ग़ज़ल
मुझे चाँदी न सोना चाहिए था
फकत सपना सलोना चाहिए था
अगर देना था भाषण मुफ़लिसी पे
तुम्हें कंकड़ पे सोना चाहिए था
सियासत में वो नफरत बो रहे हैं
जिन्हें बस प्यार बोना चाहिए था
लड़े होते भले ही जान जाती
नहीं घुट-घुट के रोना चाहिए था
अरुण क्यों बन्द कमरे में छुपे हो
तुम्हें महफ़िल में होना चाहिए था
मेरे अशआर ख़ारिज हो गए सब
मुझे आँसू पिरोना चाहिए था
पढ़े होते पलट कर चार पन्ने
किताबें ही न ढोना चाहिए था
हुई नाराज कूकर देखके माँ
उसे उसका भगोना चाहिए था
तुनक कर आइने को तोड़ डाला
"अरुण" ! चेहरे को धोना चाहिए था
अरुण कुमार निगम
दुर्ग, छत्तीसगढ़
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