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Tuesday, July 8, 2014

गज़ल : सोच बदलेगी न जब तक.........



सोच बदलेगी न जब तक.........

संस्कारों की  कमी से , मनचले होते रहेंगे
कुछ न बदलेगा जहां में , हादसे होते रहेंगे.

दोष इसका दोष उसका मूल बातें गौण सारी
तालियाँ जब तक बजेंगी , चोंचले होते रहेंगे 

मौन धरने उग्र रैली , जल बुझेगी मोमबत्ती
आड़ में कुछ बाड़ में कुछ सामने होते रहेंगे
 
आबकारी  लाभकारी  लाडला सुत है कमाऊ
और  भी  तो  रास्ते हैं , फायदे होते रहेंगे 

ये गवाही वो गवाही, है बहुत ही चाल धीमी 
जानता है  हर दरिंदा  , फैसले होते रहेंगे

अश्क हैं घड़ियाल जैसे दाँत हाथी की तरह दो
रंग गिरगिट सा बदलते वो हरे होते रहेंगे 

ठोस दावे ठोस वादे, ढोल-सी आवाज इनकी
सोच बदलेगी न जब तक,खोखले होते रहेंगे

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, June 1, 2014

गज़ल............




आम पीर सहता क्यों, गुठलियाँ समझती हैं
संत - साधना   कैसी ,  वेदियाँ  समझती हैं 

लाल की जवानी का , जश्न  हो चुका काफी
खैर क्या मनाना अब, बकरियाँ  समझती हैं 

सास  आज स्वागत में, सौंपने लगी किस्मत
नव-वधू करेगी क्या , चाबियाँ  समझती हैं 

छुप-छुपा के आया है , पास अपनी दादी के
कौन खुश हुआ ज्यादा, कुल्फियाँ समझती हैं.

बात   संसकारों   की , फालतू  नहीं  होती
वक़्त  बीत  जाने  पे ,  पीढ़ियाँ समझती हैं 

कोठियाँ  उजालों में , क्यों उदास हैं इतनी
रात क्या हुआ होगा , खोलियाँ समझती हैं 

भीड़  है  हजारों  की ,  कौन-कौन सच्चा है
और  कौन  भाड़े  का , रैलियाँ समझती हैं 

ये  बिसात  के  खाने , चौंसठों  बराबर हैं
है  कहाँ  बसर करना, गोटियाँ समझती हैं 

देह से  न  काठी से , हो  सका  बड़ा कोई
हाथियों में दम कितना,चीटियाँ समझती हैं 

झूमते  शराबी  को , राह  कौन  दिखलाये
कौन पी रहा किसको,प्यालियाँ समझती हैं

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Thursday, May 15, 2014

स्वागतम सोलह मई........


सोलह की महिमा में सोलह पंक्तियाँ ...............

सोलह -सोलह लिये गोटियाँ,खेल चुके शतरंजी चाल
सोलह - मई बताने वाली ,किसने कैसा किया कमाल

सोलह कला सुसज्जित कान्हा ने छेड़ी बंसी की तान
सबका जीवन सफल बनाने,सिखलाया गीता का ज्ञान

मानव जीवन में पावनता , मर्यादा के हैं आधार
ऋषियों मुनियों के बतलाये, जीवन में सोलह संस्कार

सोलह - सोमवार व्रत करके , पाओ मनचाहा भरतार
सोलह आने जब मिल जाते, तब लेता रुपिया आकार

उम्र शुरू हो सोलह की तो , आता अपने आप निखार
बीत गई तब जीवन भर के , साथी हैं सोलह श्रृंगार

सोलह चंद्र - कलायें होतीं, तब दुल्हन सी सजती रात
बरगद - पीपल हरदम कहते, सोलह आने सच्ची बात

सोलह - सोलह मात्राओं की, चौपाई मन खूब सुहाय
सोलह – सोलह वर्णों वाली,रूप – घनाक्षरी मन भाय

सोलह की महिमा को गाये,दुर्ग-नगर का अरुण कुमार
छंद आपके मन भाया तो, प्रकट कीजिये मित्र विचार ||




अरुण कुमार निगम

Tuesday, April 29, 2014

गज़ल...




नजदीक घर के आपके थाना तो है नहीं
बुड्ढा दरोगा आपका  नाना तो है नहीं

तुड़वा के हाथ पैर करे प्यार आपसे
दिल इतना बेवकूफ दीवाना तो है नहीं

सूरत पे मर मिटे अरे वो लोग और थे
झाँसे में आपके हमें आना तो है नहीं

तालाब छोड़ गाँव का,  गमछा धरे चले
काशी में जाके तुमको नहाना तो है नहीं

सबकी क्षुधा मिटाने का दावा तो कर दिया
चाँवल का घर में एक भी दाना तो है नहीं  

सत्ता की बागडोर भी तो उस्तरा ही है
बन्दर के हाथ इसको थमाना तो है नहीं

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Tuesday, April 15, 2014

चैत की चंदनिया

                 
चादर सी ,चूनर सी-       चैत की चंदनिया
झांझर सी,झूमर सी -   चैत की चंदनिया

महुआ की मधुता सीमनभाती-मदमाती
छिटके गुलमोहर सी -    चैत की चंदनिया

अनपढ़ - अनाड़ी सी   ,सल्फी सी-ताड़ी-सी
मादक-सी,मनहर सी -   चैत की चंदनिया

अधपक्की इमली सी  ,खटमिट्ठी -खटमिट्ठी
सरसों सी,सुन्दर सी -     चैत की चंदनिया

मनभाये  बैरी सी ,      अमुआ की कैरी सी
टेसू सी ,सेमर सी -    चैत की चंदनिया

कोयल की कुहु-कुहु सी ,पपीहे की पीहु-पीहु सी
उड़ते कबूतर सी -          चैत की चंदनिया

सतरंगी सपनों सी,      दूर बसे अपनो सी
प्रिय की धरोहर सी -    चैत की चंदनिया

मंगतू की मेहनत सी,    चैतू की चाहत सी
गेहूँ  सी,अरहर सी -      चैत की चंदनिया

हल्बी सी,गोंड़ी सी,   छत्तीसगढ़ी बोली सी
भोले से बस्तर सी -   चैत की चंदनिया

ज्योति की शक्ति सी,भक्तों की भक्ति सी
माता के मंदिर सी -  चैत की चंदनिया


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)


Thursday, February 6, 2014

शुभ-वसंत


मुझको हे वीणावादिनी वर दे
कल्पनाओं को तू नए पर दे |

अपनी गज़लों में आरती गाऊँ
कंठ को मेरे तू मधुर स्वर दे |

झीनी झीनी चदरिया ओढ़ सकूँ
मेरी झोली में ढाई आखर दे |

विष का प्याला पीऊँ तो नाच उठूँ
मेरे पाँवों को ऐसी झाँझर दे |

सुनके अंतस् को मेरे ठेस लगे 
मेरी रत्ना को ऐसे तेवर दे |

साँस सौरभ समाए शामोसहर
मुक्त विचरण करूँ वो अम्बर दे |

सूर बन कर चढ़ाऊँ नैन तुझे
इन चिरागों में रोशनी भर दे ||

(तरही ग़ज़ल)

अरूण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)