गई दुपहरी साँझ हो गई
अब तो जाने दो भाई !
दूर गाँव में मेरा घर है
राह देख रही माई !
साथ तुम्हारे बहुत रहा
छल मिले, न छलिया बना हृदय
सरल-सहज था मेरा मन
मैंने समझा मेरा है तनय.
मृगतृष्णा पर विश्वास किया
वह मेरे हाथ नहीं आई........................
मेरे अपने अपने न बने
सच जीवन के सपने न बने
उपवन में फूल खिलाये थे
वे फूल मिले पर धूल सने
बस साथ चली है सुख-दु:ख में
मेरे ही तन की परछाई......................................
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)