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Wednesday, December 13, 2017

सरसी छन्द आधारित गीत

      क्या होगा भगवान !

अधजल गगरी करवाती है, अपना ही सम्मान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

(1)
काँव काँव का शोर मचाते, दरबारों में काग
बहरे राजा जी का उन पर, उमड़ रहा अनुराग।
अवसर पाकर उल्लू भी अब, छेड़ रहे हैं तान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

(2)
भूसे को पौष्टिक बतलाकर, बेच रहे हैं ख्वाब
जिसको खाकर नवपीढ़ी की, सेहत हुई खराब।
परम्परागत खानपान का, होता अब अपमान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

(3)
मातु पिता को त्याग बढ़ रहे, अब एकल परिवार
सुविधाओं के लेनदेन को, समझ रहे हैं प्यार।
आया पाल रही बच्चों को, स्वयं पालते श्वान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

(4)
लखपति अब दिख रहे कबाड़ी, निर्धन दिखें सुनार
पनप रहे उद्योग लौह के, भूखे रहे लुहार।
गल्ले के व्यापारी खुश हैं, रोते दिखें किसान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

(5)
राजनीति में साँड़ घुस गए, डाले कौन नकेल
जिलाधीश को डाँट रहे हैं, नेता चौथी फेल।
सच्चों की तो शामत आई, झूठों की है शान
भरी गगरिया पूछ रही है, क्या होगा भगवान !!

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग
छत्तीसगढ़

Tuesday, November 28, 2017

आज के काव्य-मंच - आल्हा छन्द

काव्य मंच की गरिमा खोई, ऐसा आज चला है दौर
दिखती हैं चुटकुलेबाजियाँ, फूहड़ता है अब सिरमौर ।।

कहीं राजनेता पर फब्ती, कवयित्री पर होते तंज
अभिनेत्री पर कहीं निशाना, मंच हुआ है मंडी-गंज ।।

मौलिकता का नाम नहीं है, मर्यादा होती अब ध्वस्त
भौंडापन कोई दिखलाता, पैरोडी में कोई मस्त ।।

तथाकथित कवियों में पनपा, सभी तरफ अब लॉबीवाद
एक सूत्र "तू मुझे याद कर - तुझे करूंगा मैं भी याद" ।।

सम्प्रदाय की बातें कहकर, कोई लगा रहा है आग
देव तुल्य हस्ती के दामन, कोई लगा रहा है दाग ।।

नाम वीर-रस का ले लेकर, चीख रहे कुछ बन कर वीर
देश-प्रेम का ढोंग रचा कर, छोड़ रहे विष-भीने तीर ।।

अचरज लगता जिन्हें नहीं है, साहित का थोड़ा भी ज्ञान
सरकारें ऐसे कवियों का, आज कर रही हैं सम्मान ।।

सबका हित हो जिसमें शामिल, वही कहाता है साहित्य
भेदभाव को तज कर जैसे, रश्मि बाँटता है आदित्य ।।

पहले के कवियों का लेते, अब भी हम श्रद्धा से नाम
बचपन में जिनको सुनते थे,जाग-जाग कर रात तमाम ।।

काका हाथरसी की कविता, शिष्ट हास्य का थी भंडार
देश प्रेम की गंग बहाने,  आते थे अब्दुल जब्बार ।।

नीरज के आते बहती थी, हृदय-कर्ण में रस की धार
मंत्रमुग्ध होते थे श्रोता, सुन उनका दर्शन श्रृंगार ।।

शैल,चक्रधर, हुल्लड़, माया, सोम, शरद, सोलंकी, व्यास
मधुप, प्रभा, नूतन, बैरागी, ऐसे कितने कवि थे खास ।।

अब भी अच्छे कवि हैं लेकिन, कौन उन्हें देता है मंच
आयोजन करवाने वाले, आयोजक ही रहे न टंच ।।

अच्छे-सच्चे कवि को लेकिन, नहीं रहा मंचों का मोह
अगर मंच का नशा चढ़ा तो, समझो लेखन का अवरोह ।।

अगर सहज ही मंच मिले तो, मत हो जाना मद में चूर
सच्ची कवितायें ही पढ़ना, रह लटके-झटके से दूर ।।

सुहावने हैं ढोल दूर के, आज - मंच हों या सम्मान
अरुण दे रहा है आल्हा में, वर्तमान का सच्चा ज्ञान ।।

- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Thursday, November 9, 2017

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

"यहाँ हमारा सिक्का खोटा"

निर्धन को खुशियाँ तब मिलतीं, जब होते दुर्लभ संयोग
हमको अपनी बासी प्यारी, उन्हें मुबारक छप्पन भोग।।

चन्द्र खिलौना लैहौं वाली, जिद कर बैठे थे कल रात
अपने छोटे हाथ देखकर, पता चली अपनी औकात।।

जो चलता है वह बिकता है, प्यारे ! यह दुनिया बाजार
यहाँ हमारा सिक्का खोटा, जिसको हम कहते हैं प्यार।।

लेन देन में घाटा सहते, गणित हमारा है कमजोर
ढाई आखर ही पढ़ पाए, ले दे के हम दाँत निपोर।।

हम कबीर के साथ चले हैं, लिए लुआठी अपने हाथ
जो अपना घर कुरिया फूँके, आये वही हमारे साथ।।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

Friday, October 27, 2017

यमक और रूपक अलंकार

*यमक अलंकार - जब एक शब्द, दो या दो से अधिक बार अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हो*।

*दोहा छन्द* -
(1)
मत को मत बेचो कभी, मत सुख का आधार
लोकतंत्र का मूल यह, निज का है अधिकार ।।
(2)
भाँवर युक्त कपोल लख, अंतस जागी चाह
भाँवर पूरे सात लूँ, करके उससे ब्याह ।।

*रूपक अलंकार - जब उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए अर्थात उपमेय और उपमान में कोई अंतर दिखाई न दे*।

*रोला छन्द* -
(1)
नयन-झील में डूब, प्रेम-मुक्ता पा जाऊँ
छूटे जग-जंजाल, आरती पिय की गाऊँ।
यही कामना आज, हृदय में मेरे जागी
पिय को दो संदेश, हुआ है मन अनुरागी।।
(2)
अधर-पाँखुरी देख, हृदय-भँवरा ललचाया
करने को रसपान, निकट चुपके से आया।
सखि-कंटक चहुँओर, करे कैसे मनचीता
उहापोह में हाय, समय सारा ही बीता ।।

*अरुण कुमार निगम*

Wednesday, August 23, 2017

एक श्रृंगार गीत

एक श्रृंगार गीत -

कजरे गजरे झाँझर झूमर चूनर ने उकसाया था
हार गले के टूट गए कुछ ऐसे अंक लगाया था ।

हरी चूड़ियाँ टूट गईं क्यों सुबह सुबह तुम रूठ गईं
कल शब तुमने ही तो मुझको अपने पास बुलाया था।

हाथों की मेंहदी न बिगड़ी और महावर ज्यों की त्यों
होठों की लाली को तुमने खुद ही कहाँ बचाया था।

जितनी करवट उतनी सलवट इस पर काहे का झगड़ा
रेशम की चादर को बोलो किसने यहाँ बिछाया था।

झूठ कहूँ तो कौआ काटे मैंने दिया जलाया था
खता तुम्हारी थी तुमने तो खुद ही दिया बुझाया था।

नई चूड़ियाँ ले लेना तुम हार नया बनवा लेना
अभी अभी तो पिछले हफ्ते ही इनको बनवाया था।

*अरुण कुमार निगम*
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Thursday, July 13, 2017

दोहा छन्द

दोहा छन्द

नैसर्गिक दिखते नहीं, श्यामल कुन्तल मीत
लुप्तप्राय हैं वेणियाँ, शुष्क हो गए गीत।।

पैंजन चूड़ी बालियाँ, बिन कैसा श्रृंगार
अलंकार बिन किस तरह, कवि लाये झंकार ।।

घट पनघट घूंघट नहीं, निर्वासित है लाज
बन्द बोतलों में तृषा, यही सत्य है आज ।।

प्रियतम की पाती गई, गए अबोले बैन
रहे न अब वे डाकिया, जिनको तरसें नैन ।।

अरुण कुमार निगम 
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

Sunday, July 9, 2017

*रोला छन्द* - *गुरु पूर्णिमा की शुभकामनायें*

*गुरु पूर्णिमा की शुभकामनायें*

गुरु की महिमा जान, शरण में गुरु की जाओ
जीवन  बड़ा  अमोल, इसे  मत  व्यर्थ गँवाओ
दूर   करे   अज्ञान , वही   गुरुवर   कहलाये
हरि  से  पहले  नाम, हमेशा  गुरु  का  आये ।।

*अरुण कुमार निगम*
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)