कार्तिक अगहन पूस ले, आता जब हेमन्त
मन की चाहत सोचती, बनूँ
निराला पन्त |
शाल गुलाबी ओढ़ कर, शरद बने हेमंत |
शकुन्तला को ढूँढता , है मन का दुष्यन्त |
कोहरा रोके रास्ता , ओस चूमती देह
लिपट-चिपट शीतल पवन,जतलाती है नेह |
ऊन बेचता हर गली , जलता
हुआ अलाव
पवन अगहनी मांगती , औने -
पौने भाव |
मौसम का ले लो मजा, शहरी
चोला फेंक
चूल्हे के अंगार में , मूँगफल्लियाँ सेंक |
मक्के की रोटी गरम , खाओ गुड़ के संग
फिर देखो कैसी जगे, तन
मन मस्त तरंग |
गर्म पराठे कुरकुरे , मेथी के जब खायँ
चटनी लहसुन मिर्च की,भूले बिना बनायँ |
गाजर का हलुवा कहे, ले
लो सेहत स्वाद
हँसते रहना साल भर,
मुझको करके याद |
सीताफल हँसने लगा , खिले
बेर के फूल
सरसों की अँगड़ाइयाँ, जलता देख बबूल |
भाँति भाँति के कंद ने, दिखलाया है रूप
इस मौसम भाती नहीं, किसे
सुनहरी धूप |
मौसम उर्जा बाँटता , है जीवन पर्यंत
संचित तन मन में करो,सदा रहो बलवंत |
अरुण
कुमार निगम
आदित्य
नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय
नगर, जबलपुर (मध्यप्रदेश)