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Saturday, March 17, 2012

कल किये थे हाथ पीले .......


(ओबीओ महाउत्सव में शामिल रचना)

जुड़ गया बिटिया का रिश्ता, दिन सजीले हो गये
नयन  कन्या दान करते ,  क्यों पनीले हो गये.

चहचहाती  चपल  चिड़िया , चंचला चुपचाप  है
यूँ बजी शहनाई  मन में ,  सुर  सुरीले हो गये.

नाज से पाला था जिसको , वो  पराई  हो  रही
माँ – पिता , परिवार के  सपने रंगीले  हो गये.

हैं  नहीं  आसान  राहें, आज  के  परिवेश  में
अब सजन - ससुराल के भी पथ कँटीले हो गये.

देख कर बेटी की हालत ,  नयन  गीले हो गये
कल किये थे हाथ पीले ,  आज  नीले  हो गये.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

Sunday, November 13, 2011

बाल-दिवस का पर्व मुझे भी मनाने दो.

बाल-दिवस पर यदि मैं भी सम्मानित होती
लेकर जाते तुम ही मुझको राज-भवन तक.
मेरे कारण नाम तुम्हारा चम-चम करता
हिंद भूमि से लेकर उन्नत नील गगन तक.

ऑफिस के मित्रों पर कितना रौब जमाते
और मुहल्ले में तुम कितनी धौंस जमाते.
तृतीय प्रहर का राग मधुवंती बिसराकर
सप्तम प्रहर सिर्फ राग मालकौंस सुनाते.

जन-सैलाब उमड़ता जब दिल्ली से आते
“मेरी बिटिया” कह अपना परिचय बतलाते
पता पूछते दूर गाँव से उस दिन पापा
सम्मानित करने को आते रिश्ते-नाते.

मुझे कोख में मार दिया है ,  भटक रही हूँ
कभी यहाँ और कभी वहाँ पर अटक रही हूँ.
पथराई आँखें ना रोई मुझे मार कर
क्या अब भी मैं इन आँखों में खटक रही हूँ ?

उस भाई की खातिर मेरा कत्ल हुआ है
जिसका अब तक दुनियाँ में अस्तित्व नहीं है.
निर्दयी माँ ! पात्र नहीं तू दया – क्षमा की
कोख रखी है पर तुझमें मातृत्व नहीं है.

अत्याचार हुआ है फिर भी माफ किया
मुझको भी अब इस दुनियाँ में आने दो.
मेरा भी मन कहता है खुल कर जीऊँ
बाल-दिवस का पर्व मुझे भी मनाने दो.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़ )
विजय नगर , जबलपुर ( मध्य प्रदेश )