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Saturday, May 4, 2013

झूठी संवेदना मत जताया करो


           
                 [चित्र गूगल से साभार]

झूठे  वादों  से   यूँ     लुभाया  करो
वादा कर ही लिया  तो निभाया करो |

अश्क़  हमने  हैं पहचाने, घड़ियाल  के
झूठी   संवेदना   मत   जताया  करो |

कीमती  है  जुबां , सोच कर खोलिए
बेवजह  ही  जुबां  ना  चलाया  करो |

चट्ठे - बट्ठे   सभी   एक  थैले  के   हो
कच्चे  चिट्ठे    खुल कर सुनाया करो |

दूध  के  हो धुले क्या , जरा सोच लो
तब कहीं जा के उंगली  उठाया करो |

अरुण कुमार निगम
आदित्यनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्ट्मेंट, विजय नगर,जबलपुर (म.प्र.)

Friday, May 3, 2013

मुझे प्यार मगर करती है








 (चित्र गूगल से साभार)
 ऐश इनकम  पे मेरी शामोसहर करती है
बैंक बैलेंस को पल भर में सिफर करती है ||

मैंने बाइक  भी  नहीं बदली कई सालों से
वो  हमेशा  यूँ  ही ए सी में सफर करती है ||

भाँप  के  उसके  इरादे   मैं  काँप जाता हूँ
जब मेरी ओर कभी तिरछी नज़र करती है ||

जानती है  कि  ये है मोम , पिघल जाएगा
झील-सी आँख तुरत अश्क़ से तर करती है ||

मेरी  हिंदी  तो जुबां से  न निकल पाती है
जब भी अंग्रेजी में  वो चटर-पटर करती है ||

शौक है खर्च का दौलत भी लुटाती है बहुत
खूब  लड़ती  है  मुझे प्यार मगर करती है ||

अरुण कुमार निगम
आदित्यनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

Wednesday, May 1, 2013

मजदूर दिवस – 1 मई पर...............



नहीं खुद को बसा पाये, सभी का घर बनाते हैं |
 
(चित्र गूगल से साभार)

कुदाली - फावड़ा लेकर , सृजन के गीत गाते हैं
नहीं है पास कुछ अपने  , मगर हम मुस्कुराते हैं |
जहाँ टपका है श्रम-सीकर,वहाँ जीवित हुये पत्थर
नहीं खुद को बसा पाये  , सभी का घर बनाते हैं |
नहीं है पास कुछ अपने  , मगर हम मुस्कुराते हैं ||

ये खानें औ खदानें हैं, ये कल औ कारखाने हैं
हमारे  दम से  चलते हैं   ,  इन्हें हम ही चलाते हैं |
सड़क  हमने  सजाई  है  ,  नहर  हमने बनाई है
नदी पर बाँध - पुल देखो,सभी के काम आते हैं |
नहीं है पास कुछ अपने , मगर हम मुस्कुराते हैं ||

जमाना  पेट भरता  है  ,  हमें  कब याद करता है
भुलाकर भूख को अपनी,फसल हम ही उगाते हैं |
सभी के घर यहाँ रोशन, ये दुनियाँ जगमगाती है
अंधेरा  पी  लिया  हमने  , उजाले  हम  ही लाते हैं |
नहीं है पास कुछ अपने  , मगर हम मुस्कुराते हैं ||

बिछाई  रेल की पटरी ,  किये टॉवर खड़े लाखों
मिटा कर दूरियाँ सबको , घड़ी भर में मिलाते हैं |
वो  सरकारी भवन देखो , या देखो ये दवाखाने
शहर घर गाँव बस्ती को , बड़े श्रम से सजाते हैं |
नहीं है पास कुछ अपने , मगर हम मुस्कुराते हैं ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

Tuesday, April 30, 2013

अनकहा पैगाम...


अनकहा पैगाम...

बहुरिया के हाथ कच्चा आम है
सास खुश है, अनकहा पैगाम है |

वो समझता ही नहीं संकेत को
क्या कहूँ वो पूरा झण्डू बाम है |

झुनझुने के शोर से चुप हो गया
आम इंसां का यही तो काम है |

काम धंधे से मिली फुरसत हमें
साँझ पूजा , सुबह प्राणायाम है |

छोड़ आए हम जमाने की फिकर
अब कहीं जाकर मिला आराम है  |

अरुण कुमार निगम
आदित्यनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)