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Wednesday, February 1, 2012

अब तो जाने दो भाई !


गई दुपहरी साँझ हो गई
अब तो जाने दो भाई !
दूर गाँव में मेरा घर है
राह देख रही माई !

साथ तुम्हारे बहुत रहा
छल मिले, न छलिया बना हृदय
सरल-सहज था मेरा मन
मैंने समझा मेरा है तनय.

मृगतृष्णा पर विश्वास किया
वह मेरे हाथ नहीं आई........................

मेरे अपने अपने न बने
सच जीवन के सपने न बने
उपवन में फूल खिलाये थे
वे फूल मिले पर धूल सने

बस साथ चली है सुख-दु:ख में
मेरे ही तन की परछाई......................................

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)