मेघाच्छदित तृषा अपूर्ण
शून्य नेत्र अश्रु-पूरित
इंद्रधनुषी फिसलन व्यापी
सौदामिनी सहमी-सहमी.
ऋतु की राजनीति अनब्याही
मेघा पिघले , द्रवित धरा
जाने किस पर गाज गिरेगी
ऋतु यामिनी मौन हँसी.
उत्पादन के बीज अंकुरित
अहा ! फसल लहरायेगी
कविताओं का शैशव भी अब
यौवन मांग रहा है.
-अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग
छत्तीसगढ़.