अब तन्हाई का आलम ही,
दिल को आया रास मेरे
तुम जब मुझसे दूर गई हो,
मौत आ गई पास मेरे.
कैसा यह अपनापन आखिर,
चाह के भूल न पाता हूँ
सोचा गीत खुशी के लिख लूँ,
नगमे हुये उदास मेरे.
हवा बाँधने की कोशिश में,
बाँहें जब फैलाई थी
रेत-महल से चूर हो गये,
सब संचित विश्वास मेरे.
उड़ने की कोशिश की जब भी,
पंखों ने दम तोड़ दिया
उन कदमों की खाक बना मैं,
जितने भी थे खास मेरे.
अब ऐसी कुछ जतन करो कि
धड़कन को आराम मिले
माटी की चादर में बाँधो,
सुख मेरे – संत्रास मेरे.
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर ,दुर्ग (छत्तीसगढ़)