गजल : खेतों में बनी बस्ती
शहरों में नजर आती है खूब धनी बस्ती
गाँवों में मगर क्यों है अश्कों से सनी बस्ती।
कई लोग पलायन कर घर छोड़ गये सूना
मेरे गाँव में भी कल तक थी खूब घनी बस्ती।
भू-माफिया बिल्डर के चंगुल में फँसी जब से
बेमोल बिकी है फिर हीरे की कनी बस्ती।
फुटपाथ मिला कुछ को, कुछ को है मिली कुटिया
कुछ किस्मत वालों की आकाश तनी बस्ती।
बरसात भरोसे में खेती हो "अरुण" कब तक
मजबूर किसानों के खेतों में बनी बस्ती।
- अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग छत्तीसगढ़