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Wednesday, April 18, 2012

“ सपन संजोते देखा ”



इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

बासंती  यौवन  क्यों   ‘ पतझर-राग ’ सुनाता
सावन  का  मौसम  –  अंतस में  आग जलाता
दीप   ढूँढता  है    -     कोई   अंधियारा   कोना
भ्रमर , कलि के आँचल पर क्यों  दाग लगाता

ऊषा  के  आंगन  -  सूरज को सोते देखा
इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

बुनकर सपने, “ हृदय – जुलाहा”  पीड़ा सहता
मरुथल - सी  सूखी  आँखों  से  झरना  बहता
समझाता  संतोष  –  न  देखो सपन गगन के
“ मेरी अभिलाषा अनंत “ –  यह मन है कहता

कुछ पाने की आस में सबकुछ खोते देखा
इस जग में जिसको भी देखा - रोते देखा
कारण सबका एक – सपन संजोते देखा.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

(ओबीओ महोत्सव में शामिल रचना)