) मा अपन भूमिका मा लिखे रहिन- "ये बोली (छत्तीसगढ़ी) मा खास करके छन्द बद्ध कविता के अभाव असन हवय, इहाँ के कवि-मन ला चाही कि उन ये अभाव के पूर्ति करें। स्थायी छन्द लिखे डहर जासती ध्यान देवें। ये बोली पूर्वी हिन्दी कहे जाथे। येहर राष्ट्र-भाषा हिन्दी ला अड़बड़ सहयोग दे सकथे। यही सोच के महूँ हर ये बोली मा रचना करे लगे हँव"। 

उंकर निधन 28 सितम्बर 1967 मा होइस, उंकर बाद छत्तीसगढ़ी मा छन्दबद्ध रचना लिखना लगभग बंद होगे। सन् 2015 के दलित जी के बेटा अरुण कुमार निगम हर छत्तीसगढ़ी मा विधान सहित 50 किसम के छन्द के एक संग्रह "छन्द के छ" प्रकाशित करवा के दलित जी के सपना ला पूरा करिन। आजकाल छन्द के छ नाम के ऑनलाइन गुरुकुल मा छत्तीसगढ़ के नवा कवि मन ला छन्द के ज्ञान देवत हें जेमा करीब 300 ले आगर नवा कवि मन छत्तीसगढ़ी भाषा मा कई किसम के छन्द लिखत हें अउ अपन भाषा ला पोठ करत हें। 


आलेख - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़

Thursday, September 19, 2024

कुण्डलिया छन्द

चंदा में रोटी....


रोटी में चन्दा दिखे, श्वेत घटा में खीर।

नहीं सता सकती हमें, किसी तरह की पीर।।

किसी तरह की पीर, नहीं हम पाला करते।


जैसे हों हालात, स्वयं को ढाला करते।।


इच्छाओं को पाल, कहो तुम किस्मत खोटी।


हम तो हैं खुशहाल, देख चन्दा में रोटी।।


अरुण कुमार निगम

दुर्ग

Friday, February 2, 2024

फरवरी

 "वासंती फरवरी"


कम-उम्र बदन से छरहरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


शायर कवियों का दिल लेकर

शब्दों का मलयानिल लेकर

गाती है करमा ब्याह-गीत

पंथी पंडवानी भरथरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


गुल में गुलाब का दिवस लिए

इक प्रेम-दिवस भी सरस लिए

है पर्यावरण प्रदूषित पर

बातें इसकी हैं मदभरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


इसकी भी अपनी हस्ती है

इसमें मेलों की मस्ती है

नमकीन मधुर कुछ खटमीठी

थोड़ी तीखी कुछ चरपरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


यह बारह भाई-बहनों में

इकलौती सजती गहनों में

यूँ आती यूँ चल देती है

बस नजर डाल कर सरसरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


सुख शेष कहाँ अब जीवन में

घुट रही साँस वातायन में

कुछ राहत सी दे जाती है

बन स्वप्न-लोक की जलपरी

लाई वसंत फिर फरवरी।


रचनाकार - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग

छत्तीसगढ़

Monday, November 6, 2023

"सूरत पानीदार रखो जी"

 "सूरत पानीदार रखो जी"

तोहफों की भरमार रखो जी

भाषण लच्छेदार रखो जी


लॉलीपॉप-रेवड़ी जैसे

आकर्षक उपहार रखो जी


जनता चाहे रोये-कलपे

खुश अपना परिवार रखो जी


जोड़-तोड़ में धन फूँको पर

अपनी ही सरकार रखो जी


जय जयकार कराने खातिर

कुछ-बन्दे  तैयार रखो जी


पौने पाँच साल अकड़ो और

तीन माह व्यवहार रखो जी


तिनके काम नहीं आएंगे

हाथों में पतवार रखो जी


कौन कसौटी पर कसता है

वादों का अंबार रखो जी


अरुण रहे कैसी भी सीरत

सूरत पानीदार रखो जी


रचना - अरुण कुमार निगम 

Thursday, August 17, 2023

एक ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल :


सदन को यूँ सँभाला जा रहा है 

हर इक मुद्दे को टाला जा रहा है


रक़ीबों ने किया है जुर्म फिर भी

हमारा नाम उछाला जा रहा है


बचेगा किस तरह दंगों का ज़ख़्मी

नमक घावों पे डाला जा रहा है


सभा में भीड़ है दुर्योधनों की

युधिष्ठिर को निकाला जा रहा है


इधर गायें भटकती हैं सड़क पर

उधर कुत्तों को पाला जा रहा है


सुबह अखबार में खबरों को पढ़ के 

हलक़ से क्या निवाला जा रहा है?


लिखे अशआर क्या दो-चार सच पर

"अरुण" का घर खँगाला जा रहा है


- अरुण कुमार निगम