किसको
घर कहता है पगले
दीवारें
ही दीवारें
घास-फूस
की छत है कहीं पर
ऊँची-ऊँची
मीनारें.
तन
से निकले प्राण पखेरू
काठी
है तैयार खड़ी
फिर
मखमल की सेज कहाँ
बस
!अंगारे ही अंगारे.
जीवन
भर का शोक मनाये
किसको
इतनी है फुरसत
तीज-नहावन
निपट गया फिर
नहीं
सुनोगे चीत्कारें.
जो
अपना घर कुरिया फूँके
वही
हमारे संग चले
कोई
कहता है यायावर
कोई
कहता बंजारे.
दिल
की अदला-बदली करके
हमने
सारा जग जीता
नहीं
माथ पर मुकुट हमारे
अरुण
कुमार निगम
आदित्य
नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय
नगर, जबलपुर (म.प्र.)