“आज पतिराम साव जयंती पर विशेष”
संक्षिप्त परिचय -
दुर्ग के यशस्वी साहित्यकार, चिंतक, अध्यापक और समाजसेवी श्रद्धेय पतिराम साव जी का जन्म आज से 122 वर्ष पूर्व आज ही के दिन याने 19 मई 1904 को बिलासपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। अपने शैक्षणिक जीवन के वे अत्यंत ही प्रतिभाशाली छात्र रहे। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने शिक्षक बनना पसंद किया ताकि अच्छी शिक्षा देकर देश के लिए अच्छे नागरिक तैयार कर सकें। छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कवि मुकुंद कौशल, पतिराम साव जी के ही शिष्य थे। तिलक प्राथमिक शाला में उन्होंने मुकुंद कौशल को न केवल पढ़ाया था बल्कि उन्हें कविता करने की भी प्रेरणा दी थी। खादी की श्वेत धोती, श्वेत कुर्ता, सिर पर गाँधी टोपी और हाथ में एक छड़ी उनके व्यक्तित्व को विशेष बनाती थी। छत्तीसगढ़ के जनकवि कोदूराम “दलित” जी जब अपना गृह-ग्राम टिकरी (अर्जुन्दा) छोड़ कर दुर्ग में आये तब वे पचरी पारा में पतिराम साव जी के पड़ोस में रहने लगे थे इसीलिए दोनों में काफी घनिष्ठता रही।
जुझारूपन -
पतिराम साव जी बहुत जुझारू व्यक्ति थे | 1947 में स्वराज के बाद शिक्षक संघ के प्रांतीय आंदोलन में वे कूद पड़े तब उन्हें अन्य आंदोलनकारियों के साथ गिरफ्तार कर 15 दिनों के लिये नागपुर जेल में बंद रखा गया था। जेल से छूटने के बाद उन्हें प्रधानाध्यापक पद से ‘रिवर्ट’ कर दिया गया था।
“साहू संदेश पत्रिका”
पतिराम साव जी उस दौर में (1969 से 1968) जब शहर में प्रिंटिंग की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी, “साहू-संदेश” नामक पत्रिका निकाल कर समाज को जागरूक करते रहते थे। यह पत्रिका साहू समाज की गतिविधियों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि दुर्ग नगर के साहित्यकारों के लिए भी समर्पित थी। इस पत्रिका में न केवल कोदूराम “दलित”, दानेश्वर शर्मा, रघुवीर अग्रवाल “पथिक” जैसे श्रेष्ठ साहित्यकारों की रचनाएँ ही प्रकाशित होती थीं बल्कि कक्षा आठवीं के छात्र जैसे नवोदित कवियों की कविताओं को भी स्थान मिलता था। साहू संदेश में स्थानीय रचनाकारों को “समस्या पूर्ति” हेतु विषय दिया जाता था और प्राप्त रचनाओं को प्रकाशित भी किया जाता था। (साहू संदेश के कुछ महत्वपूर्ण पन्ने मेरे संकलन में हैं उनकी छाया प्रतियाँ भी संलग्न की गई हैं।)
साहित्यिक गतिविधियाँ -
पतिराम साव जी साहित्य विशारद थे। वे दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के एक प्रमुख आधार स्तंभ भी थे। उनके मार्गदर्शन में दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति ने अनेक ऊँचाइयाँ प्राप्त की थी। वे इस समिति में अध्यक्ष और मंत्री के पद पर भी लंबे समय तक रहे। दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति द्वारा 28 मई 1959 में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन के वे स्वागताध्यक्ष थे। द्वितीय अधिवेशन की अध्यक्षता उदय प्रसाद “उदय” जी ने की थी और उद्घाटनकर्ता डॉ. भवानी प्रसाद तिवारी थे। इसी परम्परा में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का चतुर्थ अधिवेशन पाटन में 23 अप्रैल 1961 को आयोजित किया गया था। इस अधिवेशन के उद्घाटनकर्ता डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र थे और अध्यक्षता पतिराम साव जी ने की थी। (1959 और 1961 में आयोजित अधिवेशन से संबंधित दस्तावेजों तथा पतिराम साव जी की कविताओं की छाया प्रतियाँ, मेरे संकलन से संलग्न हैं)
“समाज रत्न पतिराम साव सम्मान”
पतिराम साव जी जीवन-पर्यन्त साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहे। वे 05 अक्टूबर 1995 को इस नश्वर संसार से विदा हुए। उनके गोलोक गमन के बाद उनके परिजनों ने उनकी स्मृति में साहित्य, पर्यावरण, सामाजिक जैसे विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को “समाज रत्न पतिराम साव सम्मान” से सम्मानित करने की परम्परा शुरू की थी। गेंदलाल देशमुख, मुकुंद कौशल, परदेशी राम वर्मा, पुनुराम साहू, अशोक सिंघई, विद्या देवी साहू जैसी हस्तियाँ “समाज रत्न पतिराम साव सम्मान” से समानित हो चुकी हैं।
“पतिराम साव जी पर कुछ विद्वजन के विचार” -
एक सम्मान सम्मान समारोह में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रविशंकर विश्वfद्यालय, रायपुर के तत्कालीन कुलपति डॉ.शिवकुमार पाण्डेय ने कहा था - ‘पतिराम साव की समाजसेवा कोई जातिगत समाज सेवा नहीं थी, उन्होंने अपने समय में समाज के विभिन्न घटकों को जोड़ने और हमेशा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का कार्य किया था। समाजसेवा, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्रों में वे जहाँ भी सक्रिय रहे समाज के सभी लोगों को एक साथ लेकर चले। उनका यह प्रयास हमारे आज के समय की भी एक बड़ी जरुरत है।’
एक अन्य समारोह में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, कल्याण महाविद्यालय, भिलाई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.सुधीर शर्मा ने कहा था - “वह लेखक हमेशा जीवित रहता है जो अपने युग और समय पर हस्तक्षेप करता चलता है. पतिराम साव आज भी हमारे बीच जीवित हैं क्योंकि वे अपने समय के प्रति सतर्क थे. वे ‘साहू सन्देश’ के संपादकीय में अपने युग में हो रहे परिवर्तनों पर निरंतर हस्तक्षेप कर रहे थे. वे केवल कविता के ही नहीं हिंदी गद्य के भी सशक्त कलमकार थे. इसलिए हम आज भी उनके विचारों का स्मरण करते हैं और उनसे सीख ग्रहण करते हैं”।
“श्रद्धा-सुमन” -
जब मेरे पिता कोदूराम “दलित” जी पचरी पारा में रहते थे तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। जब पिताजी स्वयं के शिक्षक नगर दुर्ग स्थित मकान में आये तब पतिराम साव जी का हमारे घर में आना-जाना रहा। मैंने उन्हें देखा भी है और उनका आशीर्वाद भी पाया है। मैं ऐसी महान विभूति की पावन जयंती के अवसर पर अपनी और दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति की ओर से श्रद्धेय पतिराम साव जी को श्रद्धा-सुमन समर्पित करता हूँ।
आलेख - अरुणकुमार निगम, दुर्ग
(रंगीन चित्र गूगल से साभार, भवेत-श्याम चित्र मेरे संकलन से)


















