Followers

Tuesday, January 15, 2013

मान जाओ प्रिये.....


मान जाओ प्रिये.....

है मिलन की घड़ी
मत करो हड़ब‌ड़ी |

इतनी जल्दी तुम्हें
जाने की क्या पड़ी |

पास  बैठो  अजी
दूर क्यों हो खड़ी |

देख  लूँ   मैं  जरा
रूप की फुलझड़ी |

छोड़ दो - छोड़ दो
आँसुओं की झड़ी |

हँसके बिखरा भी दो
मोतियों  की  लड़ी |

वक़्त कम है मगर
ज़िंदगी    है    बड़ी |

मान   जाओ   प्रिये
क्यों हो जिद पे अड़ी |

बाँध कर देख लो
प्यार की हथकड़ी |

है  महल  से  हसीं
प्रेम   की   झोपड़ी ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (मध्यप्रदेश)

मसखरी कर गये.................



ज्योंहि  आये  तबीयत  हरी कर  गये
साँवरी  साँझ  को  मदभरी कर  गये |

रंग   बिखरे   प्रतीची   सँवरती   रही
मेरी  रातों  को  यूँ  बावरी  कर  गये |

क्यारियाँ मस्त होकर महकने लगीं
वृक्ष की शाख को फुलझरी कर गये |

दिल में  बातें बहुत अनकही कैद थी
एक  पल  में  उन्हें  वो  बरी कर गये |

उनकी मुस्कान में था बला का असर
मेरे  गीतों  को  अंत्याक्षरी  कर  गये ||

खो गया दिल मेरा,नींद भी खो गई
भोली सूरत मगर तस्करी कर गये |

आँखों ही आँखों में बातें दो चार की
मन नहीं मानता मसखरी कर गये |

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (मध्यप्रदेश)

Sunday, January 13, 2013

मकर-संक्रांति पर्व की शुभकामनायें


मौसम के दोहे...

जाने  को  है  शिशिर  ऋतु , आने को ऋतुराज
आग जला कर झूम लें,हम तुम मिलकर आज ||

सूर्य   उत्तरायण   हुए  ,  मकर  –  संक्रांति पर्व
जन्में   भारत  -  देश  में ,  हमें   बड़ा   है   गर्व ||

मिलजुल कर  रहना  सदा, हर खाई को पाट
मीठा-मीठा बोल कर , सबको तिल गुड़ बाँट ||

सरसों   झूमें   झाँझ   ले  ,  गेहूँ   गाये   गीत
चना  नाचता  मस्त हो ,  तिल तो बाँटे प्रीत ||

मटर  मटकता बावरा  ,  मूंगफली   मुस्काय
मुँह मसूर का खिल उठा, मौसम खूब सुहाय ||

नेह  रेशमी  डोर  फिर , माँझे  का  क्या काम
प्रेम – पतँगिया झूमती ,ज्यों राधा सँग श्याम ||

ऋतु आवत – जावत रहे , पतझर पाछ बसन्त
प्रेम – पत्र कब सूखता ? इसकी आयु अनन्त ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर,दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (मध्यप्रदेश)

Thursday, January 10, 2013

संकल्प


दुर्मिल सवैया ( 8 सगण l l S)

(1)
अधिकार मिले अति भाग खिले, नहिं दम्भ दिखे प्रण आज करो
करना  नहिं  शासन  ताकत से , दिल पे  दिल से बस राज करो
कब  कौन  कहाँ  बिछड़े बिसरे , लघु कौन यहाँ ,गुरु कौन यहाँ
उसकी  फुँकनी  सुर  साज  रही ,  वरना  हर साज त मौन यहाँ ||

(2)
प्रण  आज  करो  सब  एक  रहें    ,   नहिं  भेद  रहे   तुझमें  मुझमें
उसके  शुभ  अंश  बँटे  सब में     ,   जल में  थल में    इसमें  उसमें
दिन  चार  मिले  कट तीन गये    ,   बस  एक बचा बरबाद न हो
किस काम क जीवन हाय सखे, यदि जीवन में मधु स्वाद न हो ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर, जबलपुर ( मध्य प्रदेश)