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Saturday, May 12, 2012

किसको घर कहता है पगल्रे


किसको घर कहता है पगले
दीवारें ही दीवारें
घास-फूस की छत है कहीं पर
ऊँची-ऊँची मीनारें.

तन से निकले प्राण पखेरू
काठी है तैयार खड़ी
फिर मखमल की सेज कहाँ
बस !अंगारे ही अंगारे.

जीवन भर का शोक मनाये
किसको इतनी है फुरसत
तीज-नहावन निपट गया फिर
नहीं सुनोगे चीत्कारें.

जो अपना घर कुरिया फूँके
वही हमारे संग चले
कोई कहता है यायावर
कोई कहता बंजारे.

दिल की अदला-बदली करके
हमने सारा जग जीता
नहीं माथ पर मुकुट हमारे
नहीं हाथ में तलवारें.

 एक नजर इधर भी : सियानी गोठ   http://mitanigoth2.blogspot.com

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)