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Monday, January 23, 2023

"स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ी सुराजी काव्य और साहित्य का योगदान"

 "स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ी सुराजी काव्य और साहित्य का योगदान"


अंग्रेजों ने व्यापार करने के बहाने भारत की पुण्य धरा पर कदम रखे और अपने पैर पसारते गये। देश गुलाम हो गया। अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता गया और बढ़ता ही गया। जब अत्याचार अति की सीमा को लाँघने लगता है तब क्रांति का उदय होता है, विद्रोह जन्म लेने लगता है। भारत के अनेक अंचलों से विद्रोह की चिंगारी विराट रूप धारण करने लगी। 


छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहा। वर्ष 1818 में बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में गैंद सिंह के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। वर्ष 1857 से छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हो गयी थी । सोनखान के जमींदार वीरनारायण सिंह ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया था। तत्पश्चात अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने प्राणों को हथेली में रख कर इस महासमर में कूद गए थे। 


वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने पर ब्रिटेन ने भारत की मर्जी के खिलाफ भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय कांग्रेस के नेताओं से बिना पूछे भारत को जर्मनी के खिलाफ युद्ध में झोंक दिया था। गाँधी जी ने इसका विरोध किया था और घोषणा कर दी कि हम इस युद्ध में ब्रिटेन का साथ नहीं देंगे। उन्होंने देश को यह नारा दिया था - 


ब्रिटिश युद्ध प्रयत्न में, जन-धन देना भूल है।

सफल युद्ध अवरोध वर, सत्य अहिंसा मूल है।


छत्तीसगढ़ के स्वभाव में कभी भी आक्रामकता नहीं रही। छत्तीसगढ़ की जनता पर गाँधी जी का बहुत अधिक प्रभाव रहा है। यहाँ की शांति-प्रिय जनता सत्य और अहिंसा को अपनाती रही है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सत्याग्रह करते हुए जेल जाते रहे। स्वतंत्रता के आंदोलन में छत्तीसगढ़ के कलम के सिपाही तमाम साहित्यकार भी कूद गए। कलम ही उनकी तलवार थी। जन-जागरण के गीत रचे गए। राष्ट्रीय भावना जागृत करने के लिए नाटकों का मंचन होने लगा। अक्षर-अक्षर चिंगारी बनकर ब्रिटिश शासन का विरोध करने लगे। 


छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य में सन् 1501 से सन् 1900 तक का काल "भक्तिकाल" था अतः इस अवधि का सुराजी साहित्य उपलब्ध नहीं हो पाता। छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य का आधुनिक काल सन् 1901 से माना गया है जिसे तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है।

शैशव काल (सन 1901-1925 तक) - इस काल में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. सुंदरलाल शर्मा ने अनेक आंदोलनों पर छत्तीसगढ़ी भाषा में काव्य रचनाएँ कीं। 


शैशव काल के साहित्यकार पं. लोचन प्रसाद पांडे ने साम्प्रदायिक सौहार्द्रता स्थापित करने का आग्रह करते हुए स्वराज लेंगे का नारा बुलंद किया था - 


हिन्दू तुरुक एक हो, कुच्छु करा बिचार गा।

दुख झन भोगा रात दिन, करा देश उद्धार गा।।  


अपन भुजा के बल मं रह के, सब स्वतंत्र हो जावा गा।

हक्क न अपन जान दा सोझे, "स्वराज लेंगे" गावा गा।।


अब जो करिहा सुना तुंहर सब, धरम-करम बच जाही गा।

भारत मालामाल होय दुख-दारिद पास न आही गा।।

(लोचन प्रसाद पांडे)


कवि गिरिवरदास वैष्णव जी सामाजिक क्रांतिकारी कवि थे। अंग्रेजों के शासन के खिलाफ लिखते थे -

उनका प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह "छत्तीसगढ़ी सुराज" के नाम से प्रकाशित हुआ था। उनकी कविताओं में समाज की झलकियाँ मिलती है। समाज के अंधविश्वास, जातिगत ऊँच-नीच, छुआछूत, सामंत प्रथा इत्यादि के विरोध में लिखते थे।


अंगरेजवन मन हमला ठगके

हमर देस मा राज कर् या।

हम कइसे नालायक बेटा

उंखरे आ मान कर् या।

(कवि गिरिवरदास वैष्णव) 


(ब) विकास काल - (सन् 1926 से सन् 1950 तक)


आज हम स्वतंत्र हैं। सार्वजनिक रूप से कुछ भी कह लेते हैं, लिख लेते हैं लेकिन स्वतंत्रता के पहले ब्रिटिश शासनकाल में देशप्रेम की बातें करना या देशभक्ति पर कुछ लिखना दंडनीय अपराध हुआ करता था। वन्देमातारम् , जय हिन्द जैसे नारे लगाने पर गोलियाँ चल जाती थीं, लाठियाँ बरस जाती थीं। जेलों में ठूँस दिया जाता था। ऐसे कठिन काल में साहित्यकारों ने जो कुछ भी लिखा वह उनके अदम्य साहस का परिचायक है। 


इस काल में गाँधीवादी विचारधारा के कवियों तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने ही देश की आजादी पर रचनाएँ रचीं। गाँधीवादी विचारधारा के कवि कोदूराम "दलित" हिन्दी और छत्तीसगढ़ी भाषा पर समान अधिकार रखते थे। वे पक्के गाँधीवादी थे। छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य में स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध में उन्होंने ही सर्वाधिक कविताएँ लिखीं। 


वे प्राथमिक शाला के अध्यापक थे। वे अपने विद्यार्थियों की टोली लेकर गाँव-गाँव में जाते थे और राउत दोहों के माध्यम से देशभक्ति की भावना जगाया करते थे। 

राऊत नाचा के दोहे -


सत्य-अहिंसा के राम-बान

गाँधी जी मारिस तान-तान।


हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै आसमान रे
येकर शान रखे खातिर हम देबो अपन परान रे

हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै आसमान रे
चलो चलो संगी हम गाबो ,जन गण मन के गान रे


होले गीत


गाँधी के गुन गाबो, लाल

गाँधी के गुन गाबो, अरे भइया हो

गाँधी के गुन गाबो लाल

देस आजाद कराबो लाल….

देस आजाद कराबो, अरे भइया हो

गाँधी के गुन गाबो लाल


परदेशी गोरा आइन हें

भूरी चांटी-जस छाइन हें

उन्हला मार भगाबो, लाल

उन्हला मार भगाबो, अरे भइया हो

गाँधी के गुन गाबो, लाल



सत्याग्रह - 

अब हम सत्याग्रह करबो

कसो कसौटी-मा अउ देखो

हम्मन खरा उतरबो

अब हम सत्याग्रह करबो.


चलो जेल सँगवारी - 

बड़  सिधवा बेपारी बन के, हमर  देश  मा  आइस
हमर-तुम्हर मा फूट डार के, राज-पाट हथियाइस
अब सब झन मन जानिन कि ये आय  लुटेरा भारी
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी।

कतको झिन मन चल देइन अब, आइस हमरो बारी।।


स्वतंत्रता के आंदोलन के साथ ही साथ अंग्रेजों के दमनकारी नियमों के खिलाफ अनेक आंदोलन और सत्याग्रह भी होते रहे। उन्हीं में से एक आंदोलन "स्वदेशी आंदोलन" था जिसमें विदेशी वस्त्रों की होली जलायी गयी । तकली, चरखा और हथकरघा के बने खादी के वस्त्रों अपनाने का संकल्प लिया गया। 


कवित्त

सूत कातिहौं वो दाई, महूँ गाँधी बबा साहीं

ले दे मोर बर पोनी चरखा अउ तकली

हाथ करघा मा बुनवाहूँ मैं सुग्घर खादी

बार देहूँ होले-मा बिदेसी वस्त्र नकली


खादी के वस्त्र न केवल अंग्रेजों की अर्थ-व्यवस्था पर प्रहार थे बल्कि रोजगार का सशक्त माध्यम भी बने। गरीब से गरीब परिवार भी तकली और पोनी का प्रयोग कर सकता था 


तकली

सूत कातबो भइया आव

अपन-अपन तकली ले लाव

भूलो  मत  बापू के बात

करो कताई तुम दिन-रात

छोड़ो आलस कातो सूत

भगिही बेकारी के भूत।।


दलित जी की रचनाओं में आजादी के विभिन्न आयाम मिलते हैं, इसीलिए तो कहा जाता है कि जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। अंग्रेजों की सेना में भारतीय सिपाही भी थे। दलित जी ने उनकी अंतरात्मा को जगाने के लिए भी कविताएँ लिखीं।


सिपाही से -

हम ला झन मार सिपाही, हम ला झन मार सिपाही

एक्के महतारी के हम-तैं पूत आन रे भाई

हम ला झन मार सिपाही


लड़त हवन हन हम्मन सुराज लाने बर खूब लड़ाई

हवन पुजारी सत्य-अहिंसा के बापू जी साहीं

सत्याग्रही हमन चिटको गोरा ला नहीं डराईं

हम ला झन मार सिपाही


उन्होंने आजादी-आंदोलन के सिपाहियों के जोश को बढ़ाने के लिए लिखा - 


वीर सिपाही - 

हम वीर सिपाही अउ प्रताप के वंशज मन

का हुँड़रा कोल्हिया मन ला घलो डराबो जी ?

का इनकर डर मा हम घर मा खुसरे रहिबो?

अउ अपन देश के अउ नुकसान कराबो जी ?


अब तो हम ठाने हन इनकर सँग जूझे के

धरके बन्दूक सबो चेलिक मन जाबो जी

अउ कुदा-कुदा के अउहा-तउहा लगे हाँत

इन बँड़वा हुँड़रा मन ला मार गिराबो जी।


जनकवि कोदूराम "दलित" ने आजादी के बाद भी नव-सृजन के अनेक गीत लिखे। कविता के माध्यम से उन्होंने गाँधी जी का आभार भी प्रकट किया - 


धन्य बबा गाँधी! -

कर-कर के सत्याग्रह गोरा-शासन ला झकझोरे
तोर प्रताप देख के चर्चिल, रहिगे दाँत निपोरे
चरखा-तकली चला-चला के, खद्दर पहिने ओढ़े
धन्य बबा गाँधी! सुराज ला लेये तब्भे छोड़े।


दलित जी ने छत्तीसगढ़ी भाषा में जितनी सशक्त रचनाएँ लिखीं, उतनी ही सशक्त रचनाएँ उन्होंने हिन्दी में भी लिखीं - 


पहनो केसरिया बाना 

बढ़ो बढ़ो ए भारत वीरों ऋषियों की प्यारी संतान स्वतंत्रता के महासमर में हो जाओ सहर्ष बलिदान।

धर्म-युद्ध में मरना भी है अमर स्वर्ग-पद को पाना रणभेरी बज चुकी वीरवर पहनो केसरिया बाना।।


वीर सैनिक 

भारत के वीर पुत्र हम सब सैनिक बन जाएंगे 

अब दुखिया भारत माता के सब कष्ट मिटाएंगे।।


हम चरखा रूपी चक्र सुदर्शन फेरा करते हैं 

रण-क्षेत्र में निर्भय दुश्मन को घेरा करते हैं 

इसके जरिए हम बैरियो का गला उड़ाएंगे

अब दुखिया भारत माता के सब कष्ट मिटाएंगे।।


रहे न कोई भूखा-नंगा

कहा सयानों ने सच ही है, आजादी से जीना अच्छा।

किंतु गुलामी में जिंदा रहने से मर जाना है अच्छा।।


(कवि कोदूराम "दलित")


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्रांतिकारी कवि कुंज बिहारी चौबे जब स्टेट हाई स्कूल राजनाँदगाँव में कक्षा चौथी में थे तब किसी अंग्रेज अधिकारी के शाला निरिक्षण के समय कक्षा के मॉनिटर के द्वारा अधिकारी का स्वागत गाड सेव द् एंथम के साथ सेल्यूट के साथ किया जाता था, जब अंग्रेज अधिकारी को सम्मान करने की बारी मॉनिटर होने की वजह से उन्हें करनी पड़ी तो वे वंदें मातरम कह उनके अभिवादन किये, जिससे सब हतप्रभ हो अंग्रेज अधिकारी के क्रोध का शिकार होना पड़ा फिर भी वे "वंदेमातरम" बोलते रहे। जब वे कक्षा आठवीं पहुचे तब उन्होंने शाला में फहराते यूनियन जेक को उतार के तिरंगा फहरा दिया था। दूसरे दिन सुबह प्रिंसिपल का ध्यान लहराते तिरंगे की ओर गया तब उन्होंने छात्रों की पिटाई करते हुए पूछताछ की कि किसने तिरंगा फहराया है ? तब निडरता से कुंज बिहारी चौबे ने कहा कि मेरे बेकसूर साथियों को आप क्यों मार रहे हैं? जो दण्ड देना चाहते हैं, मुझे दीजिए। तिरंगा मैंने ही फहराया है। बेंत से उनकी बेदाम पिटाई की गयी पर वे वंदेमातरम और महात्मा गांधी की जय के नारे लगाते रहे, उनका साथ सभी छात्रों ने दिया। इस प्रकरण में उन्हें स्कूल से निष्कासित कर राजनाँदगाँव विरासत की सीमा से बेदखल होने की सजा मिली। कुंजबिहारी लाल के समर्थन में छात्रों ने स्कूल आना बंद कर दिया तब तत्कालीन राजनाँदगाँव विरासत के राजा के द्वारा कुंज बिहारी चौबे  के निष्कासन को रद्द करना पड़ा।


क्रांतिकारी कवि कुंजबिहारी लाल चौबे की कविता देखिए - 


आँखी मा हमर धुर्रा झोंक दिये, 

मुड़ी मा थोप दिये मोहनी।

अरे बैरी जानेन तोला हितवा ,

गँवायेन हम दूनों, दूध-दोहनी।।

पीठ ला नहीं तैंहर पेट ला मारके, 

करे जी पहिली बोहनी।

फेर हाड़ा गोड़ा ला हमर टोरे,

फोरे हमर माड़ी कोहनी।

गरीब मन के हित करत हौं कहिके,

दुनियॉं मा पीटे ढिंढोरा ।

तैं हर ठग डारे हमला रे गोरा।।


कुंज बिहारी चौबे जी की एक और कविता जो बहुत मशहूर हुई है - 

अजी अंग्रेज ! तंय हमला बनाए कंगला 

सात समुंदर विलायत ले आके 

हमला बना देहे भिखारी जी ।  

हमला नचाए तैं बेंदरा बरोबर 

बन गए तैं मदारी जी।

चीथ चीथ के तंय हमर चेथी के मांस ला 

अपन बर तैंहर टेकाये बंगला….

चिथरा पहिरथन, कथरी ला दसाथन

पेज-पसिया पी के अघाथन जी

चिरहा कमरा अउ टुटहा खुमरी मा

घिलर-घिलर के कमाथन जी।

हमरे रकत ला चुहक के रे गोरा!, 

लाल करे अपन अंग ला……...


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार हरि ठाकुर ने भी अपने विद्यार्थी जीवन में रायपुर के सेंटपॉल स्कूल में अपने साथी रामकृष्ण गुप्ता के साथ अगस्त 1942 में तिरंगा फहरा दिया था। उन्होंने सितंबर 1942 में चर्चिल के पुतले का भी दहन कर दिया था इसीलिए उनके साहित्य में भी आजादी की ऊष्मा अलग से महसूस की जा सकती है। 


बनिया बन आइन अंगरेज। मेटिन धरम, नेम, परहेज।।

देस हमर सुख के सागर। बनिस पाप-दुख के गागर।।


करिन फिरंगी छल-बल-कल। फूट डार के करिन निबल।।

बढ़िन फिरंगी पाँव पसार। हमरे खा के देइन डकार।।


करिन देस के सत्यानास। भारत माता भइस उदास।।

करिन फिरंगी अत्याचार। मचिस देस में हाहाकार।।

(कवि हरि ठाकुर)


स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार केयूर भूषण ने छत्तीसगढ़ की जनता को जगाते हुए कहा - 


रहे समुंदर के पार, करे सोरा सिंगार 

धरे एटमी हथियार, करे दुनिया बिहार 

जेकर मानुष के अहार, हवै सोना के बैपार 

चिटिक जागव जी उन ला चीन्हव जी। 

(साहित्यकार केयूर भूषण)


कवि प्यारेलाल गुप्त की कविता में उस दौर में भारतीय जनता की भावनाएँ परिलक्षित होती हैं कि किस तरह से लोग देश-हित में धन, स्वर्ण, गहने ही नहीं बल्कि अपना रक्त-दान करने के लिए भी बड़ी ही उदारता के साथ उमड़ पड़े थे। उनकी एक मार्मिक रचना - 


माँ! ये कानन के झुमका लाके मैं दे दिहों

माँ! जम्मो जोरे रुपैया महूँ दे दिहों

माँ! कोष भारत के रक्षा के खुले हे जिहाँ

सारी बस्ती के मनखे जुरे हे जिहाँ

लहू दिए बर झगरथें जिहाँ

नोट-सोना अउ गहना बरसथे जिहाँ।

माँ! ये सोनहा कड़ा तहूँ चलके दे

जउन दुश्मन के छाती के गोली बने।

(कवि प्यारेलाल गुप्त)


कवि द्वारिकाप्रसाद तिवारी "विप्र" ने बहनों से आह्वान किया था कि वे अपने बच्चों को देश प्रेम के गीत सुनाएँ, उन्हें वीर बनाएँ ताकि बच्चों के मुख से जय-हिंद का नारा सहज ही निकल पड़े - 


अब सुनिहा दीदी हमर एकठन गोठ ओ

अब आए हे घड़ी अलवर पोठ ओ 

लइकन ला अब वीर बनावा 

रोज सुदेसी गीत सुनावा

अब जैहिंद कहत मा उघरै 

सब लइकन के ओंठ ओ।

अब सुनिहा दीदी हमर एकठन गोठ ओ।।

(कवि द्वारिकाप्रसाद तिवारी "विप्र")


असहयोग आंदोलन के दिनों में कवि बद्री विशाल परमानंद के क्रांतिकारी भजन, विभिन्न पार्टियों में गाये जाते थे। उनके खुद के नाम से अलग-अलग स्थानों पर लगभग 80 भजन-मंडलियाँ हुआ करती थीं - 


चण्डिके जगदम्बे ज्वाला,

भारत की रखना लाज

हम उमड़ पड़े हैं आज

बचाने लाज हिन्द माता की

तेरे सजे सिपाही केसरिया बाना की

(कवि बद्री विशाल परमानंद)


कवि लाला फूलचंद श्रीवास्तव ने मुहावरों का प्रयोग करते हुए अंग्रेजों की क्रूरता का वर्णन किया था - 


माँस लहू ल अंग्रेज पी दिन, हाड़ा रहिगे साँचा।

बाघ के गारा बइला बँधाये, कंस ममा घर भाँचा।।

सत अहिंसा बीज गँवाके, गोली मार गिराइन

पाप के खातिर गुड नठागे, भूत अइसन बौराइन।।

(कवि लाला फूलचंद श्रीवास्तव)


कवि दशरथ लाल निषाद ने शहीद वीर नारायण सिंह की शौर्य गाथा सुनाकर सभी को जगाने का प्रयास किया - 


अपन जम्मो धन बांट के, वीर नारायण कहै ललकार  

सेवा भाव के ढोंग मढ़ा के, अंग्रेज होगिन हें मक्कार।

जागव जागव गा सबो लइकन अउ सियान ....। 

(कवि दशरथ लाल निषाद)


कवि पुरुषोत्तम लाल ने अपनी मातृभूमि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उसे गुलामी के बंधनों से मुक्त कराने का संकल्प लिया - 


अइसन हमला पोसें पाले ओइसन आबो एक दिन काम बंधन ले मुक्ता के तुम ला , करबो कोटि कोटि परनाम । 

(कवि पुरुषोत्तम लाल)


कवि शेषनाथ शर्मा 'शील' अपनी हिन्दी की कविताओं से जन जागरण करते रहे - 

बाजुएं शिथिल हुईं 

कि हन्त धर्म सो गया ? 

या कि आर्य महाप्राण 

प्राणहीन हो गया ? 

देश को करो प्रबुद्ध, प्राण बाँटते चलो .

तुम बढ़ो बढ़े चलो ....।

(कवि शेषनाथ शर्मा 'शील')


छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के अलावा अनेक आंचलिक भाषाओं के साहित्यकारों ने भी आजादी के आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था - 


मुरिया पाटा गीत


इरखा बइर कुवर नहीं

मारा पेटा कियर नहीं

मया प्रेम से रहू माता

तुचो जय-जय माता,तुचो जय-जय माता।

देश काजे जिउक सीखूँ, देश काजे मरुक सीखूँ

तुचो जय-जय गाऊँ माता

भारत माता, भारत माता

तुचो जय-जय गाऊँ माता

(कवि - अज्ञात)


कवि ठाकुर पूरन सिंह ने हल्बी में गीत गाकर स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगायी थी - 


स्वतंत्र रलो अमचो भारत

एक हजार बरस आगे, हरिक पदिम देश ये रलो

तेलेबे कहानी जागे

सत धरम ले तोर लता, रजो धरम चो छाप

सरगुन ने गोटी धान ने, पोल निकरते रला पाप।


(कवि ठाकुर पूरन सिंह)


गोंड़ी कविता

हम भारत के गोंड़ बइगा, भारत ले रे

हम भैया छाती अड़ाबो

हम तो खून बहाबो, भारत ख्यार।

अंगरेजन ला मार भगाबोन भारत ले रे।

हम भारत के भाई-बहिनी मिलके करबो रक्षा

अंगरेजन ला मार भगाबोन

करबो अपन रक्षा भैया, भारत ख्यार।

हम भारत के गोंड़ बइगा, 

कर देबो जान निछावर भैया,भारत ख्यार।

अंगरेजन ला मार भगाबोन भारत ले रे।

(कवि - अज्ञात)


आजादी आंदोलन के दौरान जन-जागरण हेतु अनेक पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता रहा है। मुख्य पत्र-पत्रिकाओं के नाम निम्नानुसार हैं - 

1900 में छत्तीसगढ़ मित्र, हिन्द केशरी, स्वदेशी आंदोलन और बायकॉट (माधवराव सप्रे)

1908 - राष्ट्रबन्धु (ठाकुर प्यारेलाल)

1915-सूर्योदय (कन्हैया लाल शर्मा)

1921-अरुणोदय (ठाकुर प्यारे लाल)

1935-उत्थान (रविशंकर शुक्ल)


आजादी आंदोलन से संबंधित साहित्य प्रकाशन -

कोदूराम "दलित" - हमर देश (पाण्डुलिपि)

द्वारिकाप्रसाद तिवारी विप्र - गाँधी गीत, सुराजी गीत

गिरिवरदास वैष्णव - छत्तीसगढ़ी सुराज (1930)

पं. रामदयाल तिवारी - गाँधी मीमांसा

खूबचन्द बघेल - ऊँच-नीच (नाटक)

केयूर भूषण - नागपुर जेल में


इस प्रकार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में छत्तीसगढ़ी सुराजी काव्य और साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 


आलेख - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)

संपर्क - 9907174334

Wednesday, April 13, 2022

नव-गीत

 विधा पुरानी बात नयी.....


"विष्णुपद छन्द आधारित गीत"


मनगढ़ंत आँकड़े दिखा कर, हरदम रास करें।

रात-दिवस चैनल पर आकर, बस बकवास करें।।


भोली जनता गोटी जैसी, चौसर देश हुआ।

प्यादों के मरने पर उनको, तनिक न क्लेश हुआ।।

मांस नोचते गिद्धों पर हम, क्यों विश्वास करें?


निर्वासित हो गयी नौकरी, डिग्री चीख रही।

मजबूरों के हिस्से में, राशन की भीख रही।।

सेवक जब स्वामी बन बैठे, किससे आस करें?


अरुण कुमार निगम

Wednesday, March 9, 2022

डॉ. विद्यावती मालविका

 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर……



दुर्ग जिले की सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार - डॉ. विद्यावती 'मालविका'


दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के चतुर्थ अधिवेशन, पाटन के अध्यक्ष श्री पतिराम साव "विशारद" के अभिभाषण दिनांक 23 अप्रैल 1961 के एक अंश में "नारी समाज और साहित्य चेतना" शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है -


"हर्ष की बात है कि अपने दुर्ग जिले में श्रीमती मनोरमा पाटणकर और श्रीमती सुधा राजपूत कविता लिखती हैं तथा कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं। महिला समाज को साहित्य क्षेत्र में उतरने का नेतृत्व प्राप्त है। "श्रीमती विद्यावती मालविका" भी दुर्ग जिले की हैं, उन्होंने अपनी कम अवस्था में ही अनेक पुस्तकें लिखी हैं। आप श्री पीलालाल चिनौरिया की सुपुत्री हैं।"


इसी प्रकार दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन 

पंचम अधिवेशन, बालोद के अध्यक्ष श्री दानेश्वर शर्मा ने अपने भाषण गुरुवार दिनांक 21 जून 1962 में "हमारे गौरव" शीर्षक के अन्तर्गत कहा था - 


श्री पीला लाल चिनौरिया (संत श्यामा चरण सिंह ), शिशुपाल सिंह यादव उदय प्रसाद "उदय" व पतिराम साव ने तो दुर्ग में साहित्य की ज्योति ही जलाई है।


इसी भाषण में "जगमगाते नक्षत्र "शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है - 


श्रीमती मनोरमा पाटणकर, विद्यावती मालविका तथा विद्यावती खंडेलवाल इस जिले की महिला साहित्यकार हैं जिन्होंने अच्छी रचनाओं का सृजन किया है।


विशेष उल्लेखनीय है कि जनकवि कोदूराम "दलित" के शिक्षा गुरु तथा काव्य गुरु सन्त श्यामाचरण सिंह उर्फ श्री पीलालाल चिनौरिया जी थे।


श्री श्यामाचरण सिंह उर्फ पीलालाल चिनौरिया का विवाह सुमित्रा देवी "अमोला" से सन् 1925 में हुआ था। वे उन दिनों भिलाई, छत्तीसगढ़ में प्रधान-अध्यापक हुआ करते थे। उसी वर्ष उनका स्थानांतरण अर्जुन्दा में हुआ था। 13 मार्च सन् 1928 में विद्यावती मालविका का जन्म हुआ। श्री श्यामाचरण सिंह जी अध्यापक होने के साथ-साथ आशुकवि, एक उत्कृष्ट साहित्यकार, समाज सुधारक एवं गाँधीवादी विचारधारा के थे। विद्यावती की माता श्रीमती सुमित्रा देवी "अमोला" भी विदुषी महिला थीं। वे गृहणी होने के साथ भक्तिभाव की रचनाएँ लिखती थीं। विद्यावती ‘मालविका’ जी को अपने पिता श्यामाचरण सिंह एवं माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘अमोला’ से साहित्यिक संस्कार मिले थे। उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु अर्थात चालीस के दशक से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था।


शालेय शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने साहित्य रत्न तथा एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। तत्पश्चात "हिन्दी सन्त-साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" विषय में आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था।


वे 1944 में धरमजयगढ़ (छत्तीसगढ़) में अध्यापिका बनीं।

1945 में  बौद्ध धर्म संबंधित उनकी पहली रचना "धर्मदूत" में प्रकाशित हुई थी।


विद्यावती मालविका जी अपने समय की ख्यातिलब्ध लेखिका एवं कवयित्री रही हैं। उन्होंने अनेक कृतियों का सृजन किया है। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं - 


कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह), 

श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), 

आदर्श बौद्ध महिलाएँ, भगवान बुद्ध (जीवनी), 

बौद्ध कलाकृतियाँ (पुरातत्व), 

सौंदर्य एवं साधिकाएँ (निबन्ध संग्रह), 

अर्चना (एकांकी संग्रह), 

मध्य युगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ - एक युगांतरकारी व्यक्तित्व (शोध प्रबंध) आदि। 


उनकी कुछ किताबों का अनुवाद बर्मी, नेपाली, नेवारी, मराठी और गुजराती भाषाओं में भी हुआ है। 


फैजाबाद से प्रकाशित साप्ताहिक "मानव जीवन", जोधपुर से प्रकाशित मासिक "राजपूत संदेश", प्रयाग से प्रकाशित "दीदी" की आप सह-संपादक भी रह चुकी हैं।

 

विद्यावती मालविका जी कुशल चित्रकार भी थीं। उनके चित्र धर्मदूत,त्रिपथगा, भारत, हिंदुस्तान जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हुआ करते थे।


"आदर्श बौद्ध महिलाएँ" पुस्तक में बुद्धकाल से वर्तमान तक की विश्व प्रसिद्ध बौद्ध महिलाओं का जीवन चरित्र है। यह किताब उत्तरप्रदेश शासन से पुरस्कृत है तथा इसका अनुवाद बर्मी और नेपाली भाषाओं में हुआ है। 


"अर्चना" जो पंद्रह एकांकी व रूपकों का संग्रह है, को सन् 1957 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित साहित्य प्रतियोगिता में पुरस्कृत किया गया था।


"नारी-हृदय"  किताब में नारियों में नव-चेतना जगाने वाली तीस भावपूर्ण कहानियों का संकलन है।


"सौंदर्य और साधिकाएँ" किताब में नारी सौंदर्य तथा उनके श्रृंगार-प्रसाधनों के वर्णन के साथ-साथ कुछ महान नारियों का भी परिचय दिया गया है। 


"श्रद्धा के फूल" में धर्म-रस से भरी ओजस्विनी, स्फूर्तिदायक तथा भावपूर्ण नौ कहानियों का संकलन है। 


"बुद्ध अर्चना" में बौद्ध धर्म से संबंधित पंद्रह भावपूर्ण गीतों का संकलन है। विद्यावती मालविका जी ने वन, सरिता, पूर्णिमा आदि से भी बुद्ध गुणों को सुनने और जानने की आदर्श कल्पनाएँ की हैं। "उरुवेला" के वन-प्रान्तर में भी उन्हें तथागत की करुणा का ही मधुर राग सुनायी देता है - 


नभ में फैला स्वर्णिम पराग, 

ओ उरुवेला फिर जाग-जाग।।


हो चुका अरुण ऊषा अंचल, 

विहगों ने भी गाया मंगल

प्रतिध्वनित हो उठा कोलाहल, 

वन सरिता का छलछल, कलकल


जनहित के मृदु-मृदु भाव त्याग, 

तुम अब भी सोये ले विराग।।


कोमल कलिकाएँ नृत्य निरत

है रश्मि-रश्मि भी शोक विरत

परिमल पराग ले कण शत-शत

वन-लक्ष्मी सजती आज सतत।


गौतम करुणा का मधुर राग

तुम आज सुना दो सानुराग।।


"बुद्ध चरितावली" में विद्यावती मालविका जी द्वारा बनाये गए भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित छप्पन चित्र हैं। प्रत्येक चित्र के नीचे उन्होंने गद्य व पद्य में चित्र का विवरण भी लिखा है जैसे कुशीनगर स्तूप के चित्र के नीचे उन्होंने लिखा है - 


कुशीनगर सौन्दर्यमयी है, नगरी परम सुहानी।

जहाँ रमणियाँ हंस चुगातीं, कहते भूत कहानी।।


"बौद्ध कलाकृतियाँ" में भारतीय बौद्ध कलाकृतियों पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। यह किताब इक्कीस परिच्छेदों में है। 


विद्यावती मालविका जी की कविताएँ, उनकी काव्य-प्रतिभा का साक्षात प्रमाण हैं।      

कविता संग्रह "पूर्णिमा" से कुछ पंक्तियाँ देखिए  -

 

चन्द्रकिरण से विहँस-विहँस कर,

उतरो ओ सजनी !

पूनम की रजनी!!


इसी किताब से कुछ और पंक्तियाँ - 


जब भी चाह रहा उसको 

व्याकुल होकर सचराचर

पीयूषवर्षी           वाणी 

कर दे जीवन-पथ मनहर


करुणा की शान्त लहरियाँ 

वितरें अविरल जल पल-पल।।


अब कविता संग्रह "कामना" से कुछ पंक्तियाँ देखिए - 


सदा अपरिचित रहो न ओ प्रिय! 

परिचित बनकर आओ।।


सूनी साँझ दीप आशा का, 

सिहर-सिहर राह जाता।

एक मधुर विश्वास हृदय का, 

स्नेह लुटाता जाता।।


सदा अलख बन रहा न ओ प्रिय! 

मनहर बनकर आओ।

तुम सपने बन रहो न तो प्रिय! 

अपने बनकर आओ।।

कविता संग्रह ‘कामना’ में प्रकृति को बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णित करती यह कविता प्रसाद-शैली का स्मरण कराती है -

समयचक्र चलता रहता है....

नीरव नीले अंबर में सखि, 

शुभ्र चंद्र मुस्काता है

सरिताओं के चंचल जल में 

नव-नव खेल रचाता है

फिर भी रजनी का आँसू

ओस बना पड़ता रहता है.....

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की कविताओं में मानवीय संवेगों की कोमल भावनाओं से ले कर वर्तमान की विषमताओं का चित्रण मिलता है। किसानों की पीड़ा और सूखे के संकट को बड़े ही सहज भाव से उन्होंने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है 

अब तो नभ में आओ बादल, 

धरती को नहला दो

प्यासी आँखें सूख चली हैं, 

बूँदों से सहला दो।


सूख रही है खेती, 

कृषक उदासे हैं

बंजर जीवन में, 

स्वप्न जरा से हैं

रिमझिम के स्वर से

अब तो बहला दो।।


हमने त्रुटियाँ की हैं, 

काटे पेड़ निरंतर

हमने ही तो मौसम में, 

लाया है अंतर

तुम दयालु हो, गलती तो झुठला दो।

उस युग में ग्लोबल वार्मिंग और जल संरक्षण पर उनकी ये पंक्तियाँ - 

तप रही धरती से, 

मानव क्यों नहीं है सीख लेता

सूखती नदियाँ, कुओं को

काश ! संरक्षण तो देता।

डॉ. विद्यावती मालविका जी को अनेक संस्थाओं ने सम्मानित किया जिनमें से कुछ प्रमुख सम्मान -

मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान 1957

उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान 1958

उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान 1959

मध्यप्रदेश शासन का कथासाहित्य सम्मान 1964

मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार 1966

नाट्यशोध संस्थान कोलकाता में एकांकी संग्रह अर्चना, संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है। 

नव नालंदा महाविहार, नालंदा, सम विश्वविद्यालय, बिहार के एम ए हिन्दी पाठ्यक्रम के चतुर्थ प्रश्नपत्र बौद्ध धर्म दर्शन तथा हिन्दी साहित्य के अंतर्गत "मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" ग्रंथ पढ़ाया जाता है। 

आकाशवाणी इन्दौर, उज्जैन, भोपाल, छतरपुर से उनके रेडियो नाटकों का धारावाहिक प्रसारित होता रहा है। 

विद्यावती मालविका जी छत्तीसगढ़ से जाने के पश्चात मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों में सेवारत रहीं। शासकीय सेवा से वे 1988 में सेवानिवृत्त हुई। विगत तीस वर्षों से वे सागर में रह रही थीं। 20 अप्रैल 2021 को 93 वर्ष की आयु में वे ब्रह्मलीन हो गयीं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश उनके साहित्यिक अवदानों को कभी भी भुला नहीं पायेगा। 

संकलन व आलेख - अरुण कुमार निगम

आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


संदर्भ / साभार : 

भिक्षु धर्मरक्षित, सारनाथ

डॉ. वर्षा सिंह सुपुत्री डॉ. विद्यावती मालविका, सागर

Wednesday, January 12, 2022

गजल : मुफ्त में बँटने लगी खैरात है

 *गजल 2122 2122 212*


जनवरी में हो रही बरसात है

रिन्द कहते हैं अहा! क्या बात है।


श्रीनगर जम्मू सरीखा हर नगर

दिन है कुल्लू-सा मनाली रात है।


गिर रहे ओले टपाटप चार सू

यह बुजुर्गों पर तो वज्राघात है।


वायरस ने भी परेशां कर दिया

त्रासदी की आ गई बारात है।


है चुनावों का समय तू लूट ले

मुफ्त में बँटने लगी खैरात है।


दोस्तों की महफिलें सजने लगीं 

मन थिरकता और पुलकित गात है।


चाय अदरक की 'अरुण' पीते हुए

कह रहे अपनी यही औकात है।


*अरुण कुमार निगम*

Sunday, January 9, 2022

"अवसर मिला भुनाना सीखो"

बेमतलब चिल्लाना सीखो

अवसर मिला भुनाना सीखो।


महँगे-महँगे वस्त्र पहन कर

इत्र लगा, इतराना सीखो।


तिकड़मबाजी बहुत जरूरी

किसको कहाँ फँसाना सीखो।


इसकी टोपी उसके सिर पर

हौले से पहनाना सीखो।


मूल समस्याओं से प्यारे

सबका ध्यान हटाना सीखो।


*अरुण कुमार निगम*