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Friday, August 26, 2011

श्रद्धांजलि - मुकेश

मेरा महबूब नजर से दूर
नजारों में कहीं खोया
ये था मंजूर मगर अब वो
सितारों में कहीं खोया.

चमन बदले, वतन बदले
मगर एहसास रहता है
मेरा महबूब, मेरा साथी
शरारों में कहीं खोया.

शिकायत क्यूँ खिजाँ से हो
सहारा दे रही है जो
मेरा महबूब, भरे मौसम
बहारों में कहीं खोया.

भँवर में डूबने वालों को
किस्मत से गिला कैसा
मेरा महबूब बहुत नजदीक
किनारों में कहीं खोया.

न ये पूछो कि कब्रों में
भटकता है अरुण क्यूंकर
हकीकत है मेरा साथी
मजारों में कहीं खोया.

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर ,दुर्ग (छत्तीसगढ़)

{ प्रिय गायक मुकेश की स्मृति में 27 अगस्त 1976 को रचित }