Followers

Friday, April 26, 2013

साँझा चूल्हा खो गया...


कुण्डलिया छंद

साँझा चूल्हा खो गया,रहा न अब वो स्वाद
शहर लीलते खेत नित , बंजर करती खाद
बंजर  करती  खाद , गुमे  मिट्टी के  बरतन
भूख खड़ी बन प्रश्न , हाय कैसा परिवर्तन
जीवन  एक   पतंग ,  और   महंगाई  माँझा
रहा न अब वो स्वाद,खो गया चूल्हा साँझा ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)

20 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (27 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete

  2. अपनापन है ना कहीं , स्वाद कहाँ से आय
    महंगाई नित बढ़ रही , कौन कहाँ से खाय
    कौन कहाँ से खाय ,रिश्वत ही कर्म बचा है
    अनाचार है सब जगह , बस यही धर्म बचा है
    बंजर हो गए गाँव , न दिखता कोई उपवन
    चूल्हे हो गए अलग , कहाँ है अब अपनापन ?

    :):) कोशिश की है .... आपकी कुंडलियाँ पढ़ कर मन करता है कि कुछ ऐसा ही लिखा जाए .... पर आता नहीं है लिखना । त्रुटियों के लिए पहले ही क्षमाप्रार्थी हूँ :)

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. कौन जानता है अब मिट्टी के बर्तनों और मिट्टीवाले साँझा चूल्हों का सोंधा स्वाद ,सारे नकली स्वाद जिह्वा पर चढ़े हैं!

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति....

    ReplyDelete
  6. न साझे चूल्हे रहे न जीवन ...

    ReplyDelete
  7. सच है अरुणजी ! जब प्रजातंत्र ही चकनाचूर हो गया तो सहकारिता कहाँ ?

    ReplyDelete
  8. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 28/04/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  9. बहुत बढ़िया,सटीक लालबाब प्रस्तुति !!!

    Recent post: तुम्हारा चेहरा ,

    ReplyDelete
  10. बहुत ही सुन्दर लाजबाब प्रस्तुति,आभार.

    ReplyDelete
  11. बहुत ही सुन्दर रचना! मेरी बधाई स्वीकारें।

    ReplyDelete
  12. सच है समय बदल गया.. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,

    ReplyDelete
  13. रहा न अब वो स्वाद,खो गया चूल्हा साँझा ...बहुत बढ़ि‍या..अब कहां रह गया ये सब

    ReplyDelete
  14. अब कहां वो दिन पुरानी मस्तियां
    खो गए रिश्ते पुरानी बस्तियां ...

    ReplyDelete
  15. यही तो विकास की त्रासदी है..खोना..

    ReplyDelete
  16. आपकी यह सुन्दर रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.com) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    ReplyDelete