चंदन जैसा नहीं मगर मैं ,
महक छोड़ कर जाऊंगा
ख्वाब सजाना चाहोगे तो
पलक छोड़ कर जाऊंगा.
तुम पर लिखे गीत तुम्हीं को
सौंप रहा हूँ, ओ मनमीता !
इन गीतों में अपनी भी इक
झलक छोड़ कर जाऊंगा.
पंख तुम्हारे – चाह तुम्हारी
जितना चाहो तुम उड़ना
ऐ आजाद परिंदे ! मैं तो
फलक छोड़ कर जाऊंगा.
एक दिये से प्यार किया है
खौफ न खाना अंधियारों से
बुझ जाऊंगा मगर मीत मैं
चमक छोड़ कर जाऊंगा.
काँटे मेरे – फूल तुम्हारे
और धरा क्या बँटवारे में
पगडंडी का राही हूँ मैं
सड़क छोड़ कर जाऊंगा.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग
छत्तीसगढ़.