(चित्र गूगल से साभार)
रचना- श्रीमती सपना निगम
शुद्धोदन
और गौतमी
ने
नाजों से उसको पाला था
यशोधरा
की मांग सजी
थी
वह
कपिलवस्तु का उजाला था.
राज
वैभव त्यागे उसने
छोड़े
सारे मोहपाश
भिक्षाटन
की
राह निकला
पहने थे भगवा
लिबास
अन्न
- जल त्यागा था उसने
ज्ञान की थी अभिलाषा
देह को भी कष्ट देकर
लगी हाथ निराशा.
भूखे
रह कर कुछ न मिलता
यह बात उसने जान
ली
प्राणियों
का दु:ख हरेगा
यह बात उसने ठान ली.
बैसाख
की पूर्णिमा थी
चाँद
ने आस जगाई थी
बोधि
– वृक्ष के नीचे सुजाता
खीर
लेकर आई थी.
अन्न से तृप्ति
मिली
यह बात उसने जानी है
देह
को जो कष्ट देता
वह बड़ा अज्ञानी है.
उसके दोनों चक्षुओं में
प्रज्ञा
की गहराई
है
मन की अंतर्वेदना में
करुणा असीम समाई है.
आँख
मूँदे बैठा है वो
ज्ञान
चक्षु खोल कर
धम्म
के उपदेश देता
वाणी में अमृत घोल
कर.
श्रीमती सपना निगम
आदित्य
नगर , दुर्ग ( छत्तीसगढ़)