Followers

Tuesday, November 15, 2011

अरुण अभी भी वक़्त है........

पंचतत्व निर्मित काया, अवयवों में मिल जाय
फिर क्यों न इन तत्वों को,रखा सुरक्षित जाय.

वृक्ष न काटो भाईयों , वन जीवन का मूल
इन बिन सारी सृष्टि ही , रेगीस्तानी धूल.

दूषित जल से किस तरह, जीव बुझाए प्यास
जल की रक्षा के लिए , करिए सभी प्रयास.

मान नहीं कीजे अगर , मृदा बाँझ हो जाय
नादानी में ही कहीं , सब कुछ ना खो जाय.

मत जहरीले धूम्र को  ,  तू  वायु में  डार
बिन वायु के किस तरह, बजें श्वाँस के तार.

अनुशासित जीवन जीयें  प्रकृति के अनुकूल
अरुण अभी भी वक़्त है , चलो सुधारें भूल.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
विजय नगर , जबलपुर ( मध्य प्रदेश )

Sunday, November 13, 2011

बाल-दिवस का पर्व मुझे भी मनाने दो.

बाल-दिवस पर यदि मैं भी सम्मानित होती
लेकर जाते तुम ही मुझको राज-भवन तक.
मेरे कारण नाम तुम्हारा चम-चम करता
हिंद भूमि से लेकर उन्नत नील गगन तक.

ऑफिस के मित्रों पर कितना रौब जमाते
और मुहल्ले में तुम कितनी धौंस जमाते.
तृतीय प्रहर का राग मधुवंती बिसराकर
सप्तम प्रहर सिर्फ राग मालकौंस सुनाते.

जन-सैलाब उमड़ता जब दिल्ली से आते
“मेरी बिटिया” कह अपना परिचय बतलाते
पता पूछते दूर गाँव से उस दिन पापा
सम्मानित करने को आते रिश्ते-नाते.

मुझे कोख में मार दिया है ,  भटक रही हूँ
कभी यहाँ और कभी वहाँ पर अटक रही हूँ.
पथराई आँखें ना रोई मुझे मार कर
क्या अब भी मैं इन आँखों में खटक रही हूँ ?

उस भाई की खातिर मेरा कत्ल हुआ है
जिसका अब तक दुनियाँ में अस्तित्व नहीं है.
निर्दयी माँ ! पात्र नहीं तू दया – क्षमा की
कोख रखी है पर तुझमें मातृत्व नहीं है.

अत्याचार हुआ है फिर भी माफ किया
मुझको भी अब इस दुनियाँ में आने दो.
मेरा भी मन कहता है खुल कर जीऊँ
बाल-दिवस का पर्व मुझे भी मनाने दो.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
विजय नगर , जबलपुर ( मध्य प्रदेश )

Friday, November 11, 2011

11-11-11


ग्यारह  है  दृष्टि- भरम ,  अंक  मूलत:  एक
हम सब भी तो एक हैं, सबका मालिक एक.

सौ  वर्षों  के  बाद  में , आती  यह  तारीख
कर्म  सदा  ऐसे  करें  ,   हों   वर्षों  तारीफ.

एक एक मिल कर बनी,, तिथि आज की खास
बड़ा विलक्षण दिख रहा ,  अंकों का अनुप्रास.

आज किसी सत्कर्म का , करें हृदय अभिषेक
दुष्कर्मों को त्याग कर  ,  काम करें बस नेक.

सात  रंग  तो  अंश हैं ,  मूल  एक  है  श्वेत
शक्तिवान  बन  जायेंगे , मिल  बैठें  समवेत.

एक  के  चक्कर में होवे  ,  निन्यान्बे का फेर
एक  की  शक्ति  परखने   में न करें अब देर.

नौ दो ग्यारह दु:ख हों ,  तीन  पाँच दें छोड़
रस्सी सम मजबूत हो, तिनका-तिनका जोड़.

लाख पच्चासी योनियाँ, काट मिली नर देह
पुण्य कर्म कर हृदय बसा प्रेम प्रीत और नेह.

माया तज औ कर पगले ,प्रभु संग नैना चार
ज्योतिर्मय  हो  जायेगा  ,  यह सारा संसार.

बावन पत्तों का महल , कभी ना आवे काम
श्रम से निर्मित झोपड़ा ,  ही  देगा  आराम.

एक -एक कर हो गए , ग्यारह  पद के छंद
अब तो आप बताइये  ,  आया कौन पसंद.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छतीसगढ़)
विजय नगर,जबलपुर (मध्य प्रदेश)

Saturday, November 5, 2011

जरूरी तो नहीं.........


हों मोहब्बत में सदा फेल, जरूरी तो नहीं
हमेशा हो दिलों का मेल, जरूरी तो नहीं.

रोशनी के लिए दिल को भी जलाना सीखो
हमेशा हो दिये में तेल, जरूरी तो नहीं.

जुल्फ की कैद, नज़र या जिगर के तहखाने
बुरी हमेशा लगे जेल , जरूरी तो नहीं.

पत्थरों, काँटों, शरारों से भी रिश्ता रखिए
सदा पटरी पे रहे रेल , जरूरी तो नहीं.

एक ही साथी बहुत है, अगर वो सच्चा है
लगाओ रिश्तों का महा-सेल, जरूरी तो नहीं.

मौन अभिव्यक्ति तेरी आँखों में पढ़ लेगा ‘अरुण’
सदा लिख करो “ ई- मेल “ , जरूरी तो नहीं.

कृपया यहाँ भी पधारें  ‌बेटी बचाओ अभियान (गीत – 3)

 


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छतीसगढ़)
विजय नगर,जबलपुर (मध्य प्रदेश)

Tuesday, November 1, 2011

अकविता...

उम्र भर की
दहकती
हुई आग में
हीरे सभी
जल गये.

हीरे !
जो रिश्ते थे
बंधन थे
आत्मीयता की किरणें
बिखरती थी
जब वो मेरे
पास आकर मुस्कुराते
और मैं हीरों को
पाकर
हो गया था
अमीर.

मगर एक दिन
स्वार्थ की ज्वाल में
हीरे
अचानक दहकने लगे

मैं बुझाता रहा
आँसुओं से उन्हें
उस गहन धूम्र में
इक धुँधलका उठा
मेरी आँखों को मुझसे
चुरा ले गया

इसी कशमकश में
मैं अंधा हुआ
मेरी दुनियाँ लुटी
रोशनी खो गई.
अपने हाथों से मैंने
टटोला मगर
उंगलियाँ सभी
आग में जल गई.

एक उमर भर दहकता
रहा तब कहीं
आग ठण्डी हुई
मैं अपाहिज हुआ.

मुझको हीरे सभी
राख बनकर मिले
अंधी आँखों में बस कर
रुलाते रहे.

हाँ ! मगर अब नहीं
इतना कमजोर कि
अपनी मजबूरी को लेकर
रोता फिरूँ.

ऐ मेरे दोस्त सुन
मैं परेशां नहीं
मैं हँसूंगा सदा
पागलों की तरह

और किसी दिन इसी
राख की गोद में
उतर आऊंगा
बादलों की तरह.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छतीसगढ़)
विजय नगर,जबलपुर (मध्य प्रदेश)

Saturday, October 22, 2011

दीपावली के शुभ अवसर पर.....


मनमीता
 
रंग-बिरंगे बाजारों में ,मत जाना ;बस छल बिकता है
झांझर,झूमर,चूड़ी,पायल, मायावी काजल बिकता है.

झूठी जगमग,झूठी ज्योति
नकली हीरे,नकली मोती
कागज के फूलों के गजरे
जिनमें खुशबू तनिक न होती.

माहुर,मेहंदी,टिकुली,बिंदिया
झुमका,बाला,कुमकुम डिबिया
सब बिकता है किंतु न बिकती
पल दो पल आँखों की निंदिया.

सब धन-दौलत की चाहत में, जाने क्या –क्या बेच रहे हैं
बंद  बोतलों में मनमीता , गंगा जी  का  जल बिकता है.

बाजूबंद, बिछिया, अंगूठी
करधनिया भी मिले अनूठी
बिना लाज श्रृंगार अगर हो
सारी चीजें लगती झूठी.

लज्जा ,प्रेम ,क्षमा ,मुस्कानें
बाजारों में बिके तो जाने
जो सच्चे गहने पहचाने
वह क्यों छाने व्यर्थ दुकानें.

सब धन-दौलत के व्यापारी , जाने क्या-क्या बेच रहे हैं
मंदिर परिसर में मनमीता, तुलसी-दल, श्रीफल बिकता है.



अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छतीसगढ़)
विजय नगर,जबलपुर (मध्य प्रदेश)